विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस: अंबेडकर यूनिवर्सिटी में पार्टीशन म्यूजियम की झलकियों ने जीवंत किया बंटवारे का दर्द
सारांश
मुख्य बातें
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के अवसर पर 14 अगस्त को नई दिल्ली स्थित अंबेडकर यूनिवर्सिटी के कश्मीरी गेट कैंपस में पार्टीशन म्यूजियम की विशेष झलकियाँ प्रदर्शित की गईं। इस प्रदर्शनी ने 1947 के बंटवारे की त्रासदी को जीवंत करते हुए विस्थापन की पीड़ा, परिवारों के संघर्ष और उन अनगिनत लोगों के निजी अनुभवों को सामने रखा, जिन्होंने यह दंश प्रत्यक्ष रूप से या अपने बुजुर्गों की स्मृतियों के माध्यम से झेला।
मुख्य घटनाक्रम
कार्यक्रम में लक्ष्मी पुरी, किश्वर देसाई और बंटवारे से प्रभावित परिवारों के सदस्यों ने विभाजन की यादों तथा पीढ़ियों तक चली उसकी विरासत पर अपने विचार साझा किए। प्रभावित परिवारों के प्रतिनिधियों ने कहा कि विभाजन केवल इतिहास की किताबों में दर्ज कोई तिथि नहीं है, बल्कि लाखों परिवारों के जीवन, उनकी स्मृतियों और उनके अनवरत संघर्षों से जुड़ा एक जीवंत अनुभव है।
जलियांवाला बाग और एक सर्जन की गवाही
कर्नल अनिल भाटिया ने अपने दादा डॉ. ईशा दास भाटिया की अदम्य भूमिका से पर्दा उठाया। उन्होंने बताया कि उनके दादा अमृतसर में सर्जन थे और जलियांवाला बाग की नृशंस घटना के बाद उन्होंने बड़ी संख्या में घायलों का उपचार किया। भाटिया के अनुसार, उनके दादा ने उस रात लालटेन की रोशनी में कई घायलों का ऑपरेशन किया और उनके शरीर से गोलियाँ निकालीं — और इलाज के दौरान निकाली गई प्रत्येक गोली तथा घायलों की जानकारी को प्रमाण के रूप में दर्ज किया गया।
उन्होंने आगे बताया कि उनके दादा ने घायलों के नामों की सूचियाँ और रजिस्टर ब्रिटिश अधिकारियों को सबूत के तौर पर सौंपे थे, किंतु वे दस्तावेज़ बाद में वापस नहीं मिले। निकाली गई गोलियाँ कांग्रेस समिति, लाहौर को भी सुपुर्द की गई थीं। उस समय पंजाब में कर्फ्यू लागू था, फिर भी डॉ. भाटिया ने जोखिम उठाकर ये गोलियाँ संबंधित लोगों तक पहुँचाईं। इस मामले की जाँच में कथित तौर पर मदन मोहन मालवीय की भी भूमिका रही थी।
रावी पार कर भारत आने की दास्तान
जगमोहन भारद्वाज ने विभाजन के दौरान अपने परिवार के विस्थापन की मार्मिक कहानी सुनाई। उन्होंने बताया कि उनका परिवार शेखपुरा जिले के छोटे से गाँव कलसारा से उजड़कर भारत आया था। चूँकि उस समय वह बहुत छोटे थे, इसलिए उन्हें उस दौर की अधिक बातें सीधे याद नहीं हैं — लेकिन परिवार के बुजुर्गों से सुनी कहानियों ने उन्हें अपनी जड़ों और संघर्ष से परिचित कराया।
उन्होंने बताया कि उनके परिवार ने रावी नदी पार कर भारतीय सीमा में प्रवेश किया — उनका गाँव रावी से बहुत दूर नहीं था। भारत पहुँचने के बाद परिवार ने विस्थापन के दर्द के बावजूद अपनी ज़िंदगी नए सिरे से खड़ी की। भारद्वाज ने यह भी कहा कि विभाजन की त्रासदी से गुज़रे लोगों की भूमिका को याद रखना ज़रूरी है, और यह जानकर उन्हें संतोष हुआ कि शरणार्थियों को भी स्वतंत्रता सेनानी के रूप में स्मरण किया जा रहा है।
आम जनता पर असर
यह प्रदर्शनी केवल अतीत का दस्तावेज़ नहीं है — यह उन परिवारों की पहचान और गरिमा की पुनर्स्थापना का प्रयास है जिनकी पीड़ा दशकों तक इतिहास के हाशिये पर रही। गौरतलब है कि विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस हर वर्ष 14 अगस्त को मनाया जाता है, ताकि बंटवारे में विस्थापित हुए करोड़ों लोगों की स्मृति राष्ट्रीय चेतना में बनी रहे।
क्या होगा आगे
पार्टीशन म्यूजियम की इस तरह की प्रदर्शनियाँ देश के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में विस्तारित किए जाने की संभावना है, ताकि नई पीढ़ी बंटवारे के मानवीय पक्ष से परिचित हो सके। आयोजकों के अनुसार, ऐसे कार्यक्रम न केवल इतिहास को संरक्षित करते हैं, बल्कि सामाजिक एकता और सहानुभूति की भावना को भी मज़बूत करते हैं।