1 सितंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

ईपीएफओ अधिकारी देवीदास शिंडिकर को ₹10 लाख रिश्वत मामले में 4 साल की कठोर कैद, पुणे सीबीआई कोर्ट का फैसला

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
ईपीएफओ अधिकारी देवीदास शिंडिकर को ₹10 लाख रिश्वत मामले में 4 साल की कठोर कैद, पुणे सीबीआई कोर्ट का फैसला

सारांश

12 साल पुराने रिश्वत मामले में पुणे की सीबीआई अदालत ने ईपीएफओ के तत्कालीन प्रवर्तन अधिकारी देवीदास शिंडिकर को दोषी ठहराया। नासिक के एक स्कूल से ₹10 लाख रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े गए अधिकारी को 4 साल की कठोर कैद और ₹1.50 लाख जुर्माने की सजा मिली।

मुख्य बातें

पुणे सीबीआई अदालत ने 31 अगस्त 2026 को ईपीएफओ के तत्कालीन प्रवर्तन अधिकारी देवीदास शिंडिकर को घूसखोरी में दोषी करार दिया।
अदालत ने चार साल की कठोर कैद और ₹1.50 लाख जुर्माने की सजा सुनाई।
आरोपी ने नासिक के एक स्कूल के ईपीएफ बकाया और जुर्माना कम करने के एवज में पहले ₹8.50 लाख , फिर ₹13 लाख और अंततः ₹10 लाख रिश्वत माँगी थी।
सीबीआई ने 21 अप्रैल 2014 को शिंडिकर को ₹10 लाख की रिश्वत स्वीकार करते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया था।
मामला दर्ज होने के करीब 12 साल बाद यह न्यायिक निर्णय आया है।

पुणे की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) अदालत ने 31 अगस्त 2026 को कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के तत्कालीन प्रवर्तन अधिकारी देवीदास शिंडिकर को घूसखोरी के मामले में दोषी ठहराते हुए चार साल की कठोर कैद और ₹1.50 लाख के जुर्माने की सजा सुनाई। यह मामला वर्ष 2014 में दर्ज हुआ था, और करीब 12 साल की लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद अब इसमें अंतिम फैसला आया है।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले की जड़ नासिक स्थित एक स्कूल से जुड़ी है। उस स्कूल के महासचिव ने सीबीआई में शिकायत दर्ज कराई थी कि ईपीएफओ के तत्कालीन प्रवर्तन अधिकारी देवीदास शिंडिकर ने स्कूल पर बकाया कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) राशि और उससे संबंधित जुर्माने को कम करने के एवज में रिश्वत की माँग की थी।

शिकायत के अनुसार, अधिकारी ने शुरुआत में ₹8.50 लाख की माँग रखी, जिसे बाद में बढ़ाकर ₹13 लाख कर दिया गया। बातचीत के बाद आरोपी ₹10 लाख की रिश्वत लेने पर सहमत हुआ।

सीबीआई की कार्रवाई और गिरफ्तारी

शिकायत मिलने के बाद सीबीआई ने 17 अप्रैल 2014 को मामला दर्ज किया और आरोपी को रंगे हाथों पकड़ने के लिए जाल बिछाया। 21 अप्रैल 2014 को सीबीआई ने कार्रवाई करते हुए देवीदास शिंडिकर को शिकायतकर्ता से ₹10 लाख की रिश्वत स्वीकार करते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया।

जाँच पूरी होने के बाद सीबीआई ने 21 जुलाई 2014 को आरोपी के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दाखिल की, जिसके बाद न्यायिक सुनवाई की प्रक्रिया शुरू हुई।

अदालत का फैसला

पुणे की सीबीआई अदालत ने 31 अगस्त 2026 को अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और तथ्यों पर विचार करने के बाद देवीदास शिंडिकर को रिश्वतखोरी का दोषी करार दिया। अदालत ने उन्हें चार साल की कठोर कैद के साथ-साथ ₹1.50 लाख का जुर्माना भरने का आदेश दिया।

