7 अक्टूबर 2026
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दिल्ली हाई कोर्ट का निर्देश: पुलिस और RAF के बॉडी कैमरा SOP पर 6 महीने में फैसला लें

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दिल्ली हाई कोर्ट का निर्देश: पुलिस और RAF के बॉडी कैमरा SOP पर 6 महीने में फैसला लें

सारांश

दिल्ली हाई कोर्ट ने जंतर-मंतर झड़पों के बाद दायर PIL पर सरकार को निर्देश दिया है कि पुलिस और RAF के लिए बॉडी कैमरा SOP पर 6 महीने में फैसला लें — एक कदम जो भीड़ नियंत्रण में पारदर्शिता की लंबित माँग को नई गति दे सकता है।

मुख्य बातें

दिल्ली हाई कोर्ट ने 7 अक्टूबर 2026 को सरकार को निर्देश दिया कि दिल्ली पुलिस और RAF के बॉडी कैमरा SOP पर 6 महीने के भीतर निर्णय लिया जाए।
आदेश वकील चाहत राघव की PIL पर एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन वासुदेव साम्ब्रे और जस्टिस अरुण भारद्वाज की पीठ ने दिया।
PIL की पृष्ठभूमि जुलाई 2026 में जंतर-मंतर पर हुई झड़पें हैं, जिनमें 50 से अधिक पुलिस एवं अर्धसैनिक कर्मी घायल हुए थे।
सीनियर वकील अखिल सिबल ने तर्क दिया कि मौजूदा प्रणाली बाहरी वीडियोग्राफरों पर निर्भर है और रियल-टाइम रिकॉर्डिंग का कोई ठोस तंत्र नहीं।
एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि सरकार 6 महीने में याचिकाकर्ता को अपना निर्णय सूचित करेगी।

दिल्ली हाई कोर्ट ने 7 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह भीड़ नियंत्रण और विरोध-प्रदर्शनों के प्रबंधन में तैनात दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के कर्मियों के लिए बॉडी कैमरों के अनिवार्य उपयोग हेतु एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) पर छह महीने के भीतर निर्णय ले। अदालत ने इस मामले से जुड़ी जनहित याचिका (PIL) का निपटारा करते हुए यह आदेश पारित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह PIL वकील चाहत राघव द्वारा दायर की गई थी। इसकी पृष्ठभूमि जुलाई 2026 में जंतर-मंतर पर हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हुई झड़पों में है, जिनमें कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सदस्य और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी शामिल थे। उन झड़पों में छात्र प्रदर्शनकारियों के साथ-साथ 50 से अधिक पुलिस और अर्धसैनिक कर्मी घायल हो गए थे। याचिका में माँग की गई थी कि ऑपरेशन के दौरान बॉडी कैमरों का उपयोग अनिवार्य किया जाए ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।

अदालत की टिप्पणियाँ और निर्देश

एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन वासुदेव साम्ब्रे और जस्टिस अरुण भारद्वाज की खंडपीठ ने सुनवाई के बाद PIL को एक 'रिप्रेजेंटेशन' के रूप में माना और निर्देश दिया कि सरकार इस पर छह महीने के भीतर अपना निर्णय याचिकाकर्ता को सूचित करे। अदालत ने कहा कि PIL क्षेत्राधिकार का उपयोग करने से पहले संबंधित अधिकारियों के समक्ष प्रतिनिधित्व दिया जाना ज़रूरी था।

याचिकाकर्ता का पक्ष

याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर वकील अखिल सिबल ने तर्क दिया कि दिल्ली पुलिस की मौजूदा व्यवस्था बाहरी वीडियोग्राफरों पर निर्भर है जो घेरे के बाहर तैनात रहते हैं। उनके अनुसार, इस प्रणाली में भीड़ नियंत्रण अभियानों के दौरान तैनात कर्मियों की गतिविधियों की रियल-टाइम रिकॉर्डिंग का कोई ठोस तंत्र नहीं है।

सिबल ने कहा, 'अगर टेक्नोलॉजी उपलब्ध है, तो जरूरत पड़ने पर जवाबदेही तय करने में यह बहुत काम आ सकती है। यह फेशियल रिकग्निशन से अलग है, जिसमें निगरानी को लेकर चिंताएँ होती हैं।' उनका तर्क था कि बॉडी कैमरे पुलिस और प्रदर्शनकारियों — दोनों के हितों की रक्षा कर सकते हैं।

