24 सितंबर 2026
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DRDO का बड़ा कदम: 20 मिलीकेल्विन डायल्यूशन रेफ्रिजरेटर के स्वदेशी विकास के लिए अलवर स्टार्टअप से समझौता

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DRDO का बड़ा कदम: 20 मिलीकेल्विन डायल्यूशन रेफ्रिजरेटर के स्वदेशी विकास के लिए अलवर स्टार्टअप से समझौता

सारांश

भारत की क्वांटम आत्मनिर्भरता की दिशा में DRDO ने एक निर्णायक कदम उठाया है — ₹500 करोड़ के TDF कोष के तहत पहला हाई-वैल्यू डीप-टेक करार। अलवर के स्टार्टअप के साथ यह साझेदारी उस क्रायोजेनिक खाई को पाटने की कोशिश है जिसके लिए भारत अब तक विदेशी आयात पर निर्भर रहा है।

मुख्य बातें

DRDO ने 24 सितंबर 2026 को 20 मिलीकेल्विन डायल्यूशन रेफ्रिजरेटर के स्वदेशी विकास के लिए राजस्थान के अलवर स्थित स्टार्टअप जीरो एमके इंडिया प्राइवेट लिमिटेड से समझौता किया।
यह टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड (TDF) के अंतर्गत DRDO और किसी स्टार्टअप के बीच पहला हाई-वैल्यू डीप-टेक करार है।
यह परियोजना रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा मंजूर ₹500 करोड़ के TDF कोष के तहत पहला बड़ा समझौता है।
परियोजना का उद्देश्य क्वांटम कंप्यूटिंग हेतु आवश्यक अति-शीतल क्रायोजेनिक उपकरणों में विदेशी आयात-निर्भरता कम करना है।
तकनीकी मार्गदर्शन सॉलिड स्टेट फिजिक्स लेबोरेटरी के निदेशक और उनकी टीम द्वारा किया जाएगा।
यह परियोजना राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के लक्ष्यों के अनुरूप है।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने 24 सितंबर 2026 को क्वांटम कंप्यूटिंग के लिए आवश्यक 20 मिलीकेल्विन डायल्यूशन रेफ्रिजरेटर के स्वदेशी निर्माण हेतु राजस्थान के अलवर स्थित स्टार्टअप जीरो एमके इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के साथ एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड (TDF) योजना के तहत किया गया है और इसे DRDO तथा किसी स्टार्टअप के बीच इस फंड के अंतर्गत पहला हाई-वैल्यू डीप-टेक करार बताया जा रहा है।

परियोजना का उद्देश्य और तकनीकी महत्व

डायल्यूशन रेफ्रिजरेटर विशेष क्रायोजेनिक प्रणालियाँ होती हैं, जो तापमान को 20 मिलीकेल्विन जैसे अत्यंत निम्न स्तर तक पहुँचाने में सक्षम हैं। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, क्वांटम कंप्यूटिंग के अधिकांश प्लेटफ़ॉर्म और संबद्ध क्वांटम तकनीकें इसी प्रकार के अति-शीतल वातावरण में संचालित होती हैं। इसलिए इन प्रणालियों की क्वांटम कंप्यूटर के विकास और परीक्षण में अपरिहार्य भूमिका है।

फ़िलहाल भारत इस श्रेणी के उन्नत क्रायोजेनिक उपकरणों के लिए काफ़ी हद तक विदेशी आयात पर निर्भर है। इस परियोजना का लक्ष्य उसी आयात-निर्भरता को कम करना और देश में क्वांटम अनुसंधान, विकास तथा औद्योगिक क्षमता को मज़बूत करना है।

₹500 करोड़ के कोष के तहत पहला बड़ा करार

यह परियोजना उस ₹500 करोड़ के टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड के अंतर्गत पहला हाई-वैल्यू समझौता है, जिसे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डीप-टेक और अत्याधुनिक तकनीकी परियोजनाओं के लिए पहले मंजूरी दी थी। समझौते पर नई दिल्ली में TDF के निदेशक और जीरो एमके इंडिया के प्रतिनिधि ने हस्ताक्षर किए।

गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब भारत सरकार राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के तहत क्वांटम हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर में आत्मनिर्भरता की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ा रही है। यह परियोजना उसी मिशन के लक्ष्यों के अनुरूप है।

सरकार और DRDO नेतृत्व की प्रतिक्रिया

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस परियोजना से जुड़े DRDO, उद्योग और सभी हितधारकों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि DRDO और उद्योग के बीच यह साझेदारी उभरती तकनीकों के क्षेत्र में भविष्य की परियोजनाओं के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करेगी।

