10 अगस्त 2026
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शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्मभूषण, राष्ट्रपति मुर्मु ने व्हीलचेयर पर बैठीं पत्नी रूपी सोरेन को मंच से उतरकर दिया सम्मान

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शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्मभूषण, राष्ट्रपति मुर्मु ने व्हीलचेयर पर बैठीं पत्नी रूपी सोरेन को मंच से उतरकर दिया सम्मान

सारांश

झारखंड के 'दिशोम गुरु' शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्मभूषण — राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु मंच से उतरकर व्हीलचेयर पर बैठीं पत्नी रूपी सोरेन तक गईं। जल-जंगल-जमीन और पृथक झारखंड राज्य के लिए तीन दशकों के संघर्ष को मिली यह राष्ट्रीय स्वीकृति।

मुख्य बातें

शिबू सोरेन को 23 जून 2026 को राष्ट्रपति भवन में मरणोपरांत पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।
पत्नी रूपी सोरेन ने व्हीलचेयर पर सम्मान ग्रहण किया; राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु स्वयं मंच से उतरकर उनके पास गईं।
सोरेन ने 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की स्थापना की और तीन दशकों तक पृथक राज्य आंदोलन का नेतृत्व किया।
15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य के गठन को उनके संघर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है।
वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री और कई बार दुमका से सांसद रहे; केंद्र में कोयला मंत्री का पद भी संभाला।
जन्म 11 जनवरी 1944 , रामगढ़ (अब झारखंड) के नेमरा गाँव में; पिता की हत्या ने उनके संघर्ष की नींव रखी।

झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक एवं पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को 23 जून 2026 की शाम राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में मरणोपरांत पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। उनकी पत्नी रूपी सोरेन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के हाथों यह प्रतिष्ठित सम्मान ग्रहण किया। आदिवासी अस्मिता और जल-जंगल-जमीन के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले 'दिशोम गुरु' को यह सम्मान उनकी विरासत की राष्ट्रीय स्वीकृति है।

भावुक क्षण: राष्ट्रपति मंच से उतरीं

समारोह का सबसे मार्मिक पल तब आया जब व्हीलचेयर पर पहुँचीं रूपी सोरेन के सम्मान में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु स्वयं मंच से उतरकर उनके पास गईं और पद्मभूषण प्रदान किया। इस भावुक दृश्य ने समारोह में उपस्थित सभी लोगों को गहराई से छू लिया। यह क्षण न केवल एक व्यक्तिगत सम्मान था, बल्कि आदिवासी संघर्ष की पूरी यात्रा के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक भी था।

संघर्ष की जड़ें: पिता की हत्या से जन्मा आंदोलन

शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को तत्कालीन बिहार के रामगढ़ (अब झारखंड) जिले के नेमरा गाँव में हुआ था। उनके पिता सोबरन सोरेन महाजनी शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाते थे और इसी संघर्ष के दौरान उनकी हत्या कर दी गई। पिता की इस दुखद मृत्यु ने युवा शिबू सोरेन के जीवन की दिशा तय कर दी।

1970 के दशक में उन्होंने संथाल परगना और उत्तरी छोटानागपुर क्षेत्र में महाजनी प्रथा, भूमि हड़पने और आदिवासियों के शोषण के खिलाफ व्यापक जनआंदोलन खड़ा किया। 'धानकटनी आंदोलन' के माध्यम से उन्होंने आदिवासी किसानों को उनकी छीनी गई जमीन वापस दिलाने की मुहिम चलाई।

रात्रि पाठशाला से 'गुरुजी' तक

टुंडी क्षेत्र में उन्होंने रात्रि पाठशालाओं का संचालन किया, जहाँ आदिवासी समुदाय को शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और आत्मनिर्भरता का संदेश दिया जाता था। इन्हीं पाठशालाओं से लोग उन्हें स्नेहपूर्वक 'गुरुजी' कहने लगे, और कालांतर में पूरे झारखंड में वे 'दिशोम गुरु' — अर्थात् 'देश के गुरु' — के नाम से विख्यात हुए।

वर्ष 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के गठन के साथ उन्होंने पृथक झारखंड राज्य की माँग को संगठित राजनीतिक स्वरूप दिया। अगले लगभग तीन दशकों तक वे इस आंदोलन का सबसे प्रमुख और अपरिहार्य चेहरा बने रहे।

