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अथिकडवु-अविनाशी परियोजना: एलबीपी किसानों ने माँगा जल आवंटन का पारदर्शी ढाँचा, 1.5 टीएमसी सीमा पर जोर

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अथिकडवु-अविनाशी परियोजना: एलबीपी किसानों ने माँगा जल आवंटन का पारदर्शी ढाँचा, 1.5 टीएमसी सीमा पर जोर

सारांश

ईरोड के एलबीपी किसान अथिकडवु-अविनाशी परियोजना के विरोधी नहीं, बल्कि पारदर्शिता चाहते हैं — 1.5 टीएमसी की स्वीकृत सीमा और प्राथमिकता-क्रम के साथ। WRD का कहना है कि 180 क्यूसेक केवल अधिशेष नदी-जल है, बाँध का पानी नहीं। दोनों पक्षों के बीच सुलह की कुंजी एक लिखित जल-वितरण ढाँचे में है।

मुख्य बातें

लोअर भवानी आयाकट भूमि स्वामी संघ ने 21 जून को ईरोड जिला प्रशासन से अथिकडवु-अविनाशी परियोजना के लिए पारदर्शी जल आवंटन ढाँचे की माँग की।
परियोजना ईरोड, तिरुप्पुर और कोयंबटूर के 1,045 जलाशयों को पाइपलाइन नेटवर्क से जोड़ती है।
किसानों की माँग — जल निकासी स्वीकृत 1.5 टीएमसी की सीमा में रहे और मौजूदा सिंचाई प्रणालियों को प्राथमिकता मिले।
जल संसाधन विभाग (WRD) ने स्पष्ट किया कि भवानी नदी के 298 क्यूसेक अधिशेष प्रवाह में से 180 क्यूसेक परियोजना को दिया जा रहा है — भवानीसागर बाँध से नहीं।
अधिकारियों के अनुसार, यह जल अन्यथा कावेरी नदी में बह जाता और मौजूदा सिंचाई अधिकार अप्रभावित हैं।

ईरोड में लोअर भवानी परियोजना (एलबीपी) पर निर्भर किसानों ने 21 जून को जिला प्रशासन से माँग की है कि अथिकडवु-अविनाशी परियोजना के लिए जल आपूर्ति का एक पारदर्शी और स्थायी ढाँचा तत्काल स्थापित किया जाए। किसानों का कहना है कि वर्तमान में परियोजना को पानी किस स्रोत से और किन नियमों के तहत दिया जा रहा है, इस पर कोई स्पष्टता नहीं है।

परियोजना का उद्देश्य और दायरा

तमिलनाडु सरकार की महत्वाकांक्षी अथिकडवु-अविनाशी परियोजना का लक्ष्य ईरोड, तिरुप्पुर और कोयंबटूर जिलों में जलाशयों को पुनर्जीवित करना और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देना है। इस योजना के अंतर्गत 1,045 तालाबों, झीलों और जलाशयों को पाइपलाइन नेटवर्क से जोड़ा गया है, ताकि अतिरिक्त जल को सूखा-प्रभावित क्षेत्रों तक पहुँचाया जा सके। यह परियोजना क्षेत्र की दीर्घकालिक जल-सुरक्षा के लिए अहम मानी जाती है।

किसानों की मुख्य माँगें

लोअर भवानी आयाकट भूमि स्वामी संघ के अध्यक्ष एस. पेरियासामी ने स्पष्ट किया कि किसान परियोजना के विरोधी नहीं हैं, बल्कि पारंपरिक सिंचाई प्रणालियों के अधिकारों की सुरक्षा चाहते हैं। उन्होंने कहा, 'हम अथिकडवु-अविनाशी परियोजना का समर्थन करते हैं और इसके लिए पानी दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन पानी तभी दिया जाना चाहिए जब मौजूदा सिंचाई प्रणालियों की ज़रूरतें पूरी होने के बाद अतिरिक्त जल उपलब्ध हो।'

पेरियासामी ने बताया कि लोअर भवानी परियोजना, कलिंगरायन नहर, थडापल्ली नहर और अरक्कनकोट्टई नहर के लिए पहले से जल वितरण की स्पष्ट व्यवस्था है। उनकी माँग है कि अथिकडवु-अविनाशी योजना के लिए भी इसी तर्ज पर ढाँचा बनाया जाए और जल निकासी स्वीकृत 1.5 टीएमसी की सीमा के भीतर ही रखी जाए। गौरतलब है कि भवानीसागर बाँध का जलस्तर फिलहाल कम है, जिससे किसानों में यह आशंका गहरी हो गई है कि परियोजना को पानी कहाँ से दिया जा रहा है।

जल संसाधन विभाग का पक्ष

जल संसाधन विभाग (WRD) के अधिकारियों ने किसानों की आशंकाओं को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि वर्तमान में भवानीसागर बाँध से अथिकडवु-अविनाशी परियोजना के लिए कोई पानी नहीं लिया जा रहा है। परियोजना से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि हाल की बारिश के कारण स्थानीय जलग्रहण क्षेत्रों से भवानी नदी में अतिरिक्त जल प्रवाह हुआ है और केवल इसी अधिशेष जल का उपयोग किया जा रहा है, जो अन्यथा कावेरी नदी में बह जाता।

