चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: इंस्टाग्राम-एक्स की रिपोर्टिंग विफलता पर केंद्र को नोटिस
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 14 अगस्त 2026 को केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए पूछा कि इंस्टाग्राम और एक्स (X) जैसे सोशल मीडिया मध्यस्थ बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री की सूचना पुलिस और अन्य संबंधित एजेंसियों को क्यों नहीं दे रहे हैं। यह कदम एनजीओ जस्ट राइट्स फॉर चाइल्ड की उस अर्जी पर उठाया गया है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि केंद्र और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म न्यायालय के अपने ही 2024 के निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
2 सितंबर 2024 को सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया था कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी को डाउनलोड करना या देखना भारतीय कानून के तहत एक दंडनीय अपराध है। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया था कि सोशल मीडिया मध्यस्थों — चाहे वे मेटा, टेलीग्राम या कोई अन्य प्लेटफॉर्म हों — की कानूनी जिम्मेदारी है कि ऐसी सामग्री सामने आते ही वे उसे अवरुद्ध करें और पुलिस को तत्काल सूचित करें। गौरतलब है कि इस फैसले के बावजूद अनुपालन की स्थिति संतोषजनक नहीं रही, जिसके कारण यह याचिका दायर हुई।
एनजीओ की अर्जी और न्यायालय का रुख
जस्ट राइट्स फॉर चाइल्ड ने अपनी अर्जी में तर्क दिया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण के वीडियो न केवल तेज़ी से फैल रहे हैं, बल्कि कथित तौर पर उन्हें सक्रिय रूप से बढ़ावा भी दिया जा रहा है। अर्जी में यह भी कहा गया कि इन प्लेटफॉर्मों द्वारा पुलिस को रिपोर्ट न करने की प्रवृत्ति न्यायालय के आदेश की अवमानना के समान है। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से जवाब माँगा है।
वरिष्ठ अधिवक्ता का बयान
वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फुल्का ने कहा, 'इंस्टाग्राम पर बच्चों के यौन शोषण के वीडियो न सिर्फ तेज़ी से फैल रहे हैं, बल्कि उन्हें सक्रिय रूप से बढ़ावा भी दिया जा रहा है। 2 सितंबर 2024 को सर्वोच्च न्यायालय ने साफ़ कहा था कि सोशल मीडिया चलाने वाले सभी मध्यस्थ — चाहे वह मेटा हो, टेलीग्राम हो या कोई भी — यह उनकी ज़िम्मेदारी है कि जब भी बच्चों के यौन शोषण का कोई वीडियो सामने आए, तो वे न सिर्फ उसे ब्लॉक करें बल्कि पुलिस को इसकी रिपोर्ट भी करें।' फुल्का ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे वीडियो डाउनलोड कर वायरल करने वालों के खिलाफ पोक्सो अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है और दोषी पाए जाने पर 7 वर्ष तक की सज़ा का प्रावधान है।
कानूनी दायित्व और जवाबदेही
न्यायालय के 2024 के निर्देश के अनुसार, यदि कोई सोशल मीडिया मध्यस्थ बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) की सूचना पुलिस को नहीं देता, तो वह आपराधिक रूप से उत्तरदायी माना जाएगा। यह प्रावधान सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और पोक्सो अधिनियम दोनों के अंतर्गत लागू होता है। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर भी बड़े तकनीकी प्लेटफॉर्मों पर बाल सुरक्षा को लेकर दबाव बढ़ रहा है।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से निर्धारित समय-सीमा में जवाब माँगा है। अगली सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि सरकार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए क्या ठोस कदम उठाने की योजना बना रही है। बाल अधिकार संगठनों का कहना है कि इस मामले का निर्णय भारत में डिजिटल बाल सुरक्षा के भविष्य की दिशा तय करेगा।