27 अक्टूबर 2026
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चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, केंद्र ने कहा — AI कंटेंट और मॉर्फ्ड तस्वीरों पर भी बनेगा पॉलिसी फ्रेमवर्क

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चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, केंद्र ने कहा — AI कंटेंट और मॉर्फ्ड तस्वीरों पर भी बनेगा पॉलिसी फ्रेमवर्क

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय में चाइल्ड पोर्नोग्राफी याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र ने व्यापक पॉलिसी फ्रेमवर्क का संकेत दिया — जिसमें AI कंटेंट, मॉर्फ्ड तस्वीरें, बिना सहमति की अश्लील सामग्री और इंटरनेट प्लेटफॉर्म की बढ़ी जवाबदेही शामिल होगी। तीसरे पक्ष को शिकायत का अधिकार देने का प्रस्ताव भी सामने आया।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय में 27 अक्टूबर 2026 को चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर प्रतिबंध की माँग वाली याचिका पर सुनवाई हुई।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि केंद्र एक व्यापक पॉलिसी फ्रेमवर्क तैयार कर रहा है।
फ्रेमवर्क में AI-जनित अश्लील कंटेंट , मॉर्फ्ड तस्वीरें और बिना सहमति की अश्लील सामग्री भी शामिल होगी।
इंटरनेट प्लेटफॉर्म और इंटरमीडियरीज को कंटेंट हटाने के साथ-साथ अधिकारियों को तुरंत सूचित करने की जिम्मेदारी दी जा सकती है।
प्रस्तावित फ्रेमवर्क के तहत तीसरा पक्ष भी सद्भावना के आधार पर शिकायत दर्ज करा सकेगा।

सर्वोच्च न्यायालय में 27 अक्टूबर 2026 को चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर प्रतिबंध की माँग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि वह इस मुद्दे को अत्यंत गंभीरता से ले रही है और एक व्यापक पॉलिसी फ्रेमवर्क तैयार करने की प्रक्रिया में है। प्रस्तावित फ्रेमवर्क केवल बच्चों से जुड़े अश्लील कंटेंट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से निर्मित आपत्तिजनक सामग्री, मॉर्फ्ड तस्वीरें और बिना सहमति के साझा की गई अश्लील सामग्री को भी इसके दायरे में लाया जाएगा।

अदालत में केंद्र का पक्ष

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश की पीठ को बताया कि प्रस्तावित विधायी ढाँचा बहुआयामी होगा। उन्होंने कहा कि केवल चाइल्ड पोर्नोग्राफी को रोकने के बजाय, इसमें बिना सहमति के अश्लील कंटेंट साझा करने से जुड़ी तमाम चुनौतियों को भी संबोधित किया जाएगा। मेहता ने अदालत को बताया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ऐसी सामग्री के बढ़ते प्रचलन को देखते हुए एक प्रभावी नियामकीय व्यवस्था की तत्काल आवश्यकता है।

AI और मॉर्फ्ड कंटेंट पर विशेष चिंता

सॉलिसिटर जनरल ने विशेष रूप से AI की सहायता से तैयार किए जा रहे आपत्तिजनक कंटेंट पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि ऐसी तस्वीरें और वीडियो तेज़ी से बढ़ रही हैं जिनमें किसी वास्तविक व्यक्ति का चेहरा किसी अन्य के शरीर पर जोड़ दिया जाता है — यह अपने आप में एक नई और गंभीर चुनौती है। उन्होंने इसे डिजिटल युग की सबसे जटिल समस्याओं में से एक बताया।

इंटरनेट प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी बढ़ेगी

मेहता ने पीठ को बताया कि प्रस्तावित विधेयक के अंतर्गत इंटरनेट प्लेटफॉर्म और अन्य मध्यस्थों (इंटरमीडियरीज) की जवाबदेही को व्यापक रूप से बढ़ाया जा सकता है। उनकी भूमिका महज आपत्तिजनक कंटेंट हटाने तक नहीं रहेगी — ऐसी सामग्री अपलोड होते ही संबंधित अधिकारियों को तत्काल सूचित करने की बाध्यता भी उन पर डाली जा सकती है। यह प्रावधान मौजूदा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के ढाँचे में एक उल्लेखनीय विस्तार होगा।

