डी. वी. पलुस्कर पुण्यतिथि: 34 वर्ष की आयु में खोई वह आवाज़ जो 'बैजू बावरा' से अमर हो गई
सारांश
मुख्य बातें
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के अप्रतिम गायक पंडित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर की आज, 26 अक्टूबर, पुण्यतिथि है। 26 अक्टूबर 1955 को मात्र 34 वर्ष की आयु में उनके असमय निधन ने भारतीय संगीत जगत को एक ऐसे शून्य में छोड़ दिया जो सात दशक बाद भी भरा नहीं जा सका। नई दिल्ली सहित देशभर में संगीत प्रेमी प्रतिवर्ष इस दिन उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
संगीत की विरासत और प्रारंभिक जीवन
पंडित डी. वी. पलुस्कर का जन्म 28 मई 1921 को नासिक, महाराष्ट्र में हुआ था। वे विख्यात हिंदुस्तानी संगीतज्ञ पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर के पुत्र थे, इसलिए संगीत की धारा उनकी रगों में जन्म से ही प्रवाहित थी। दुर्भाग्यवश, जब वे केवल दस वर्ष के थे, तब उनके पिता का निधन हो गया। पिता के जाने के बाद उनकी संगीत-साधना का दायित्व पंडित विनायकराव पटवर्धन और पंडित नारायणराव व्यास ने उठाया। आगे चलकर उन्हें पंडित चिंतामनराव और पंडित मिराशी बुवा का भी मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।
बचपन से ही उनकी संगीत-प्रतिभा इतनी असाधारण थी कि उन्हें 'विलक्षण बालक' की उपाधि से नवाज़ा जाता था। उन्होंने अपना पहला बड़ा सार्वजनिक कार्यक्रम महज 14 वर्ष की आयु में पंजाब के सुप्रसिद्ध हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन में दिया और उपस्थित श्रोताओं को अपनी मधुर आवाज़ का दीवाना बना दिया।
गायकी की अनूठी शैली
पंडित पलुस्कर को उत्तराधिकार में ग्वालियर घराने और गंधर्व महाविद्यालय की समृद्ध परंपरा मिली थी, परंतु वे खुद को किसी एक घराने की सीमा में बाँधने को तैयार नहीं थे। वे अन्य घरानों और शैलियों की विशेषताओं को खुले मन से आत्मसात करते थे, जिससे उनके गायन में एक दुर्लभ समन्वय उभरता था — ऐसा संगम जो शास्त्रीय कठोरता और भावनात्मक गहराई को एक साथ जीवंत कर देता था।
उनके आलाप राग का स्पष्ट और सजीव चित्रण करते थे। उनकी बंदिशें सहज तानों से सुसज्जित होती थीं, जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती थीं। विशेषज्ञों के अनुसार उन्हें अत्यंत सीमित समय में राग का संपूर्ण और आकर्षक स्वरचित्र प्रस्तुत करने में असाधारण महारत हासिल थी — एक ऐसी क्षमता जो दशकों के अभ्यास के बाद भी बहुत कम कलाकारों को प्राप्त होती है।
'बैजू बावरा' और फिल्मी योगदान
शुद्ध शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ पंडित पलुस्कर एक महान भजन गायक के रूप में भी पूजनीय थे। लेकिन आम श्रोताओं के बीच उन्हें अमर बनाया 1952 में प्रदर्शित फिल्म 'बैजू बावरा' ने, जिसमें उन्होंने उस्ताद अमीर खान के साथ एक ऐतिहासिक जुगलबंदी प्रस्तुत की। शास्त्रीय संगीत की दो अलग-अलग धाराओं का यह मिलन आज भी भारतीय संगीत इतिहास की सबसे यादगार प्रस्तुतियों में गिना जाता है। इसके अतिरिक्त उन्होंने बंगाली फिल्म 'शाप मोचन' में भी अपनी सुरीली आवाज़ दी थी।
उनकी पहली रिकॉर्डिंग 1944 में तैयार हुई थी। 1955 में वे भारतीय सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में चीन के दौरे पर भी गए — यह इस बात का प्रमाण था कि उनकी कला की पहचान राष्ट्रीय सीमाओं से परे भी थी।
असमय विदाई और अमिट छाप
26 अक्टूबर 1955 को बीमारी के कारण उनका निधन हो गया। उनके जाने की खबर देशभर में फैली और संगीत प्रेमियों में शोक की गहरी लहर दौड़ गई। गौरतलब है कि यह वही वर्ष था जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके थे — इस बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यदि वे जीवित रहते तो भारतीय शास्त्रीय संगीत की वैश्विक यात्रा कितनी अलग होती।
आज उनकी पुण्यतिथि पर उनकी स्मृति को नमन करते हुए संगीत जगत एक बार फिर इस सत्य को स्वीकार करता है कि महान प्रतिभाएँ देह से नहीं, अपनी साधना से अमर होती हैं।