ईपीएफओ अधिकारी देवीदास शिंडिकर को ₹10 लाख रिश्वत मामले में 4 साल की कठोर कैद, पुणे सीबीआई कोर्ट का फैसला
सारांश
मुख्य बातें
पुणे की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) अदालत ने 31 अगस्त 2026 को कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के तत्कालीन प्रवर्तन अधिकारी देवीदास शिंडिकर को घूसखोरी के मामले में दोषी ठहराते हुए चार साल की कठोर कैद और ₹1.50 लाख के जुर्माने की सजा सुनाई। यह मामला वर्ष 2014 में दर्ज हुआ था, और करीब 12 साल की लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद अब इसमें अंतिम फैसला आया है।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले की जड़ नासिक स्थित एक स्कूल से जुड़ी है। उस स्कूल के महासचिव ने सीबीआई में शिकायत दर्ज कराई थी कि ईपीएफओ के तत्कालीन प्रवर्तन अधिकारी देवीदास शिंडिकर ने स्कूल पर बकाया कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) राशि और उससे संबंधित जुर्माने को कम करने के एवज में रिश्वत की माँग की थी।
शिकायत के अनुसार, अधिकारी ने शुरुआत में ₹8.50 लाख की माँग रखी, जिसे बाद में बढ़ाकर ₹13 लाख कर दिया गया। बातचीत के बाद आरोपी ₹10 लाख की रिश्वत लेने पर सहमत हुआ।
सीबीआई की कार्रवाई और गिरफ्तारी
शिकायत मिलने के बाद सीबीआई ने 17 अप्रैल 2014 को मामला दर्ज किया और आरोपी को रंगे हाथों पकड़ने के लिए जाल बिछाया। 21 अप्रैल 2014 को सीबीआई ने कार्रवाई करते हुए देवीदास शिंडिकर को शिकायतकर्ता से ₹10 लाख की रिश्वत स्वीकार करते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया।
जाँच पूरी होने के बाद सीबीआई ने 21 जुलाई 2014 को आरोपी के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दाखिल की, जिसके बाद न्यायिक सुनवाई की प्रक्रिया शुरू हुई।
अदालत का फैसला
पुणे की सीबीआई अदालत ने 31 अगस्त 2026 को अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और तथ्यों पर विचार करने के बाद देवीदास शिंडिकर को रिश्वतखोरी का दोषी करार दिया। अदालत ने उन्हें चार साल की कठोर कैद के साथ-साथ ₹1.50 लाख का जुर्माना भरने का आदेश दिया।
फैसले का महत्व
यह फैसला सरकारी अधिकारियों द्वारा की जाने वाली घूसखोरी के खिलाफ सीबीआई की कार्रवाई की एक महत्वपूर्ण मिसाल है। गौरतलब है कि यह मामला उस समय का है जब ईपीएफओ जैसी संस्थाओं में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे। 12 साल की न्यायिक प्रक्रिया के बाद आया यह निर्णय न्यायपालिका की दृढ़ता को रेखांकित करता है। आने वाले समय में यह देखा जाएगा कि क्या आरोपी इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देते हैं।