शिकायत प्रक्रिया का दायरा बढ़ेगा

केंद्र सरकार ने यह भी बताया कि प्रस्तावित फ्रेमवर्क के तहत शिकायत दर्ज कराने का अधिकार केवल पीड़ित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगा। सद्भावना के आधार पर कोई भी तीसरा व्यक्ति ऐसे मामलों में शिकायत कर सकेगा। यह प्रावधान उन मामलों में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण होगा जहाँ पीड़ित — खासकर नाबालिग — स्वयं शिकायत दर्ज करने में असमर्थ हों।

आगे की राह

गौरतलब है कि यह याचिका ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट में आई है जब भारत में डिजिटल यौन अपराधों से जुड़े मामलों में तेज़ वृद्धि दर्ज की जा रही है। केंद्र सरकार ने अदालत को संकेत दिया है कि नीति-निर्माण की प्रक्रिया जारी है और जल्द ही एक ठोस विधायी प्रस्ताव सामने आएगा। सर्वोच्च न्यायालय इस मामले की आगे भी निगरानी करेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसमें कोई समय-सीमा या विधायी प्रतिबद्धता नहीं है, जो एक महत्त्वपूर्ण खामी है। AI-जनित और मॉर्फ्ड कंटेंट को शामिल करना स्वागतयोग्य विस्तार है, किंतु इंटरमीडियरी दायित्व का प्रश्न वर्षों से लंबित है — 2021 के IT नियमों के बाद भी प्रवर्तन कमज़ोर रहा है। असली परीक्षा यह होगी कि क्या नया फ्रेमवर्क प्लेटफॉर्म कंपनियों पर वास्तविक दबाव डाल पाएगा, या वे तकनीकी अनुपालन दिखाकर जवाबदेही से बचती रहेंगी।
RashtraPress
27 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट में चाइल्ड पोर्नोग्राफी याचिका पर क्या हुआ?
27 अक्टूबर 2026 को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि वह चाइल्ड पोर्नोग्राफी और संबंधित डिजिटल अपराधों से निपटने के लिए एक व्यापक पॉलिसी फ्रेमवर्क तैयार कर रही है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष यह जानकारी दी।
केंद्र के प्रस्तावित पॉलिसी फ्रेमवर्क में क्या-क्या शामिल होगा?
प्रस्तावित फ्रेमवर्क में चाइल्ड पोर्नोग्राफी के अलावा AI-जनित आपत्तिजनक कंटेंट, मॉर्फ्ड तस्वीरें और बिना सहमति के साझा की गई अश्लील सामग्री को भी शामिल किया जाएगा। इंटरनेट प्लेटफॉर्म और मध्यस्थों (इंटरमीडियरीज) की जिम्मेदारी बढ़ाने और तीसरे पक्ष को शिकायत का अधिकार देने का भी प्रस्ताव है।
AI और मॉर्फ्ड कंटेंट पर सरकार की क्या चिंता है?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में बताया कि AI की मदद से ऐसी तस्वीरें और वीडियो बनाए जा रहे हैं जिनमें किसी वास्तविक व्यक्ति का चेहरा दूसरे के शरीर पर लगाया जाता है। उन्होंने इसे डिजिटल माध्यमों पर एक गंभीर और बढ़ती चुनौती बताया जिसके लिए प्रभावी नियामकीय व्यवस्था ज़रूरी है।
इंटरनेट प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी कैसे बदलेगी?
प्रस्तावित विधेयक के तहत इंटरनेट प्लेटफॉर्म और मध्यस्थों को केवल आपत्तिजनक कंटेंट हटाने की बजाय उसके अपलोड होते ही संबंधित अधिकारियों को तत्काल सूचित करना होगा। यह मौजूदा व्यवस्था से एक महत्त्वपूर्ण बदलाव होगा जो प्लेटफॉर्म की जवाबदेही को काफी बढ़ाएगा।
तीसरे पक्ष को शिकायत का अधिकार क्यों दिया जा रहा है?
प्रस्तावित फ्रेमवर्क के तहत पीड़ित के अलावा कोई भी तीसरा व्यक्ति सद्भावना के आधार पर शिकायत दर्ज करा सकेगा। यह प्रावधान उन मामलों में महत्त्वपूर्ण है जहाँ पीड़ित — विशेषकर नाबालिग — स्वयं शिकायत करने की स्थिति में नहीं होते।
राष्ट्र प्रेस
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