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डॉक्टर से रॉकस्टार: पलाश सेन और 'यूफोरिया' की कहानी, जिसने इंडी पॉप को नई ज़बान दी

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डॉक्टर से रॉकस्टार: पलाश सेन और 'यूफोरिया' की कहानी, जिसने इंडी पॉप को नई ज़बान दी

सारांश

एक डॉक्टर जिसने दिन में मरीज़ देखे और रात को रॉकस्टार बना — पलाश सेन की कहानी महज़ एक संगीतकार की नहीं, बल्कि उस दौर की है जब हिंदी में रॉक बजाना ही एक विद्रोह था। 'धूम पिचक धूम' से शुरू हुआ सफर आज भी एक पीढ़ी के ज़हन में ताज़ा है।

मुख्य बातें

पलाश सेन का जन्म 23 सितंबर 1965 को लखनऊ में हुआ; उन्होंने दिल्ली के यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज से MBBS और ऑर्थोपेडिक्स में MS की।
1988 में उन्होंने भारत का पहला हिंदी रॉक बैंड 'यूफोरिया' बनाया।
1998 में 'धूम पिचक धूम' और एल्बम 'धूम' ने राष्ट्रीय स्तर पर धमाका किया; 1998–2005 के बीच यूफोरिया भारत का नंबर-1 बैंड रहा।
2002 में अभिनय में कदम रखा; 2017 में शॉर्ट फिल्म 'जिया जले' का निर्देशन किया, जो बाद में कॉपीराइट विवाद में फँसी।
आज भी पलाश सेन डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस करते हैं और कभी-कभी मंच पर प्रस्तुति देते हैं।

डॉ. पलाश सेन — एक ऐसा नाम जो 90 के दशक में इंडियन पॉप-रॉक का पर्याय बन गया। नई दिल्ली के मंचों पर जब 'धूम पिचक धूम' की धुन गूँजती थी, तो हजारों युवाओं के पाँव थिरकने लगते थे। यह वही शख्स था जो दिन में मरीजों की नब्ज़ टटोलता था और शाम को गिटार की तारों से एक पीढ़ी की धड़कनें बढ़ा देता था।

लखनऊ से लेकर स्टेज तक का सफर

23 सितंबर 1965 को लखनऊ में जन्मे पलाश सेन का मूल संबंध वाराणसी के एक परंपरागत डॉक्टरी परिवार से है, जहाँ पीढ़ियों से चिकित्सा पेशे की विरासत चली आ रही थी। बचपन से ही पढ़ाई में अव्वल और खुशमिजाज पलाश ने दिल्ली के यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज से MBBS की डिग्री हासिल की और इसके बाद ऑर्थोपेडिक्स में MS भी पूरी की।

लेकिन सफेद कोट के भीतर एक संगीतकार की आत्मा धड़कती थी। कॉलेज के दिनों में वे गिटार बजाकर दोस्तों को महफिलें सजाते थे। उनका यही जुनून 1988 में एक बड़े फैसले में तब्दील हुआ, जब उन्होंने कुछ साथियों के साथ मिलकर 'यूफोरिया' बैंड की नींव रखी — जिसे भारत का पहला हिंदी रॉक बैंड माना जाता है।

मुख्य घटनाक्रम: 'धूम' का धमाका

कॉलेज इवेंट्स और छोटे शहरी मंचों पर दस साल की मेहनत के बाद 1998 में असली सफलता का दरवाज़ा खुला। 'धूम पिचक धूम' ने देश भर में तहलका मचा दिया। टीवी चैनल, रेडियो स्टेशन, कैसेट और सीडी — हर माध्यम पर यूफोरिया की धुन छा गई। इसी साल लॉन्च हुआ बैंड का पहला एल्बम 'धूम', जो सुपरहिट साबित हुआ।

1998 से 2005 के बीच यूफोरिया भारत का नंबर-1 बैंड बना रहा। 'माई री', 'महफूज़', 'कभी आएगा तू' जैसे गीतों ने उस दौर के युवाओं के दिलों में स्थायी जगह बना ली। यह ऐसे समय में आया जब बॉलीवुड के संगीत का बोलबाला था — और इंडी पॉप की राह कठिन थी।

बॉलीवुड से दूरी और अभिनय का अध्याय

कामयाबी के शीर्ष पर पहुँचकर पलाश ने अभिनय में भी कदम रखा। 2002 में वे कई भाषाओं की फिल्मों में नज़र आए, लेकिन एक्टिंग में उन्हें संगीत जैसी पहचान नहीं मिल सकी। उद्योग के जानकारों के अनुसार, पलाश की बेबाक और समझौताविहीन कार्यशैली ने उन्हें बॉलीवुड के कॉरपोरेट तंत्र से दूर रखा। कथित तौर पर इसी स्वाभिमानी रवैये की वजह से धीरे-धीरे मुख्यधारा की चकाचौंध से उनका नाम ओझल होने लगा।

