बैरासकुंड महादेव मंदिर, चमोली: जहाँ रावण ने की थी शिव की घोर तपस्या, स्कंद पुराण में है उल्लेख
सारांश
मुख्य बातें
उत्तराखंड के चमोली जिले के घाट विकासखंड (दशोली गढ़) में स्थित श्री बैरासकुंड महादेव मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत प्राचीन और पौराणिक तीर्थ स्थल है। यह मंदिर अलकनंदा और नंदाकिनी नदियों के संगम नंदप्रयाग से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर प्रकृति की गोद में बसा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह वही पावन भूमि है जहाँ लंकापति रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए हजारों वर्षों तक घोर तपस्या की थी।
मंदिर का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्त्व
मान्यताओं के अनुसार रावण ने इसी स्थान पर अपने नौ (या दस) सिर महादेव को आहुति स्वरूप अर्पित किए थे, जिसके पश्चात भोलेनाथ ने उन्हें दर्शन दिए। इसी प्रसंग के कारण इस क्षेत्र का नाम 'दशोली' पड़ा, ऐसी स्थानीय मान्यता है। इस मंदिर और क्षेत्र का ऐतिहासिक वर्णन 'स्कंद पुराण' के केदार खंड में 'दश मलेश्वर' के रूप में मिलता है, जो इसकी प्राचीनता को प्रमाणित करता है।
मंदिर परिसर की विशेषताएँ
मंदिर के ठीक सामने एक पवित्र कुंड स्थित है, जिसके जल से श्रद्धालु भगवान महादेव का जलाभिषेक करते हैं। परिसर में आज भी रावण का विशाल हवन कुंड और 'रावण शिला' मौजूद है, जिस पर रावण की उंगलियों के निशान बताए जाते हैं। गर्भगृह में स्वयंभू शिवलिंग के साथ नंदीश्वर महाराज विराजमान हैं। यहाँ भगवान शिव के साथ-साथ रावण की भी पूजा की जाती है — यह इस मंदिर की एक अनूठी परंपरा है।
परिसर में माता दुर्गा, गणेश जी, हनुमान जी और शनिदेव की प्राचीन प्रतिमाएँ भी स्थापित हैं, जो इसे एक समग्र धार्मिक केंद्र बनाती हैं।
मुख्यमंत्री धामी का संदेश
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक वीडियो साझा करते हुए लिखा, 'चमोली जिले में मौजूद श्री बैरासकुंड महादेव मंदिर, भगवान शिव को समर्पित एक पुराना और मशहूर शिव धाम है। माना जाता है कि लंका के राजा रावण ने यहाँ भगवान शिव की बहुत कड़ी तपस्या की थी। इस पवित्र जगह का जिक्र स्कंद पुराण में भी मिलता है। चमोली आने पर श्री बैरासकुंड महादेव के दिव्य दर्शन जरूर करें।' उनके इस संदेश के बाद मंदिर को लेकर श्रद्धालुओं में जिज्ञासा और बढ़ गई है।
धार्मिक आयोजन और श्रद्धालुओं की भीड़
फागुन मास की शिवरात्रि और श्रावण मास (सावन) के दौरान यहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। इन अवसरों पर मंदिर समिति द्वारा भव्य मेलों और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है। गौरतलब है कि यह मंदिर देवभूमि उत्तराखंड के उन दुर्लभ तीर्थों में से एक है जहाँ पौराणिक आख्यान, प्राकृतिक सौंदर्य और जीवंत लोक-परंपरा एक साथ मिलती हैं।
कैसे पहुँचें
नंदप्रयाग से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह मंदिर सड़क मार्ग से पहुँचा जा सकता है। चमोली जिले की यात्रा पर आने वाले तीर्थयात्री और पर्यटक इस स्थल को अपनी यात्रा सूची में अवश्य शामिल कर सकते हैं। आस्था और इतिहास के इस अनूठे संगम को देखने के लिए देशभर से श्रद्धालु यहाँ आते हैं।