झारखंड राज्य निर्माण: संघर्ष की सबसे बड़ी जीत

दशकों के अथक संघर्ष के बाद 15 नवंबर 2000 को झारखंड एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया — यह उनके जीवन की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि मानी जाती है। शिबू सोरेन तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने, कई बार दुमका लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए और केंद्र सरकार में कोयला मंत्री का दायित्व भी निभाया।

गौरतलब है कि उनकी राजनीतिक शैली अपने समकालीनों से अलग थी — बड़े-बड़े भाषणों की बजाय वे सीधे जनसंवाद में विश्वास रखते थे। गाँवों की बैठकों, जनसभाओं और जमीनी आंदोलनों के ज़रिए उन्होंने जो जनाधार तैयार किया, वह कई दशकों तक अटूट बना रहा। यह सम्मान उस विरासत की राष्ट्रीय स्वीकृति है, जो आदिवासी समाज की आवाज़ को मुख्यधारा में लाने का सबसे सशक्त प्रतीक है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह सम्मान एक बड़े सवाल को भी रेखांकित करता है — क्या आदिवासी जल-जंगल-जमीन अधिकारों की वह लड़ाई आज संस्थागत स्तर पर आगे बढ़ रही है जिसके लिए 'दिशोम गुरु' ने दशकों तक संघर्ष किया? झारखंड में वन अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन की धीमी गति और विस्थापन के अनसुलझे मामले बताते हैं कि सम्मान और नीतिगत निरंतरता के बीच की खाई अभी पाटी नहीं गई है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का स्वयं मंच से उतरकर रूपी सोरेन तक जाना केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि आदिवासी नेतृत्व के प्रति एक सांकेतिक स्वीकृति थी — जो मुख्यधारा की राजनीति में अक्सर हाशिये पर रही है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिबू सोरेन को पद्मभूषण कब और क्यों दिया गया?
शिबू सोरेन को 23 जून 2026 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में मरणोपरांत पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। यह सम्मान आदिवासी अस्मिता, जल-जंगल-जमीन के अधिकारों और पृथक झारखंड राज्य की माँग के लिए उनके आजीवन संघर्ष को राष्ट्रीय मान्यता देने के लिए प्रदान किया गया।
दिशोम गुरु शिबू सोरेन कौन थे?
शिबू सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक, तीन बार के मुख्यमंत्री और झारखंड आंदोलन के सबसे प्रमुख नेता थे। 11 जनवरी 1944 को रामगढ़ जिले के नेमरा गाँव में जन्मे सोरेन ने 1970 के दशक से आदिवासी अधिकारों के लिए संघर्ष किया और 'गुरुजी' तथा 'दिशोम गुरु' के नाम से जाने गए।
पद्मभूषण समारोह में भावुक क्षण क्या था?
व्हीलचेयर पर पहुँचीं रूपी सोरेन के सम्मान में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु स्वयं मंच से उतरकर उनके पास गईं और पद्मभूषण प्रदान किया। इस दृश्य ने समारोह में उपस्थित सभी लोगों को गहराई से भावुक कर दिया।
झारखंड राज्य के निर्माण में शिबू सोरेन की क्या भूमिका थी?
शिबू सोरेन ने 1972 में झामुमो की स्थापना कर पृथक झारखंड राज्य की माँग को संगठित राजनीतिक दिशा दी और लगभग तीन दशकों तक इस आंदोलन का नेतृत्व किया। 15 नवंबर 2000 को झारखंड के अलग राज्य बनने को उनके संघर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है।
शिबू सोरेन को 'गुरुजी' क्यों कहा जाता था?
टुंडी क्षेत्र में उन्होंने रात्रि पाठशालाओं का संचालन किया, जहाँ आदिवासी समुदाय को शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और आत्मनिर्भरता का संदेश दिया जाता था। इन्हीं पाठशालाओं के कारण लोग उन्हें स्नेहपूर्वक 'गुरुजी' कहने लगे, जो बाद में 'दिशोम गुरु' के रूप में विख्यात हुआ।
राष्ट्र प्रेस
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