चेन्नई सीबीआई कोर्ट का फैसला: बैंक धोखाधड़ी में तीन दोषियों को 5 साल की सजा, ₹1.24 करोड़ की ठगी
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की विशेष अदालत, चेन्नई ने 22 मई 2026 को बैंक धोखाधड़ी के एक बहुचर्चित मामले में तीन आरोपियों को दोषी ठहराते हुए प्रत्येक को 5 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। दोषी करार दिए गए व्यक्तियों में मेसर्स पलपाप इचिनीची सॉफ्टवेयर इंटरनेशनल लिमिटेड के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी सेंथिल कुमार, पी.ए. सासी कुमार और पी. थंजई चेजियन शामिल हैं। तीनों पर भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के साथ ₹1.24 करोड़ की आपराधिक धोखाधड़ी करने का आरोप सिद्ध हुआ।
मुख्य घटनाक्रम
अदालत के अनुसार, आरोपियों ने SBI की 'एक्सप्रेस क्रेडिट स्कीम' का दुरुपयोग करते हुए काल्पनिक कर्मचारियों के नाम पर फर्जी दस्तावेज तैयार किए और व्यक्तिगत ऋण स्वीकृत करवाए। प्राप्त राशि का उपयोग व्यक्तिगत लाभ के लिए किया गया, जिससे सार्वजनिक धन को सीधा नुकसान हुआ।
CBI ने यह मामला 14 नवंबर 2008 को भारतीय स्टेट बैंक, चेन्नई की शिकायत पर दर्ज किया था। जांच पूरी होने के बाद 11 दिसंबर 2009 को आरोप पत्र दाखिल किया गया। मामले में चौथे आरोपी जी. वैद्यनाथन का मुकदमे के दौरान निधन हो जाने के कारण उनके विरुद्ध कार्यवाही समाप्त कर दी गई।
अदालत का फैसला और जुर्माना
सीबीआई की विशेष अदालत ने सबूतों और गवाहों के बयानों की विस्तृत समीक्षा के बाद तीनों आरोपियों को दोषी ठहराया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपियों ने सुनियोजित साजिश के तहत बैंक को जानबूझकर धोखा दिया।
सजा के साथ-साथ अदालत ने तीनों व्यक्तिगत आरोपियों पर कुल ₹11.7 लाख का जुर्माना लगाया। इसके अतिरिक्त, कंपनी मेसर्स पलपाप इचिनीची सॉफ्टवेयर इंटरनेशनल लिमिटेड पर अलग से ₹1.2 लाख का जुर्माना भी लगाया गया है।
धोखाधड़ी का तरीका
जांच के अनुसार, आरोपी कंपनी सॉफ्टवेयर क्षेत्र से जुड़ी थी। आरोपियों ने बैंक की योजना में खामियों का फायदा उठाते हुए ऐसे कर्मचारियों के नाम पर ऋण आवेदन दाखिल किए जो वास्तव में कंपनी में कार्यरत ही नहीं थे। फर्जी दस्तावेजों के सहारे स्वीकृत हुई ऋण राशि को व्यक्तिगत उपयोग में लगाया गया। यह ऐसे समय में आया है जब बैंकिंग क्षेत्र में कॉर्पोरेट ऋण धोखाधड़ी के मामले लगातार सामने आ रहे हैं।
आम जनता और बैंकिंग क्षेत्र पर असर
गौरतलब है कि 'एक्सप्रेस क्रेडिट स्कीम' जैसी योजनाएं वेतनभोगी कर्मचारियों को त्वरित ऋण उपलब्ध कराने के लिए बनाई गई थीं। इनके दुरुपयोग से न केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को वित्तीय नुकसान होता है, बल्कि वास्तविक लाभार्थियों की पहुँच भी प्रभावित होती है।
क्या होगा आगे
यह फैसला वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में CBI की जांच और अभियोजन क्षमता को रेखांकित करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के निर्णय भविष्य में बैंकिंग योजनाओं के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने में सहायक हो सकते हैं। आरोपियों के पास उच्च न्यायालय में अपील का विकल्प उपलब्ध है।