ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-III को कैबिनेट की मंजूरी: ₹1,86,405 करोड़ की योजना, 135 GW नवीकरणीय ऊर्जा का लक्ष्य
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 30 सितंबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-III (GEC-III) योजना को औपचारिक मंजूरी दे दी। इस योजना की कुल परियोजना लागत ₹1,86,405 करोड़ है और इसका उद्देश्य 2032-33 तक देश के इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम (InSTS) को इस स्तर पर सक्षम बनाना है कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच 135 गीगावाट तक की नवीकरणीय ऊर्जा का निर्बाध प्रवाह सुनिश्चित हो सके। यह निर्णय भारत के 2035 तक 900 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता के राष्ट्रीय लक्ष्य की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।
योजना की संरचना और वित्तीय ढाँचा
सरकारी बयान के अनुसार, कुल ₹1,86,405 करोड़ की लागत दो घटकों में विभाजित है। इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम के विकास के लिए ₹1,36,378 करोड़ और 50 गीगावाट-घंटा क्षमता के बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) की स्थापना के लिए ₹50,000 करोड़ आवंटित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, केंद्र सरकार इस योजना में ₹54,082 करोड़ की केंद्रीय वित्तीय सहायता (CFA) प्रदान करेगी।
यह केंद्रीय सहायता इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन शुल्क को कम करने में सहायक होगी, जिससे अंततः बिजली की लागत आम उपभोक्ताओं के लिए नियंत्रित रहेगी। सरकारी बयान में स्पष्ट किया गया है कि इस वित्तीय सहायता का सीधा लाभ देश के नागरिकों को मिलेगा।
BESS और ग्रिड स्थिरता का महत्व
50 गीगावाट-घंटा के बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम को नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादकों के स्तर पर या अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर स्थापित किया जाएगा। यह व्यवस्था उन समस्याओं से निपटने के लिए की गई है जो सौर और पवन ऊर्जा की रुक-रुक कर होने वाली प्रकृति के कारण उत्पन्न होती हैं — जैसे ग्रिड कंजेशन, पीक-आवर में आपूर्ति की कमी और सौर ऊर्जा अनुपलब्धता के दौरान बढ़ी हुई माँग।
गौरतलब है कि भारत में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी तेज़ी से बढ़ रही है, लेकिन ग्रिड की लचीलापन क्षमता (flexibility) उस गति से नहीं बढ़ पाई है। BESS इस अंतर को पाटने का सबसे व्यावहारिक तकनीकी समाधान माना जाता है।
कार्यान्वयन का तरीका
योजना के तहत सभी ग्रीनफील्ड परियोजनाओं को टैरिफ-आधारित प्रतिस्पर्धी बोली (TBCB) प्रक्रिया के माध्यम से क्रियान्वित किया जाएगा। ब्राउनफील्ड अपग्रेडेशन और नेटवर्क सुदृढ़ीकरण के कार्य कॉस्ट प्लस बेसिस (CPB) पर निष्पादित होंगे। राज्य ट्रांसमिशन यूटिलिटीज (STU) समग्र कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में कार्य करेंगी, जबकि ट्रांसमिशन सर्विस प्रोवाइडर्स (TSP) बिल्ड-ओन-ऑपरेट-मेनटेन (BOOM) मॉडल पर TBCB के अंतर्गत भाग लेंगे।
रोज़गार और पर्यावरणीय प्रभाव
सरकारी बयान के अनुसार, यह योजना ऊर्जा क्षेत्र, विनिर्माण और निर्माण उद्योगों में बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोज़गार सृजित करेगी। BESS के घरेलू निर्माण और उपयोग से देश के ऊर्जा भंडारण उद्योग में अतिरिक्त रोज़गार के अवसर पैदा होंगे। इसके साथ ही, भाग लेने वाले राज्यों में संचालन, रखरखाव और ग्रिड प्रबंधन के क्षेत्र में दीर्घकालिक कुशल रोज़गार का सृजन भी अपेक्षित है।
यह योजना कार्बन फुटप्रिंट में कमी लाकर पर्यावरण के अनुकूल विकास को बढ़ावा देगी और देश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा में योगदान देगी। यह ऐसे समय में आई है जब भारत अंतर्राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं के तहत अपने ऊर्जा मिश्रण में जीवाश्म ईंधन की हिस्सेदारी घटाने पर गंभीरता से काम कर रहा है।
आगे की राह
GEC-III का क्रियान्वयन वित्त वर्ष 2032-33 तक पूरा किए जाने का लक्ष्य है। यह योजना GEC के पहले दो चरणों की सफलता पर आधारित है, जिन्होंने देश के कई राज्यों में नवीकरणीय ऊर्जा के ग्रिड एकीकरण की नींव रखी थी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस योजना की वास्तविक परीक्षा राज्य-स्तरीय कार्यान्वयन की गति और BESS की घरेलू आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने की क्षमता पर निर्भर करेगी।