केंद्र सरकार का रुख

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने केंद्र की ओर से कहा कि याचिका को रिप्रेजेंटेशन के तौर पर लिया जा सकता है और छह महीने के भीतर निर्णय सूचित कर दिया जाएगा। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के एक पूर्व फैसले और दिल्ली हाई कोर्ट के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि PIL दायर करने से पहले संबंधित अधिकारियों के समक्ष अनुरोध प्रस्तुत करना अनिवार्य था।

केंद्र ने यह भी स्पष्ट किया कि विरोध-प्रदर्शनों के प्रबंधन के लिए पहले से ही दिशानिर्देश मौजूद हैं और मौजूदा प्रणाली में वीडियोग्राफी का प्रावधान पहले से है।

आगे की राह

गौरतलब है कि यह मामला उस व्यापक बहस का हिस्सा है जो देशभर में पुलिस पारदर्शिता और जवाबदेही के इर्द-गिर्द उठ रही है। बॉडी कैमरों को लेकर SOP का निर्माण एक नीतिगत प्रश्न है जो न केवल दिल्ली, बल्कि अन्य राज्यों में भी प्रासंगिक है। अब सरकार के पास छह महीने का समय है कि वह याचिकाकर्ता को अपना निर्णय सूचित करे — यह निर्णय भविष्य में भीड़ प्रबंधन ऑपरेशनों की कार्यप्रणाली को नई दिशा दे सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसके निहितार्थ गहरे हैं — यह पहली बार है जब किसी अदालत ने भीड़ नियंत्रण में बॉडी कैमरा जवाबदेही को नीतिगत एजेंडे पर ज़बरदस्ती रखा है। असली सवाल यह है कि सरकार 6 महीने में SOP बनाएगी या इसे एक और 'प्रतीक्षा सूची' में डाल देगी — जहाँ पहले से कई जवाबदेही सुधार पड़े हुए हैं। जंतर-मंतर जैसी घटनाएँ बार-बार दिखाती हैं कि बिना रियल-टाइम रिकॉर्डिंग के, दोनों पक्षों के दावे अप्रमाणित रह जाते हैं।
RashtraPress
7 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दिल्ली हाई कोर्ट का बॉडी कैमरा SOP मामले में क्या निर्देश है?
दिल्ली हाई कोर्ट ने 7 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह दिल्ली पुलिस और RAF के लिए बॉडी कैमरों के उपयोग हेतु SOP बनाने के प्रश्न पर 6 महीने के भीतर अपना निर्णय याचिकाकर्ता को सूचित करे। PIL को रिप्रेजेंटेशन के रूप में मानते हुए अदालत ने मामले का निपटारा कर दिया।
यह PIL किसने दायर की और क्यों?
यह PIL वकील चाहत राघव ने दायर की थी। इसका उद्देश्य भीड़ नियंत्रण और विरोध-प्रदर्शन प्रबंधन के दौरान तैनात पुलिस और RAF कर्मियों के लिए बॉडी कैमरों का अनिवार्य उपयोग सुनिश्चित करना था, ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे।
जंतर-मंतर पर जुलाई 2026 में क्या हुआ था?
जुलाई 2026 में जंतर-मंतर पर हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान झड़पें हुईं, जिनमें CJP सदस्य और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक शामिल थे। इन झड़पों में 50 से अधिक पुलिस और अर्धसैनिक कर्मी घायल हो गए थे, और इसी घटना के बाद यह PIL दायर की गई।
बॉडी कैमरे क्यों ज़रूरी बताए जा रहे हैं?
सीनियर वकील अखिल सिबल के अनुसार, दिल्ली पुलिस की मौजूदा वीडियोग्राफी व्यवस्था बाहरी वीडियोग्राफरों पर निर्भर है जो घेरे के बाहर होते हैं, जिससे तैनात कर्मियों की गतिविधियों की रियल-टाइम रिकॉर्डिंग नहीं हो पाती। बॉडी कैमरे पुलिस और प्रदर्शनकारियों — दोनों के हितों की रक्षा और जवाबदेही सुनिश्चित करने में सहायक हो सकते हैं।
केंद्र सरकार का इस मामले में क्या रुख है?
एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने बताया कि सरकार याचिका को रिप्रेजेंटेशन के रूप में मानने और 6 महीने में निर्णय सूचित करने पर सहमत है। केंद्र ने यह भी कहा कि विरोध-प्रदर्शन प्रबंधन के लिए पहले से दिशानिर्देश मौजूद हैं और वीडियोग्राफी का प्रावधान पहले से है।
राष्ट्र प्रेस
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