ब्रिटेन ने होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा के लिए 35 देशों की बैठक बुलाई, भारत भी शामिल
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नई दिल्ली/लंदन, 2 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने और इसे वैश्विक स्तर पर सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से ब्रिटिश विदेश मंत्री यवेट कूपर की अध्यक्षता में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में भारत का भी प्रतिनिधित्व हुआ। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में इस बात की पुष्टि की।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि यूके द्वारा भारत को एक पत्र भेजा गया है, जिसमें हमारे प्रतिनिधि के रूप में भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री शामिल हैं।
बुधवार को ब्रिटिश पीएम कीर स्टार्मर द्वारा होर्मुज पर एक अहम बैठक की घोषणा की गई थी। उन्होंने कहा था कि यह बैठक जल्द ही होगी, और इसे गुरुवार को ऑनलाइन आयोजित किया गया। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए संभावनाएँ खोजना था।
बैठक के दौरान कूपर ने होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के संदर्भ में ईरान की कड़ी आलोचना की, इसे "वैश्विक आर्थिक सुरक्षा पर सीधा हमला" बताया।
बैठक की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा कि ईरान की "लापरवाही" ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को गंभीर खतरे में डाल दिया है।
कूपर ने यह भी दावा किया कि ब्रिटेन इस संकट को कूटनीतिक रूप से सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यूके का लक्ष्य होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री रास्तों को फिर से सुरक्षित और चालू करना है, जो ईरान ने अमेरिका-इजरायल के अभियानों के जवाब में निशाना बनाया है।
कूपर के अनुसार, इस रणनीतिक समुद्री मार्ग में अब तक 25 से अधिक जहाजों पर हमले हो चुके हैं। इसके परिणामस्वरूप लगभग 20,000 नाविक करीब 2,000 जहाजों पर फंसे हुए हैं, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन और ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। कुवैत, बहरीन, कतर, यूएई, सऊदी, ओमान और इराक के व्यापार मार्गों पर ही नहीं, बल्कि एशिया के लिए लिक्विड नेचुरल गैस, अफ्रीका के लिए खाद और पूरी दुनिया के लिए जेट फ्यूल की आपूर्ति पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ा है।
ईरान का यह व्यवहार उन देशों के प्रति है जो इस संघर्ष में कभी शामिल नहीं थे, इसकी हमने और दुनिया के 130 अन्य देशों ने संयुक्त राष्ट्र में कड़ी निंदा की है।
यह स्थिति न केवल क्षेत्रीय तनाव को बढ़ा रही है, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी एक बड़ा खतरा बनती जा रही है, विशेष रूप से जब ऊर्जा संकट पहले से ही गंभीर है।