14 अगस्त 2026
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चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: इंस्टाग्राम-एक्स की रिपोर्टिंग विफलता पर केंद्र को नोटिस

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चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: इंस्टाग्राम-एक्स की रिपोर्टिंग विफलता पर केंद्र को नोटिस

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ही 2024 के आदेश की अनदेखी पर केंद्र को नोटिस थमाया — इंस्टाग्राम और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म बाल यौन शोषण सामग्री की रिपोर्ट पुलिस को नहीं दे रहे। पोक्सो के तहत 7 साल की सज़ा का प्रावधान है, फिर भी अनुपालन शून्य है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 14 अगस्त 2026 को केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर सोशल मीडिया मध्यस्थों की रिपोर्टिंग विफलता पर जवाब माँगा।
एनजीओ जस्ट राइट्स फॉर चाइल्ड ने अर्जी में आरोप लगाया कि इंस्टाग्राम और एक्स न्यायालय के 2 सितंबर 2024 के आदेश का पालन नहीं कर रहे।
2024 के फैसले में न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी देखना-डाउनलोड करना अपराध है और मध्यस्थों को पुलिस को सूचित करना अनिवार्य है।
रिपोर्ट न करने पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म आपराधिक रूप से जवाबदेह माने जाएंगे।
ऐसी सामग्री डाउनलोड कर वायरल करने पर पोक्सो अधिनियम के तहत 7 वर्ष तक की सज़ा का प्रावधान।

सर्वोच्च न्यायालय ने 14 अगस्त 2026 को केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए पूछा कि इंस्टाग्राम और एक्स (X) जैसे सोशल मीडिया मध्यस्थ बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री की सूचना पुलिस और अन्य संबंधित एजेंसियों को क्यों नहीं दे रहे हैं। यह कदम एनजीओ जस्ट राइट्स फॉर चाइल्ड की उस अर्जी पर उठाया गया है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि केंद्र और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म न्यायालय के अपने ही 2024 के निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

2 सितंबर 2024 को सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया था कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी को डाउनलोड करना या देखना भारतीय कानून के तहत एक दंडनीय अपराध है। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया था कि सोशल मीडिया मध्यस्थों — चाहे वे मेटा, टेलीग्राम या कोई अन्य प्लेटफॉर्म हों — की कानूनी जिम्मेदारी है कि ऐसी सामग्री सामने आते ही वे उसे अवरुद्ध करें और पुलिस को तत्काल सूचित करें। गौरतलब है कि इस फैसले के बावजूद अनुपालन की स्थिति संतोषजनक नहीं रही, जिसके कारण यह याचिका दायर हुई।

एनजीओ की अर्जी और न्यायालय का रुख

जस्ट राइट्स फॉर चाइल्ड ने अपनी अर्जी में तर्क दिया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण के वीडियो न केवल तेज़ी से फैल रहे हैं, बल्कि कथित तौर पर उन्हें सक्रिय रूप से बढ़ावा भी दिया जा रहा है। अर्जी में यह भी कहा गया कि इन प्लेटफॉर्मों द्वारा पुलिस को रिपोर्ट न करने की प्रवृत्ति न्यायालय के आदेश की अवमानना के समान है। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से जवाब माँगा है।

वरिष्ठ अधिवक्ता का बयान

वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फुल्का ने कहा, 'इंस्टाग्राम पर बच्चों के यौन शोषण के वीडियो न सिर्फ तेज़ी से फैल रहे हैं, बल्कि उन्हें सक्रिय रूप से बढ़ावा भी दिया जा रहा है। 2 सितंबर 2024 को सर्वोच्च न्यायालय ने साफ़ कहा था कि सोशल मीडिया चलाने वाले सभी मध्यस्थ — चाहे वह मेटा हो, टेलीग्राम हो या कोई भी — यह उनकी ज़िम्मेदारी है कि जब भी बच्चों के यौन शोषण का कोई वीडियो सामने आए, तो वे न सिर्फ उसे ब्लॉक करें बल्कि पुलिस को इसकी रिपोर्ट भी करें।' फुल्का ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे वीडियो डाउनलोड कर वायरल करने वालों के खिलाफ पोक्सो अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है और दोषी पाए जाने पर 7 वर्ष तक की सज़ा का प्रावधान है।

