सुप्रीम कोर्ट 27 मई को सुनाएगा SIR की वैधता पर फैसला, चुनाव आयोग की संवैधानिक शक्तियों की होगी परीक्षा
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय बुधवार, 27 मई 2026 को भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा संचालित मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की संवैधानिक वैधता पर अपना बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाएगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ यह निर्धारित करेगी कि क्या चुनाव आयोग के पास वर्तमान स्वरूप में SIR संचालित करने की वैधानिक शक्ति है। न्यायालय ने इस मामले में 29 जनवरी को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
मुख्य संवैधानिक प्रश्न
न्यायालय के समक्ष केंद्रीय प्रश्न यह है कि क्या भारत निर्वाचन आयोग को संविधान के अनुच्छेद 326, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के तहत वर्तमान स्वरूप में SIR आयोजित करने की शक्तियाँ प्राप्त हैं। यह फैसला चुनावी प्रक्रिया में आयोग की अधिकार-सीमाओं को स्पष्ट करने की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है।
याचिकाकर्ता और मामले की पृष्ठभूमि
इस मामले में अधिकांश याचिकाएँ जून 2025 में दायर की गई थीं, जब चुनाव आयोग ने बिहार में SIR कराने का निर्णय लिया था। याचिकाकर्ताओं में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव, तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद महुआ मोइत्रा, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) सांसद मनोज झा, कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) सांसद सुप्रिया सुले सहित कई प्रमुख नाम शामिल हैं।
SIR की मौजूदा स्थिति
उल्लेखनीय है कि न्यायालय ने SIR प्रक्रिया पर कोई रोक नहीं लगाई और इसे जारी रहने दिया। बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में SIR पूरा हो चुका है, जबकि गुजरात, उत्तर प्रदेश और राजस्थान सहित कई अन्य राज्यों में यह प्रक्रिया अभी भी जारी है।
आधार कार्ड और दस्तावेज़ीकरण पर निर्देश
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने चुनाव आयोग को आधार कार्ड को SIR के लिए 12वें दस्तावेज़ के रूप में शामिल करने का निर्देश दिया था। हालाँकि न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं होगा, और चुनाव आयोग इसका सत्यापन करा सकेगा।
आगे क्या होगा
27 मई का यह फैसला आने वाले विधानसभा चुनावों — विशेषकर उन राज्यों में जहाँ SIR अभी जारी है — के संदर्भ में निर्णायक साबित हो सकता है। यदि न्यायालय SIR को असंवैधानिक ठहराता है, तो पहले से पूर्ण हो चुकी प्रक्रियाओं की स्थिति भी सवालों के घेरे में आ सकती है। चुनावी पारदर्शिता और मतदाता सूची की शुद्धता के बीच संतुलन का यह प्रश्न भारतीय लोकतंत्र के लिए दूरगामी महत्त्व रखता है।