CM धामी ने काशीपुर में छात्रों से संवाद किया, 2,67,744 विचारों वाले 'मेरे सपनों का उत्तराखंड' अभियान की समीक्षा
सारांश
मुख्य बातें
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 19 सितंबर 2026 को काशीपुर में आयोजित युवा छात्र संवाद कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया। इस अवसर पर उन्होंने राज्य के 11वीं और 12वीं कक्षा के विद्यार्थियों से सीधा संवाद किया और 'मेरे सपनों का उत्तराखंड कैसा होगा' विषय पर चले व्यापक अभियान का विवरण साझा किया। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि युवाओं की मांगों पर तार्किक और सकारात्मक बातचीत आज के दौर की सबसे बड़ी जरूरत है।
अभियान का विस्तार और भागीदारी
10 अगस्त 2026 से प्रदेशभर में शुरू हुए इस संवाद अभियान में 2,67,744 प्रतिभागियों ने उत्तराखंड के भविष्य को लेकर अपने विचार लिखित रूप में प्रस्तुत किए। इनमें से चयनित 140 प्रतिभागियों को सीधे संवाद के लिए आमंत्रित किया गया और उन्हें पुरस्कृत भी किया गया। धामी ने कहा कि विद्यार्थियों में जागरूकता और वैचारिक परिपक्वता का स्तर उत्साहजनक है।
मुख्यमंत्री के अनुसार, प्रदेश की नई पीढ़ी में सोचने और समझने की गहरी क्षमता है — जरूरत केवल उन्हें उचित दिशा और अवसर देने की है। उन्होंने संकेत दिया कि यह संवाद प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी।
छात्रों को टैबलेट देने का निर्णय
कार्यक्रम में विद्यार्थियों को डिजिटल उपकरण उपलब्ध कराने के सवाल पर मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि सरकार जल्द इस दिशा में ठोस कदम उठाएगी। उन्होंने स्वीकार किया कि कई परिवार आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं और उनके बच्चों के पास डिजिटल संसाधन नहीं हैं। इसलिए सरकार ने ऐसे विद्यार्थियों को टैबलेट उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है, ताकि वे तेज़ी से बदलती तकनीकी दुनिया में पीछे न रह जाएं।
युवाओं की मांगों पर सरकार का रुख
युवाओं के किसी मुद्दे पर भटकने की आशंका वाले सवाल पर धामी ने कहा कि युवा अपनी माँगें सही तरीके से उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि युवाओं की उचित माँगों को स्वीकार किया जाना चाहिए और उनकी बात बैठकर सुनी जानी चाहिए। मुख्यमंत्री ने ज़ोर दिया कि युवाओं की समस्याओं और माँगों पर संवाद हमेशा तार्किक और रचनात्मक होना चाहिए।
आगे क्या
यह ऐसे समय में आया है जब उत्तराखंड सरकार युवा रोज़गार और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर विभिन्न मोर्चों पर सक्रिय है। 'मेरे सपनों का उत्तराखंड' जैसी पहल नीति-निर्माण में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक प्रयोग के रूप में देखी जा रही है। आने वाले महीनों में सरकार द्वारा इन विचारों को नीतिगत दस्तावेज़ों में कैसे शामिल किया जाता है, यही इस पहल की असली कसौटी होगी।