24 जुलाई 2026
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जंतर-मंतर निगरानी मामला: केंद्र ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा — सार्वजनिक स्थानों पर निजता का दावा नहीं चलता

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जंतर-मंतर निगरानी मामला: केंद्र ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा — सार्वजनिक स्थानों पर निजता का दावा नहीं चलता

सारांश

जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की निगरानी का मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुँचा। केंद्र ने सार्वजनिक स्थानों पर निजता के दावे को खारिज किया, जबकि याचिकाकर्ता ने एआई चेहरा पहचान तकनीक के बेरोकटोक इस्तेमाल पर सवाल उठाए। अगली सुनवाई 27 जुलाई को।

मुख्य बातें

दिल्ली उच्च न्यायालय ने जंतर-मंतर निगरानी मामले की सुनवाई 27 जुलाई 2026 तक स्थगित की।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा — सार्वजनिक स्थानों पर निजता का दावा नहीं चलता, वीडियो रिकॉर्डिंग सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों पर आधारित है।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी 16 से 19 वर्ष के युवाओं की रिकॉर्डिंग कर रहे थे।
कथित तौर पर एआई-आधारित चेहरा पहचान प्रणाली वाले वाहनों के उपयोग का आरोप, पुलिस ने अदालत में केवल वीडियो रिकॉर्डिंग स्वीकार की।
इसी विषय से जुड़ी अन्य याचिकाएँ 12 सितंबर को सूचीबद्ध; मुख्य न्यायाधीश ने मामले को जोड़ने का सुझाव दिया।

नई दिल्ली में दिल्ली उच्च न्यायालय ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की निगरानी और निजता के अधिकार से जुड़े मामले की सुनवाई 27 जुलाई 2026 तक स्थगित कर दी है। 24 जुलाई को हुई इस सुनवाई में केंद्र सरकार और याचिकाकर्ता दोनों पक्षों ने सार्वजनिक स्थानों पर निगरानी की वैधता और संवैधानिक निजता के अधिकार पर परस्पर विरोधी दलीलें रखीं।

केंद्र सरकार का पक्ष

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि सार्वजनिक स्थानों पर निजता के अधिकार का दावा नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि बड़े सार्वजनिक प्रदर्शनों की वीडियो रिकॉर्डिंग कानून-व्यवस्था बनाए रखने की एक स्वीकृत और आवश्यक प्रक्रिया है।

मेहता ने स्पष्ट किया कि यह रिकॉर्डिंग सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद जारी स्थायी आदेश के अंतर्गत की जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रदर्शन के दौरान किसी अप्रिय घटना की स्थिति में दोषियों की पहचान के लिए वीडियो साक्ष्य अनिवार्य होते हैं। उनका तर्क था कि जब प्रदर्शनकारी स्वयं वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा करते हैं, तो सार्वजनिक स्थान पर पूर्ण निजता की अपेक्षा तर्कसंगत नहीं है।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने पलटवार करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के निजता के अधिकार से संबंधित ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया गया है कि सार्वजनिक स्थानों और प्रदर्शनों के दौरान भी नागरिकों को निजता का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की निगरानी के लिए सुस्पष्ट कानून, निर्धारित प्रक्रिया और पर्याप्त सुरक्षा उपायों का होना अनिवार्य है।

याचिकाकर्ता के वकील ने आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर सादे कपड़ों में तैनात पुलिसकर्मी कैमरों के माध्यम से 16 से 19 वर्ष की आयु के युवाओं की रिकॉर्डिंग कर रहे थे। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि कुछ रिपोर्टों में एआई-आधारित चेहरा पहचान प्रणाली (Facial Recognition Technology) से लैस वाहनों के इस्तेमाल की बात सामने आई है, जबकि पुलिस ने अदालत में केवल वीडियो रिकॉर्डिंग की जानकारी दी है।

वकील ने रेखांकित किया कि चेहरा पहचान प्रणाली के आधार पर किसी व्यक्ति के विरुद्ध गंभीर कार्रवाई हो सकती है, इसलिए ऐसी निगरानी के लिए स्पष्ट कानूनी ढाँचा और डेटा सुरक्षा के कड़े नियम आवश्यक हैं।

मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि निगरानी और निजता से जुड़े कानूनी पहलुओं पर अदालत को पहले अपना स्पष्ट रुख तय करना होगा। उन्होंने यह भी बताया कि इसी विषय से संबंधित कुछ अन्य याचिकाएँ 12 सितंबर को सूचीबद्ध हैं और यदि याचिकाकर्ता चाहे तो इस मामले को उन याचिकाओं के साथ जोड़ने का अनुरोध कर सकता है।

हालाँकि याचिकाकर्ता के वकील ने इस सुझाव से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि लंबित याचिकाएँ 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई से संबंधित हैं, जबकि उनकी याचिका उससे पूर्व दाखिल की गई थी और उसका मूल मुद्दा निगरानी तथा निजता का अधिकार है — जो एक व्यापक संवैधानिक प्रश्न है।

आगे क्या होगा

यह ऐसे समय में आया है जब देश में एआई-आधारित निगरानी और डेटा संरक्षण कानून को लेकर बहस तेज़ हो रही है। गौरतलब है कि भारत में अभी तक चेहरा पहचान तकनीक के उपयोग को नियंत्रित करने वाला कोई विशेष कानून नहीं है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 27 जुलाई 2026 को निर्धारित की है, जिसमें दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनी जाएंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

क्योंकि स्वैच्छिक प्रकटीकरण और राज्य-संचालित निगरानी में मौलिक अंतर है। आलोचकों का कहना है कि एआई-आधारित निगरानी को लेकर पुलिस की अदालत में पारदर्शिता का अभाव ही सबसे बड़ी चिंता है। जब तक संसद डेटा संरक्षण और निगरानी पर स्पष्ट कानून नहीं बनाती, तब तक न्यायपालिका पर ही यह भार रहेगा कि वह नागरिक स्वतंत्रता और सुरक्षा के बीच की रेखा खींचे।
RashtraPress
24 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जंतर-मंतर निगरानी मामला क्या है?
यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर उस याचिका से जुड़ा है जिसमें जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की पुलिस द्वारा वीडियो रिकॉर्डिंग और कथित तौर पर एआई-आधारित चेहरा पहचान तकनीक के इस्तेमाल को संविधान के निजता के अधिकार का उल्लंघन बताया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस निगरानी के लिए कोई स्पष्ट कानूनी आधार नहीं है।
केंद्र सरकार ने अदालत में क्या दलील दी?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर निजता के अधिकार का दावा नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों पर आधारित स्थायी आदेश के तहत बड़े प्रदर्शनों की रिकॉर्डिंग कानून-व्यवस्था के लिए अनिवार्य है।
एआई चेहरा पहचान प्रणाली को लेकर क्या आरोप हैं?
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि कुछ रिपोर्टों में एआई-आधारित चेहरा पहचान प्रणाली वाले वाहनों के इस्तेमाल की बात सामने आई है, जबकि पुलिस ने अदालत में केवल वीडियो रिकॉर्डिंग की जानकारी दी। वकील ने चेतावनी दी कि इस तकनीक के आधार पर किसी के विरुद्ध गंभीर कार्रवाई हो सकती है, इसलिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था जरूरी है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई कब तय की है?
अदालत ने अगली सुनवाई 27 जुलाई 2026 को निर्धारित की है। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी सुझाव दिया कि इस मामले को 12 सितंबर को सूचीबद्ध संबंधित याचिकाओं के साथ जोड़ा जा सकता है, हालाँकि याचिकाकर्ता ने इससे असहमति जताई।
क्या भारत में सार्वजनिक निगरानी के लिए कोई कानून है?
फिलहाल भारत में चेहरा पहचान तकनीक या एआई-आधारित सार्वजनिक निगरानी को विशेष रूप से नियंत्रित करने वाला कोई कानून नहीं है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि बिना स्पष्ट कानूनी ढाँचे और डेटा सुरक्षा नियमों के ऐसी निगरानी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के मूल अधिकार का उल्लंघन है।
राष्ट्र प्रेस
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