फैसले का महत्व

यह फैसला सरकारी अधिकारियों द्वारा की जाने वाली घूसखोरी के खिलाफ सीबीआई की कार्रवाई की एक महत्वपूर्ण मिसाल है। गौरतलब है कि यह मामला उस समय का है जब ईपीएफओ जैसी संस्थाओं में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे। 12 साल की न्यायिक प्रक्रिया के बाद आया यह निर्णय न्यायपालिका की दृढ़ता को रेखांकित करता है। आने वाले समय में यह देखा जाएगा कि क्या आरोपी इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह भी उजागर करता है कि भारत में भ्रष्टाचार के मामलों में न्यायिक निर्णय तक पहुँचने में औसतन एक दशक से अधिक का समय लग जाता है — जो स्वयं में एक गंभीर प्रणालीगत चुनौती है। ईपीएफओ जैसी संस्था, जो करोड़ों श्रमिकों की बचत की संरक्षक है, में रिश्वतखोरी की घटनाएँ संस्थागत निगरानी की कमज़ोरियों की ओर इशारा करती हैं। सीबीआई का 'ट्रैप' तंत्र कारगर साबित हुआ, परंतु असली सवाल यह है कि इतने वर्षों में ऐसे कितने मामले बिना शिकायत के दब गए।
RashtraPress
1 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

देवीदास शिंडिकर को किस मामले में सजा मिली है?
देवीदास शिंडिकर, जो ईपीएफओ के तत्कालीन प्रवर्तन अधिकारी थे, को नासिक के एक स्कूल से ₹10 लाख की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े जाने के मामले में दोषी ठहराया गया है। पुणे की सीबीआई अदालत ने 31 अगस्त 2026 को उन्हें चार साल की कठोर कैद और ₹1.50 लाख जुर्माने की सजा सुनाई।
सीबीआई ने इस मामले में कार्रवाई कब और कैसे की?
सीबीआई ने 17 अप्रैल 2014 को मामला दर्ज किया और 21 अप्रैल 2014 को जाल बिछाकर देवीदास शिंडिकर को शिकायतकर्ता से ₹10 लाख की रिश्वत स्वीकार करते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया। इसके बाद 21 जुलाई 2014 को अदालत में चार्जशीट दाखिल की गई।
इस रिश्वत मामले की शुरुआत कैसे हुई थी?
नासिक के एक स्कूल के महासचिव ने सीबीआई में शिकायत दर्ज कराई थी कि ईपीएफओ अधिकारी देवीदास शिंडिकर ने स्कूल के ईपीएफ बकाया और जुर्माने की राशि कम करने के बदले में रिश्वत माँगी थी। अधिकारी ने पहले ₹8.50 लाख, फिर ₹13 लाख और अंततः ₹10 लाख में सौदा तय किया था।
फैसला आने में इतना समय क्यों लगा?
मामला 2014 में दर्ज हुआ था और 2026 में फैसला आया — यानी करीब 12 साल की न्यायिक प्रक्रिया। भारत में सीबीआई के भ्रष्टाचार मामलों में साक्ष्य संकलन, चार्जशीट दाखिल करने और अदालत में सुनवाई की लंबी प्रक्रिया के चलते ऐसे मामलों में अक्सर वर्षों का समय लग जाता है।
इस फैसले का ईपीएफओ और सरकारी कर्मचारियों पर क्या असर होगा?
यह फैसला सरकारी अधिकारियों द्वारा की जाने वाली घूसखोरी के खिलाफ एक कड़ा संदेश है। ईपीएफओ जैसी संस्थाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दृष्टि से यह निर्णय महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह संगठन देशभर के करोड़ों कर्मचारियों की भविष्य निधि का प्रबंधन करता है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 महीना पहले
  2. 1 महीना पहले
  3. 4 महीने पहले
  4. 8 महीने पहले
  5. 8 महीने पहले
  6. 9 महीने पहले
  7. 11 महीने पहले
  8. 11 महीने पहले