डॉक्टर से रॉकस्टार: पलाश सेन और 'यूफोरिया' की कहानी, जिसने इंडी पॉप को नई ज़बान दी
सारांश
मुख्य बातें
डॉ. पलाश सेन — एक ऐसा नाम जो 90 के दशक में इंडियन पॉप-रॉक का पर्याय बन गया। नई दिल्ली के मंचों पर जब 'धूम पिचक धूम' की धुन गूँजती थी, तो हजारों युवाओं के पाँव थिरकने लगते थे। यह वही शख्स था जो दिन में मरीजों की नब्ज़ टटोलता था और शाम को गिटार की तारों से एक पीढ़ी की धड़कनें बढ़ा देता था।
लखनऊ से लेकर स्टेज तक का सफर
23 सितंबर 1965 को लखनऊ में जन्मे पलाश सेन का मूल संबंध वाराणसी के एक परंपरागत डॉक्टरी परिवार से है, जहाँ पीढ़ियों से चिकित्सा पेशे की विरासत चली आ रही थी। बचपन से ही पढ़ाई में अव्वल और खुशमिजाज पलाश ने दिल्ली के यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज से MBBS की डिग्री हासिल की और इसके बाद ऑर्थोपेडिक्स में MS भी पूरी की।
लेकिन सफेद कोट के भीतर एक संगीतकार की आत्मा धड़कती थी। कॉलेज के दिनों में वे गिटार बजाकर दोस्तों को महफिलें सजाते थे। उनका यही जुनून 1988 में एक बड़े फैसले में तब्दील हुआ, जब उन्होंने कुछ साथियों के साथ मिलकर 'यूफोरिया' बैंड की नींव रखी — जिसे भारत का पहला हिंदी रॉक बैंड माना जाता है।
मुख्य घटनाक्रम: 'धूम' का धमाका
कॉलेज इवेंट्स और छोटे शहरी मंचों पर दस साल की मेहनत के बाद 1998 में असली सफलता का दरवाज़ा खुला। 'धूम पिचक धूम' ने देश भर में तहलका मचा दिया। टीवी चैनल, रेडियो स्टेशन, कैसेट और सीडी — हर माध्यम पर यूफोरिया की धुन छा गई। इसी साल लॉन्च हुआ बैंड का पहला एल्बम 'धूम', जो सुपरहिट साबित हुआ।
1998 से 2005 के बीच यूफोरिया भारत का नंबर-1 बैंड बना रहा। 'माई री', 'महफूज़', 'कभी आएगा तू' जैसे गीतों ने उस दौर के युवाओं के दिलों में स्थायी जगह बना ली। यह ऐसे समय में आया जब बॉलीवुड के संगीत का बोलबाला था — और इंडी पॉप की राह कठिन थी।
बॉलीवुड से दूरी और अभिनय का अध्याय
कामयाबी के शीर्ष पर पहुँचकर पलाश ने अभिनय में भी कदम रखा। 2002 में वे कई भाषाओं की फिल्मों में नज़र आए, लेकिन एक्टिंग में उन्हें संगीत जैसी पहचान नहीं मिल सकी। उद्योग के जानकारों के अनुसार, पलाश की बेबाक और समझौताविहीन कार्यशैली ने उन्हें बॉलीवुड के कॉरपोरेट तंत्र से दूर रखा। कथित तौर पर इसी स्वाभिमानी रवैये की वजह से धीरे-धीरे मुख्यधारा की चकाचौंध से उनका नाम ओझल होने लगा।
2017 में उन्होंने शॉर्ट फिल्म 'जिया जले' का निर्देशन कर सबको चौंकाया, लेकिन यह प्रोजेक्ट कॉपीराइट विवाद में उलझ गया। गौरतलब है कि पलाश केवल गायक-संगीतकार नहीं, बल्कि गीतकार, संगीत संयोजक, अभिनेता और निर्देशक — यानी एक पूर्ण कलाकार हैं।
आम जनता पर असर: एक पीढ़ी की विरासत
पलाश सेन और यूफोरिया का महत्व केवल हिट गानों तक सीमित नहीं है। उन्होंने यह साबित किया कि हिंदी में भी रॉक संगीत रचा जा सकता है और वह लाखों दिलों तक पहुँच सकता है। 90 के दशक में इंटरनेट की अनुपस्थिति के बावजूद यूफोरिया की लोकप्रियता ने इंडी पॉप को एक वैकल्पिक मंच दिया।
आज भी पलाश सेन डॉक्टर के रूप में अपनी प्रैक्टिस जारी रखते हैं और कभी-कभी मंच पर भी नज़र आते हैं। उनके चाहने वालों के लिए वे आज भी वही 'धूम पिचक' वाले रॉकस्टार हैं — एक ऐसा प्रतीक जिसने यह दिखाया कि जुनून और पेशे की दो दुनियाएँ एकसाथ जी जा सकती हैं।
क्या होगा आगे
भारतीय इंडी पॉप का परिदृश्य आज बदल चुका है — स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया ने कलाकारों को नई राह दी है। ऐसे में यूफोरिया जैसे बैंड की विरासत एक नई पीढ़ी के संगीतकारों को प्रेरणा देती है जो बिना बॉलीवुड के दरवाज़े खटखटाए अपना रास्ता बनाना चाहते हैं। पलाश की कहानी आज भी उस हर इंसान को उम्मीद देती है जो दो सपनों को एकसाथ जीना चाहता हो।