अधिकारी के अनुसार, 'लोअर भवानी परियोजना, कलिंगरायन, थडापल्ली और अरक्कनकोट्टई सिंचाई प्रणालियों की ज़रूरतें पूरी होने के बाद अधिकतम 1.5 टीएमसी अतिरिक्त पानी ही अथिकडवु परियोजना को दिया जा सकता है।'

ताज़ा आँकड़े

WRD के अनुसार, हाल ही में भवानी नदी में 298 क्यूसेक अतिरिक्त जल प्रवाह दर्ज किया गया, जिसमें से 180 क्यूसेक पानी अथिकडवु-अविनाशी परियोजना की ओर मोड़ा गया। विभाग ने दोहराया कि यह योजना स्वीकृत नियमों के तहत संचालित हो रही है और मौजूदा सिंचाई प्रणालियों के अधिकारों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ रहा।

आगे की राह

किसानों ने अपनी माँगें औपचारिक रूप से जिला प्रशासन के समक्ष रखी हैं और परियोजना के लिए जल मोड़ने संबंधी दिशा-निर्देशों पर लिखित स्पष्टीकरण माँगा है। यह ऐसे समय में आया है जब तमिलनाडु के कई जलाशय मानसून-पूर्व दबाव में हैं और कृषि समुदाय जल-अधिकारों को लेकर अधिक सतर्क हो गए हैं। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन और WRD किसानों की पारदर्शिता की माँग पर कितनी तेज़ी से प्रतिक्रिया देते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असल में यह शासन की एक पुरानी खामी को उजागर करती है — बड़ी बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ अक्सर तकनीकी स्वीकृति के साथ शुरू होती हैं, पर हितधारकों के साथ संवाद बाद में आता है। WRD का '298 में से 180 क्यूसेक अधिशेष' का तर्क तकनीकी रूप से सही हो सकता है, लेकिन जब बाँध का जलस्तर कम हो तो किसानों की आशंका स्वाभाविक है। तमिलनाडु में अंतर-जिला जल विवादों का इतिहास बताता है कि लिखित वितरण प्रोटोकॉल की अनुपस्थिति छोटे तनावों को बड़े संघर्षों में बदल देती है। सरकार के लिए सबसे स्मार्ट कदम होगा — एलबीपी किसानों की माँग के अनुरूप एक सार्वजनिक, सत्यापन-योग्य जल-लेखा प्रणाली तत्काल स्थापित करना।
RashtraPress
6 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अथिकडवु-अविनाशी परियोजना क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?
यह तमिलनाडु सरकार की एक महत्वाकांक्षी जल-प्रबंधन योजना है, जिसके तहत ईरोड, तिरुप्पुर और कोयंबटूर जिलों के 1,045 तालाबों, झीलों और जलाशयों को पाइपलाइन नेटवर्क से जोड़ा गया है। इसका मुख्य उद्देश्य अधिशेष जल को सूखा-प्रभावित क्षेत्रों तक पहुँचाना और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देना है।
एलबीपी किसान अथिकडवु-अविनाशी परियोजना का विरोध क्यों कर रहे हैं?
किसान परियोजना के विरोधी नहीं हैं, बल्कि वे जल आवंटन में पारदर्शिता चाहते हैं। उनकी चिंता है कि जब भवानीसागर बाँध का जलस्तर कम है, तब परियोजना को पानी कहाँ से दिया जा रहा है — इस पर कोई लिखित या सार्वजनिक ढाँचा नहीं है।
किसानों की मुख्य माँग क्या है?
लोअर भवानी आयाकट भूमि स्वामी संघ के अध्यक्ष एस. पेरियासामी के नेतृत्व में किसानों ने माँग की है कि अथिकडवु-अविनाशी परियोजना के लिए जल निकासी स्वीकृत 1.5 टीएमसी की सीमा में रखी जाए और मौजूदा सिंचाई प्रणालियों — लोअर भवानी, कलिंगरायन, थडापल्ली, अरक्कनकोट्टई — की ज़रूरतें पहले पूरी होने के बाद ही अधिशेष जल दिया जाए।
जल संसाधन विभाग (WRD) ने किसानों की आशंकाओं पर क्या कहा?
WRD ने स्पष्ट किया कि भवानीसागर बाँध से परियोजना के लिए कोई पानी नहीं लिया जा रहा। हाल की बारिश से भवानी नदी में 298 क्यूसेक अधिशेष प्रवाह हुआ, जिसमें से 180 क्यूसेक परियोजना को दिया गया — यह जल अन्यथा कावेरी नदी में बह जाता।
इस विवाद का किसानों पर क्या असर पड़ सकता है?
यदि जल वितरण का कोई लिखित प्रोटोकॉल नहीं बना, तो मानसून कमज़ोर रहने की स्थिति में एलबीपी पर निर्भर किसानों को सिंचाई के लिए पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है। एक पारदर्शी ढाँचे की अनुपस्थिति भविष्य में जिलों के बीच जल-विवाद को भी जन्म दे सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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