रक्षा सचिव एवं DRDO अध्यक्ष राजेश कुमार सिंह ने भी परियोजना से जुड़ी टीमों को शुभकामनाएँ दीं और लक्ष्यों की सफल प्राप्ति की कामना की। इस अवसर पर माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज एंड कम्प्यूटेशनल सिस्टम्स के महानिदेशक, टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट के महानिदेशक, सॉलिड स्टेट फिजिक्स लेबोरेटरी के निदेशक और अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

आम जनता और उद्योग पर असर

परियोजना की तकनीकी निगरानी और मार्गदर्शन सॉलिड स्टेट फिजिक्स लेबोरेटरी के निदेशक एवं उनकी टीम द्वारा किया जा रहा है। इस मॉडल की विशेषता यह है कि इसमें DRDO की वैज्ञानिक विशेषज्ञता और एक स्टार्टअप की चुस्त तकनीकी क्षमता को एकजुट किया गया है — एक ऐसा सहयोग जो भविष्य में क्वांटम हार्डवेयर उद्योग की नींव बन सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह परियोजना सफल होती है तो भारत उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल हो जाएगा जो इस स्तर की क्रायोजेनिक तकनीक स्वदेश में विकसित करने में सक्षम हैं। अभी तक यह क्षमता मुख्यतः अमेरिका, यूरोप और जापान तक सीमित रही है।

आगे की राह

यह परियोजना राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के व्यापक ढाँचे में एक ठोस कड़ी जोड़ती है। उन्नत क्रायोजेनिक्स, रणनीतिक तकनीक और क्वांटम हार्डवेयर में घरेलू क्षमता के विकास से आने वाले वर्षों में भारत की क्वांटम अनुसंधान गति और रक्षा तकनीकी स्वायत्तता दोनों को बल मिलने की उम्मीद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी क्रियान्वयन की होगी। 20 मिलीकेल्विन-श्रेणी के डायल्यूशन रेफ्रिजरेटर वैश्विक स्तर पर भी मुट्ठी भर कंपनियाँ बनाती हैं, और उनकी तकनीकी जटिलता को देखते हुए एक नए स्टार्टअप से यह उम्मीद बड़ी है। TDF का ₹500 करोड़ का कोष सही दिशा में है, पर क्वांटम हार्डवेयर में आत्मनिर्भरता के लिए लंबे समय तक निरंतर निवेश, कुशल जनशक्ति और अंतरराष्ट्रीय मानकों के परीक्षण ढाँचे की ज़रूरत होगी। यह पहला कदम उत्साहजनक है — पर राष्ट्रीय क्वांटम मिशन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इस मॉडल को कितनी तेज़ी और पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ाया जाता है।
RashtraPress
24 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

DRDO का 20 मिलीकेल्विन डायल्यूशन रेफ्रिजरेटर क्या है?
यह एक विशेष क्रायोजेनिक प्रणाली है जो तापमान को 20 मिलीकेल्विन जैसे अत्यंत निम्न स्तर तक घटा सकती है। क्वांटम कंप्यूटर और संबद्ध क्वांटम तकनीकें इसी प्रकार के अति-शीतल वातावरण में संचालित होती हैं, इसलिए इनके विकास व परीक्षण के लिए यह उपकरण अनिवार्य है।
DRDO ने यह समझौता किस कंपनी के साथ किया है?
यह समझौता राजस्थान के अलवर स्थित स्टार्टअप जीरो एमके इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के साथ किया गया है। यह टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड (TDF) के अंतर्गत DRDO और किसी स्टार्टअप के बीच पहला हाई-वैल्यू डीप-टेक परियोजना करार है।
टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड क्या है और इसकी राशि कितनी है?
टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड (TDF) DRDO की एक योजना है जो स्वदेशी रक्षा तकनीक विकास के लिए उद्योग और स्टार्टअप को सहयोग देती है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डीप-टेक परियोजनाओं के लिए इस कोष को ₹500 करोड़ की मंजूरी दी थी और यह उस कोष के तहत पहला हाई-वैल्यू समझौता है।
यह परियोजना राष्ट्रीय क्वांटम मिशन से कैसे जुड़ी है?
राष्ट्रीय क्वांटम मिशन का लक्ष्य भारत में क्वांटम तकनीक के हर पहलू में आत्मनिर्भरता हासिल करना है। यह परियोजना उसी मिशन के अनुरूप उन्नत क्रायोजेनिक्स और क्वांटम हार्डवेयर में घरेलू क्षमता विकसित करने की दिशा में एक ठोस कदम है।
इस स्वदेशी विकास से भारत को क्या फायदा होगा?
अभी भारत इस श्रेणी के क्रायोजेनिक उपकरणों के लिए काफी हद तक विदेशी आयात पर निर्भर है। स्वदेशी विकास सफल होने पर यह निर्भरता कम होगी, क्वांटम अनुसंधान की लागत घटेगी और भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो सकेगा जो इस स्तर की तकनीक खुद बनाते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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