दिल्ली हाईकोर्ट: न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा पर 7 जुलाई को होगी अहम सुनवाई, पुलिस से माँगी बैठक रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार, 12 मई को न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि जजों की सुरक्षा को लेकर हुई बैठक की पूरी कार्यवाही — यानी मिनट्स ऑफ मीटिंग — हलफनामे के साथ अदालत में दाखिल की जाए। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 7 जुलाई के लिए निर्धारित की है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला ज्यूडिशियल सर्विस एसोसिएशन ऑफ दिल्ली की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है। याचिका में माँग की गई है कि दिल्ली के न्यायिक अधिकारियों को उनके आवासों पर व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी (PSO) और अतिरिक्त सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जज अक्सर संवेदनशील फैसले सुनाते हैं, जिसके चलते उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा सुनिश्चित करना अनिवार्य हो जाता है।
मुख्य घटनाक्रम
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि कोर्ट के पूर्व आदेश के बाद इस विषय पर एक बैठक हो चुकी है, परंतु उसकी रिपोर्ट अब तक अदालती रिकॉर्ड पर नहीं लाई गई। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस पर नाराज़गी जताते हुए स्पष्ट किया कि बैठक की पूरी जानकारी रिकॉर्ड पर आनी चाहिए ताकि मामले को सही परिप्रेक्ष्य में समझा जा सके।
पुलिस का पक्ष
अदालत ने दिल्ली पुलिस से सीधा सवाल किया कि क्या सभी न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षा देना संभव है। पुलिस की ओर से बताया गया कि सुरक्षा व्यवस्था थ्रेट परसेप्शन यानी खतरे के आकलन के आधार पर तय की जाती है। पुलिस ने अदालत को सूचित किया कि फिलहाल 12 न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षा प्रदान की जा रही है, क्योंकि उनके संदर्भ में संभावित खतरे का आकलन किया गया है।
अदालत की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी को वास्तविक खतरा है तो उसे सुरक्षा देना स्वाभाविक और आवश्यक है। हालाँकि, अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि मूल प्रश्न यह है कि क्या सभी न्यायिक अधिकारियों को नियमित रूप से PSO और अतिरिक्त सुरक्षा दिए जाने की माँग वैध है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस विषय पर ठोस निर्णय तभी संभव होगा जब बैठक की पूरी रिपोर्ट रिकॉर्ड पर हो।
आगे क्या होगा
दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को बैठक की रिपोर्ट हलफनामे सहित दाखिल करने का निर्देश देते हुए अगली सुनवाई 7 जुलाई को तय की है। माना जा रहा है कि उस सुनवाई में अदालत इस बात पर विस्तार से विचार करेगी कि भविष्य में न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के लिए क्या दीर्घकालिक व्यवस्था बनाई जाए। यह मामला न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सुरक्षा के व्यापक सवाल से भी जुड़ा है, जो देश के विभिन्न हाईकोर्टों में समय-समय पर उठता रहा है।