दिवाली पर पटाखा चोटें: पीजीआई चंडीगढ़ और एम्स दिल्ली ने किए विशेष इंतज़ाम, डॉक्टरों ने दी ज़रूरी सलाह
सारांश
मुख्य बातें
दिवाली के मौसम में पटाखों से होने वाली आँखों और जलने की चोटों को लेकर पीजीआई चंडीगढ़ और एम्स दिल्ली ने विशेष आपातकालीन तैयारियाँ की हैं। पीजीआई में हर साल 70 से 75 और एम्स में करीब 100 पटाखा-चोट के मामले दर्ज होते हैं, जिनमें जलने, रासायनिक बर्न और गंभीर आँख की चोटें शामिल हैं। दोनों अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीमें, आरक्षित बेड और इमरजेंसी ऑपरेशन थिएटर पूरी तरह सक्रिय रखे गए हैं।
पीजीआई चंडीगढ़ की तैयारियाँ
एडवांस आई सेंटर, पीजीआई चंडीगढ़ की विभागाध्यक्ष डॉ. उषा सिंह ने बताया कि दिवाली के दिन करीब 20 डॉक्टर तैनात रहते हैं और दिवाली के बाद के तीन दिनों को मिलाकर कुल 55 डॉक्टरों की टीम उपलब्ध रहती है। उन्होंने कहा, 'दिवाली खुशियों का त्योहार है, लेकिन पटाखों से हर साल कई चोटें लगती हैं — कुछ सतही, तो कुछ रासायनिक जलन, थर्मल बर्न और आँखों के फटने जैसी गंभीर।'
डॉ. उषा के अनुसार, पिछले साल आँख के गोले (आईबॉल) फटने के मामले कुल घायलों के करीब 40 फीसदी थे, जिनमें से सभी को तत्काल ऑपरेशन की ज़रूरत पड़ी। आपातकालीन सर्जरी के लिए नियमित ऑपरेशन कम करके तीन ओटी टेबल आरक्षित की गई हैं और एक विशेष एनेस्थीसिया टीम भी स्टैंडबाय पर रहती है। विशेष उल्लेखनीय यह है कि पटाखा-चोट के मरीज़ों का नि:शुल्क इलाज किया जाता है और दवाइयाँ भी पीजीआई की ओर से उपलब्ध कराई जाती हैं।
चोटें कैसे होती हैं
डॉ. उषा ने समझाया कि पटाखों के फटने पर तेज विस्फोट से उनके टुकड़े सीधे आँख के अंदर घुस सकते हैं। इससे रक्त वाहिकाएँ फट जाती हैं और आँख के अंदर खून जम सकता है — इसे चिकित्सा भाषा में ओपन ग्लोब इंजरी कहा जाता है। पीजीआई में चंडीगढ़, हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश से मरीज़ उपचार के लिए आते हैं।
एम्स दिल्ली की चेतावनी
एम्स दिल्ली के प्लास्टिक, रिकंस्ट्रक्टिव और बर्न्स सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. मनीष सिंघल ने कहा, 'हमें हर साल पटाखों से चोट के करीब 100 मामले मिलते हैं और इस साल यह संख्या बढ़ सकती है। ज़्यादातर हादसे लापरवाही के कारण होते हैं।' उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि छोटे बच्चों को पटाखे न दें, एक बार में केवल एक पटाखा जलाएं और आधे जले पटाखों को दोबारा न जलाएं।
डॉ. सिंघल ने यह भी स्पष्ट किया कि जलने की स्थिति में प्रभावित हिस्से पर साफ, गीला कपड़ा रखकर घाव ठंडा करें और तुरंत अस्पताल जाएं। उन्होंने घरेलू नुस्खों और रसायनों के प्रयोग से सख्त मनाही की, क्योंकि ये स्थिति को और बिगाड़ सकते हैं।
डॉक्टरों की ज़रूरी सलाह
दोनों अस्पतालों के विशेषज्ञों ने मिलकर निम्न सावधानियाँ बरतने की सलाह दी है: पटाखे हमेशा खुली जगह और सुरक्षित दूरी से जलाएं; गाड़ियों और सूखे पत्तों से दूर रहें; बच्चों को जलती माचिस या पटाखा कभी हाथ में न दें; कॉटन के कपड़े पहनें; पास में पानी की बाल्टी या रेत रखें। अनार को हाथ में पकड़कर न जलाएं और बोतल या टिन के डिब्बे में रखकर रॉकेट न छोड़ें — ऐसा करने से पटाखा फट सकता है और टुकड़े आँखों में जा सकते हैं।
आगे क्या
यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में हर दिवाली पर पटाखा-चोट के मामले चिंता का विषय बनते हैं। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय पटाखों पर पहले से दिशानिर्देश जारी कर चुका है, फिर भी अस्पतालों पर दबाव बना रहता है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि केवल लाइसेंसशुदा और ब्रांडेड पटाखों का उपयोग करने से चोट का जोखिम काफी कम किया जा सकता है।