कानूनी दायित्व और जवाबदेही

न्यायालय के 2024 के निर्देश के अनुसार, यदि कोई सोशल मीडिया मध्यस्थ बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) की सूचना पुलिस को नहीं देता, तो वह आपराधिक रूप से उत्तरदायी माना जाएगा। यह प्रावधान सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और पोक्सो अधिनियम दोनों के अंतर्गत लागू होता है। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर भी बड़े तकनीकी प्लेटफॉर्मों पर बाल सुरक्षा को लेकर दबाव बढ़ रहा है।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से निर्धारित समय-सीमा में जवाब माँगा है। अगली सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि सरकार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए क्या ठोस कदम उठाने की योजना बना रही है। बाल अधिकार संगठनों का कहना है कि इस मामले का निर्णय भारत में डिजिटल बाल सुरक्षा के भविष्य की दिशा तय करेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

पर न मेटा झुका, न सरकार ने दबाव बनाया। असली सवाल यह है कि क्या भारत के पास सोशल मीडिया दिग्गजों को वास्तव में जवाबदेह ठहराने का तंत्र है, या नोटिस और सुनवाइयाँ ही अंत बन जाती हैं। वैश्विक स्तर पर EU के DSA और अमेरिका के EARN IT Act जैसे कानून इन प्लेटफॉर्मों पर शिकंजा कस रहे हैं, जबकि भारत में IT नियमों की समीक्षा अधूरी पड़ी है। बिना दंडात्मक प्रवर्तन ढाँचे के, यह नोटिस भी पिछले आदेशों की तरह कागज़ पर ही रह सकता है।
RashtraPress
14 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को नोटिस क्यों जारी किया?
सर्वोच्च न्यायालय ने 14 अगस्त 2026 को केंद्र को नोटिस जारी कर पूछा कि इंस्टाग्राम और एक्स जैसे सोशल मीडिया मध्यस्थ बाल यौन शोषण सामग्री की रिपोर्ट पुलिस को क्यों नहीं दे रहे। यह नोटिस एनजीओ जस्ट राइट्स फॉर चाइल्ड की उस अर्जी पर आया जिसमें 2024 के न्यायालय के आदेश के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था।
सर्वोच्च न्यायालय का 2024 का चाइल्ड पोर्नोग्राफी फैसला क्या था?
2 सितंबर 2024 को सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी देखना और डाउनलोड करना कानूनी अपराध है। साथ ही निर्देश दिया गया था कि मेटा, टेलीग्राम सहित सभी सोशल मीडिया मध्यस्थ ऐसी सामग्री मिलते ही उसे ब्लॉक करें और पुलिस को तत्काल सूचित करें।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रिपोर्ट न करें तो क्या होगा?
न्यायालय के निर्देश के अनुसार, यदि कोई सोशल मीडिया मध्यस्थ बाल यौन शोषण सामग्री की रिपोर्ट पुलिस को नहीं देता, तो वह आपराधिक रूप से जवाबदेह माना जाएगा। यह दायित्व सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और पोक्सो अधिनियम दोनों के तहत लागू होता है।
ऐसी सामग्री डाउनलोड या वायरल करने पर क्या सज़ा है?
वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फुल्का के अनुसार, बाल यौन शोषण सामग्री डाउनलोड कर वायरल करने वालों के खिलाफ पोक्सो अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है और दोषी पाए जाने पर 7 वर्ष तक की सज़ा हो सकती है।
जस्ट राइट्स फॉर चाइल्ड कौन है और इसने याचिका क्यों दायर की?
जस्ट राइट्स फॉर चाइल्ड एक एनजीओ है जो बाल अधिकारों के लिए काम करती है। इसने सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी दायर कर आरोप लगाया कि केंद्र सरकार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 2024 के न्यायालय के आदेश का पालन नहीं कर रहे, जिसके बाद न्यायालय ने केंद्र को नोटिस जारी किया।
राष्ट्र प्रेस
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