25 सितंबर 2026
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सीईसी ज्ञानेश कुमार पर थॉमस इसाक के गंभीर आरोप: केरल PWD विवाद से लेकर चुनाव आयोग तक

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सीईसी ज्ञानेश कुमार पर थॉमस इसाक के गंभीर आरोप: केरल PWD विवाद से लेकर चुनाव आयोग तक

सारांश

केरल के पूर्व वित्त मंत्री थॉमस इसाक ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर बड़े आरोप लगाए — केरल PWD कार्यकाल में सुसाइड नोट में नाम, सतर्कता जांच, और फिर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को दरकिनार कर नियुक्ति। विपक्ष चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है।

मुख्य बातें

सीपीआईएम नेता थॉमस इसाक ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर 25 सितंबर 2026 को गंभीर आरोप लगाए।
आरोप के अनुसार, 2006 में केरल PWD सचिव रहते हुए एक मलेशियाई कंपनी के इंजीनियर के सुसाइड नोट में उनका नाम आया था और सतर्कता जांच के आदेश दिए गए थे।
इसाक के अनुसार ज्ञानेश कुमार को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को दरकिनार कर चुनाव आयुक्त बनाया गया — चयन समिति से मुख्य न्यायाधीश हटाकर प्रधानमंत्री द्वारा नामित मंत्री को जोड़ा गया।
सीपीआईएम के पूर्व सांसद हन्नान मोल्लाह ने आरोप लगाया कि ज्ञानेश कुमार ने करोड़ों मतदाताओं को मतदाता सूची से हटाया और BJP को अनुचित सुविधाएं दीं।
ये सभी आरोप विपक्षी नेताओं की ओर से हैं; चुनाव आयोग या ज्ञानेश कुमार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के वरिष्ठ नेता और केरल के पूर्व वित्त मंत्री थॉमस इसाक ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के प्रशासनिक करियर पर 25 सितंबर 2026 को गंभीर आरोप लगाए, जिसमें केरल में पीडब्ल्यूडी सचिव पद पर रहते हुए एक मलेशियाई कंपनी के इंजीनियर की आत्महत्या के मामले में उनकी कथित संलिप्तता का उल्लेख शामिल है। इसाक के अनुसार, उक्त सुसाइड नोट में ज्ञानेश कुमार का नाम लिया गया था, जिसके बाद तत्कालीन वामपंथी सरकार ने उन्हें पद से हटाकर सतर्कता जांच के आदेश दिए थे।

केरल PWD विवाद और सतर्कता जांच

थॉमस इसाक ने विस्तार से बताया कि 2006 में जब ई.एस. सच्चिदानंद के नेतृत्व में वामपंथी सरकार सत्ता में आई, तब ज्ञानेश कुमार केरल के पीडब्ल्यूडी प्रभारी थे। उस दौरान विश्व बैंक द्वारा वित्त पोषित केरल राज्य सड़क विकास कार्यक्रम लागू किया जा रहा था। कथित तौर पर एक मलेशियाई निर्माण कंपनी के प्रभारी अभियंता ने कुआलालंपुर लौटने के बाद आत्महत्या कर ली और अपने सुसाइड नोट में ज्ञानेश कुमार पर रिश्वत मांगने तथा उत्पीड़न के आरोप लगाए।

इसाक ने कहा, "उन्होंने बताया कि कैसे सरकारी अधिकारियों ने कार्यक्रम के कार्यान्वयन में इतनी बाधाएं खड़ी कीं, रिश्वतें मांगीं और उन्हें परेशान किया कि वे आत्महत्या करने पर मजबूर हो गए। जब मामला सामने आया, तो हमने उन्हें तुरंत पद से हटा दिया और सतर्कता जांच का आदेश दिया।" ये आरोप कथित तौर पर हैं — न्यायालय द्वारा सिद्ध नहीं।

केंद्रीय सेवा और राजनीतिक उदय

इसाक के अनुसार, सतर्कता जांच के दो तीन महीनों के भीतर ज्ञानेश कुमार रक्षा विभाग के तहत केंद्रीय सेवा में चले गए। 2011 में यूडीएफ सरकार के सत्ता में आने के बाद 2012 में वे दिल्ली स्थित केरल हाउस के रेजिडेंट कमिश्नर बने। जब 2016 में वामपंथी पुनः सत्ता में आए, तो वे दोबारा केंद्रीय सेवा में चले गए।

इसाक ने दावा किया कि इसके बाद ज्ञानेश कुमार की भूमिका जम्मू कश्मीर पुनर्गठन में अहम रही और वे कथित तौर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के विश्वासपात्र बन गए। उन्होंने यह भी अनुमान व्यक्त किया कि राम जन्मभूमि ट्रस्ट की संरचना बनाने में भी उनकी कथित भूमिका रही — हालांकि इसाक ने स्वयं स्वीकार किया कि "मुझे इसके बारे में प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं है।"