2017 में उन्होंने शॉर्ट फिल्म 'जिया जले' का निर्देशन कर सबको चौंकाया, लेकिन यह प्रोजेक्ट कॉपीराइट विवाद में उलझ गया। गौरतलब है कि पलाश केवल गायक-संगीतकार नहीं, बल्कि गीतकार, संगीत संयोजक, अभिनेता और निर्देशक — यानी एक पूर्ण कलाकार हैं।

आम जनता पर असर: एक पीढ़ी की विरासत

पलाश सेन और यूफोरिया का महत्व केवल हिट गानों तक सीमित नहीं है। उन्होंने यह साबित किया कि हिंदी में भी रॉक संगीत रचा जा सकता है और वह लाखों दिलों तक पहुँच सकता है। 90 के दशक में इंटरनेट की अनुपस्थिति के बावजूद यूफोरिया की लोकप्रियता ने इंडी पॉप को एक वैकल्पिक मंच दिया।

आज भी पलाश सेन डॉक्टर के रूप में अपनी प्रैक्टिस जारी रखते हैं और कभी-कभी मंच पर भी नज़र आते हैं। उनके चाहने वालों के लिए वे आज भी वही 'धूम पिचक' वाले रॉकस्टार हैं — एक ऐसा प्रतीक जिसने यह दिखाया कि जुनून और पेशे की दो दुनियाएँ एकसाथ जी जा सकती हैं।

क्या होगा आगे

भारतीय इंडी पॉप का परिदृश्य आज बदल चुका है — स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया ने कलाकारों को नई राह दी है। ऐसे में यूफोरिया जैसे बैंड की विरासत एक नई पीढ़ी के संगीतकारों को प्रेरणा देती है जो बिना बॉलीवुड के दरवाज़े खटखटाए अपना रास्ता बनाना चाहते हैं। पलाश की कहानी आज भी उस हर इंसान को उम्मीद देती है जो दो सपनों को एकसाथ जीना चाहता हो।

संपादकीय दृष्टिकोण

तब पलाश जैसे अगुआओं की विरासत को फिर से रेखांकित करना ज़रूरी है — क्योंकि वे बिना किसी डिजिटल सहारे के, केवल प्रतिभा और जिद के बल पर एक पूरी पीढ़ी की आवाज़ बने थे।
RashtraPress
22 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पलाश सेन कौन हैं और उन्होंने 'यूफोरिया' क्यों बनाया?
पलाश सेन एक प्रशिक्षित चिकित्सक हैं जिन्होंने 1988 में दिल्ली में 'यूफोरिया' बैंड की स्थापना की — जिसे भारत का पहला हिंदी रॉक बैंड माना जाता है। संगीत के प्रति उनके बचपन से जुनून और कॉलेज में की गई परफॉर्मेंस ने उन्हें डॉक्टरी के साथ-साथ इस राह पर चलने के लिए प्रेरित किया।
'धूम पिचक धूम' कब आया और इसने क्या बदला?
'धूम पिचक धूम' 1998 में रिलीज़ हुआ और देखते ही देखते टीवी, रेडियो और कैसेट हर जगह छा गया। इस गाने ने यूफोरिया को राष्ट्रीय पहचान दिलाई और साबित किया कि हिंदी में रॉक-पॉप संगीत बॉलीवुड गानों की तरह ही करोड़ों दिलों तक पहुँच सकता है।
पलाश सेन ने डॉक्टरी और संगीत दोनों एकसाथ कैसे किया?
पलाश सेन ने दिल्ली के यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज से MBBS और ऑर्थोपेडिक्स में MS की डिग्री हासिल की। उन्होंने चिकित्सा प्रैक्टिस के साथ-साथ संगीत को बनाए रखा और आज भी दोनों क्षेत्रों में सक्रिय हैं।
यूफोरिया की लोकप्रियता कम क्यों हुई?
कथित तौर पर पलाश सेन के समझौताविहीन और स्वाभिमानी स्वभाव के कारण उनका बॉलीवुड इंडस्ट्री से हमेशा तनावपूर्ण संबंध रहा। जानकारों के अनुसार, उद्योग की राजनीति में न झुकने की वजह से धीरे-धीरे उनका नाम मुख्यधारा से ओझल होने लगा।
पलाश सेन ने निर्देशन भी किया है?
हाँ, 2017 में पलाश सेन ने शॉर्ट फिल्म 'जिया जले' का निर्देशन किया, जिसने सबको चौंकाया। हालाँकि यह फिल्म बाद में कॉपीराइट विवाद में फँस गई। इससे पहले वे 2002 में कई भाषाओं की फिल्मों में अभिनेता के रूप में भी नज़र आए थे।
राष्ट्र प्रेस
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