डॉ. पद्मा गुरमीत को यूटी लद्दाख राज्य पुरस्कार 2025: सोवा-रिग्पा संरक्षण में अतुलनीय योगदान
सारांश
मुख्य बातें
लेह स्थित राष्ट्रीय सोवा-रिग्पा संस्थान के निदेशक डॉ. पद्मा गुरमीत को 13 अगस्त 2025 को केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख राज्य पुरस्कार 2025 से नवाज़ा गया। यह सम्मान उन्हें लद्दाख की पारंपरिक सोवा-रिग्पा चिकित्सा प्रणाली के संरक्षण, संवर्धन और विकास में उनके दीर्घकालिक और अनुकरणीय योगदान के लिए प्रदान किया गया।
पुरस्कार समारोह का विवरण
यह पुरस्कार लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने केंद्र शासित प्रदेश राज्य पुरस्कार समारोह के दौरान प्रदान किया। इस अवसर पर वर्ष 2022 से 2025 के बीच विभिन्न क्षेत्रों में असाधारण योगदान देने वाले 36 विशिष्ट व्यक्तियों को सम्मानित किया गया।
समारोह को संबोधित करते हुए उपराज्यपाल सक्सेना ने कहा कि ये पुरस्कार उन व्यक्तियों की निष्ठा, उत्कृष्टता और सेवा को मान्यता देने के लिए दिए जाते हैं जिन्होंने समाज पर सार्थक और स्थायी प्रभाव छोड़ा है। उन्होंने युवा पीढ़ी को प्रेरित करने और केंद्र शासित प्रदेश के समग्र विकास में सकारात्मक भूमिका निभाने के महत्व पर भी विशेष ज़ोर दिया।
सोवा-रिग्पा: लद्दाख की अमूल्य चिकित्सा विरासत
सोवा-रिग्पा तिब्बती मूल की एक प्राचीन चिकित्सा पद्धति है जो लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे हिमालयी क्षेत्रों में सदियों से प्रचलित है। यह प्रणाली जड़ी-बूटियों, खनिजों और समग्र जीवनशैली के सिद्धांतों पर आधारित है। लेह स्थित राष्ट्रीय सोवा-रिग्पा संस्थान इस विधा के शैक्षणिक और शोध-आधारित विकास का प्रमुख केंद्र है।
गौरतलब है कि भारत सरकार ने सोवा-रिग्पा को आयुष मंत्रालय के अंतर्गत आधिकारिक चिकित्सा पद्धति के रूप में मान्यता दी है, जिससे इस परंपरागत ज्ञान को संस्थागत समर्थन मिला है।
डॉ. गुरमीत का योगदान
डॉ. पद्मा गुरमीत राष्ट्रीय सोवा-रिग्पा संस्थान के निदेशक के रूप में इस चिकित्सा प्रणाली को न केवल जीवित रखने बल्कि उसे आधुनिक शैक्षणिक ढाँचे में ढालने की दिशा में कार्यरत हैं। उनके नेतृत्व में संस्थान ने पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेज़ीकरण, प्रशिक्षण और अनुसंधान में उल्लेखनीय प्रगति की है।
संस्थान के संकाय, कर्मचारियों और छात्रों ने डॉ. पद्मा गुरमीत को इस प्रतिष्ठित सम्मान पर हार्दिक बधाई दी और सोवा-रिग्पा के उत्थान में उनके निरंतर प्रयासों की सराहना की।
आगे की राह
यह पुरस्कार न केवल डॉ. पद्मा गुरमीत की व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि लद्दाख की पारंपरिक स्वास्थ्य प्रणालियों के संरक्षण की व्यापक आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। यह सम्मान उन सभी शोधकर्ताओं और चिकित्सकों के लिए प्रेरणास्रोत है जो हिमालयी क्षेत्र की अमूल्य ज्ञान परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने में जुटे हैं।