चुनाव आयोग नियुक्ति पर सवाल

इसाक ने सर्वोच्च न्यायालय के उस निर्णय का भी उल्लेख किया जिसमें चुनाव आयुक्त के चयन में प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष की भागीदारी अनिवार्य की गई थी। उनके अनुसार, बाद में कानून में बदलाव कर भारत के मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से हटाकर उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक मंत्री को शामिल किया गया — और यह सब ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाने के लिए किया गया।

उन्होंने मतदाता सूची में बदलावों का भी उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि नई व्यवस्था में पात्रता साबित करने का बोझ आपत्तिकर्ता से हटाकर सीधे मतदाता पर डाल दिया गया, जिससे आम नागरिक के लिए आवश्यक दस्तावेज जुटाना कठिन हो गया।

सीपीआईएम नेता हन्नान मोल्लाह की प्रतिक्रिया

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के पूर्व सांसद हन्नान मोल्लाह ने भी ज्ञानेश कुमार पर तीखे आरोप लगाए। उन्होंने कहा, "सीईसी ज्ञानेश ने जो किया है, उनका काम राष्ट्रविरोधी है, क्योंकि चुनाव में वोट देने का अधिकार वोटरों का होता है। उन्होंने करोड़ों वोटरों को वोटर लिस्ट से हटा दिया है।"

मोल्लाह ने यह भी कहा कि ज्ञानेश कुमार भारतीय जनता पार्टी (BJP) को सुविधा देते हुए विपक्षी दलों के लिए बाधाएं उत्पन्न कर रहे हैं और चुनाव आयोग में एकमत निर्णय की परंपरा को तोड़ रहे हैं। गौरतलब है कि ये सभी आरोप विपक्षी नेताओं की ओर से लगाए गए हैं और चुनाव आयोग या ज्ञानेश कुमार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

आगे क्या होगा

यह विवाद ऐसे समय में उठा है जब देश के कई राज्यों में आगामी चुनावों की तैयारियाँ चल रही हैं और मतदाता सूची शुद्धिकरण अभियान को लेकर विपक्ष पहले से ही सवाल उठाता रहा है। इसाक और मोल्लाह के ये बयान आने वाले दिनों में संसदीय बहस और न्यायिक हस्तक्षेप की माँग को और तेज कर सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

वे गंभीर हैं — बशर्ते उनकी पुष्टि हो। मुख्य सवाल यह है कि जिस सतर्कता जांच का ज़िक्र किया गया, उसका परिणाम क्या रहा — यह सार्वजनिक दायरे में आना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को पलटकर चयन समिति बदलने का मुद्दा संवैधानिक है, न कि केवल राजनीतिक — और इस पर बहस वैधानिक ढाँचे में होनी चाहिए, सिर्फ प्रेस वार्ताओं में नहीं।
RashtraPress
25 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

थॉमस इसाक ने ज्ञानेश कुमार पर क्या आरोप लगाए हैं?
सीपीआईएम नेता थॉमस इसाक ने आरोप लगाया कि 2006 में केरल PWD सचिव रहते हुए एक मलेशियाई कंपनी के इंजीनियर के सुसाइड नोट में ज्ञानेश कुमार का नाम रिश्वत मांगने और उत्पीड़न के संदर्भ में आया था। इसके बाद तत्कालीन सरकार ने उन्हें पद से हटाकर सतर्कता जांच के आदेश दिए थे। ये आरोप कथित हैं और न्यायालय द्वारा सिद्ध नहीं हैं।
ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति पर सर्वोच्च न्यायालय का क्या आदेश था?
सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन में प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश की भागीदारी होनी चाहिए। इसाक के अनुसार, बाद में कानून बदलकर मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक मंत्री को शामिल किया गया।
हन्नान मोल्लाह ने ज्ञानेश कुमार पर क्या आरोप लगाए?
सीपीआईएम के पूर्व सांसद हन्नान मोल्लाह ने ज्ञानेश कुमार पर करोड़ों मतदाताओं को मतदाता सूची से हटाने और BJP को अनुचित सुविधाएं देने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि ज्ञानेश कुमार चुनाव आयोग में एकमत निर्णय की परंपरा का उल्लंघन कर रहे हैं।
क्या ज्ञानेश कुमार या चुनाव आयोग ने इन आरोपों पर प्रतिक्रिया दी है?
25 सितंबर 2026 तक ज्ञानेश कुमार या चुनाव आयोग की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। ये आरोप पूरी तरह विपक्षी नेताओं के बयानों पर आधारित हैं।
इस विवाद का महत्व क्या है?
यह विवाद भारत में चुनाव आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता की बड़ी बहस का हिस्सा है। ऐसे समय में जब कई राज्यों में चुनाव होने हैं और मतदाता सूची शुद्धिकरण को लेकर विपक्ष पहले से सवाल उठा रहा है, इन आरोपों का राजनीतिक और संवैधानिक महत्व है।
राष्ट्र प्रेस
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