मथुरा के गौरी गोपाल आश्रम में जन्माष्टमी: बुजुर्ग महिलाओं ने सुनाई अपनों की यादें और कृष्ण भक्ति की कहानी
सारांश
मुख्य बातें
मथुरा के गौरी गोपाल वृद्ध आश्रम में रहने वाली बुजुर्ग महिलाओं के लिए जन्माष्टमी का पर्व केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि अपनेपन और श्रद्धा का एक अनूठा संगम है। 4 सितंबर को जब समूचा मथुरा-वृंदावन कृष्ण भक्ति में डूबा था, तब इस आश्रम में भी कान्हा के जन्मोत्सव की तैयारियाँ पूरे जोश के साथ चल रही थीं। यहाँ रहने वाली महिलाओं ने अपनी जीवन-यात्रा और इस उत्सव से जुड़ी भावनाओं को साझा किया।
आश्रम में जन्माष्टमी की परंपरा
आश्रम में रहने वाली बीना ने बताया कि जन्माष्टमी की तैयारियाँ कई दिन पहले से ही शुरू हो जाती हैं। रात 12 बजे कान्हा जी का जन्म कराया जाता है और इसके लिए खीरे का उपयोग करने की पारंपरिक रीत निभाई जाती है। जन्म के पश्चात भगवान को भोग अर्पित किया जाता है, जिसमें व्रत के दौरान खाए जाने वाले सिंघाड़े और तिखुर जैसी सामग्री भी शामिल होती है। अनिरुद्धाचार्य महाराज की ओर से भी प्रसाद और अन्य आवश्यक सामग्री की व्यवस्था की जाती है।
बुजुर्ग महिलाओं की जीवन-कहानी
बीना को आश्रम में रहते हुए करीब दो वर्ष हो चुके हैं। वह बताती हैं कि यहाँ खाने-पीने से लेकर दूध और दवाइयों तक हर सुविधा समय पर उपलब्ध है। उनकी बेटी और दामाद समय-समय पर मिलने आते हैं और साड़ी, ब्लाउज, कंबल जैसी ज़रूरी चीज़ें लेकर आते हैं। बीना के अनुसार परिवार का यह अपनापन उनके लिए बेहद मायने रखता है।
बीना का कृष्ण भक्ति से गहरा जुड़ाव है — वह धार्मिक पंक्तियाँ और भगवान के नाम लिखती रहती हैं। बातचीत के दौरान उन्होंने 'कभी राम बनके कभी श्याम बनके' भजन भी सुनाया, जो कृष्ण और राम दोनों को समर्पित है।
आश्रम की सेवा और अपनापन
आश्रम में रहने वाली एक अन्य बुजुर्ग महिला ने बताया कि वह भी करीब दो वर्षों से यहाँ हैं। उनके अनुसार गुरु जी ने उन्हें बहुत अच्छे से रखा है और दूध, चाय, नाश्ता, भोजन — सब कुछ समय पर मिलता है। उन्होंने कहा कि जैसी देखभाल यहाँ होती है, वैसी शायद हर जगह संभव नहीं।
बीना भावुक होकर कहती हैं कि महाराज जी और आश्रम से जुड़े लोग जिस तरह बुजुर्ग महिलाओं की सेवा करते हैं, उससे घर जैसा अपनापन महसूस होता है और घर की याद बहुत कम आती है।
परिवार से दूरी और नई राह
दूसरी महिला ने बताया कि उनकी माँ अब इस दुनिया में नहीं हैं। उन्होंने अपने भाई को पाला, परिवार के लिए बहुत कुछ किया और बाद में भाई की शादी भी कराई। जीवन के एक पड़ाव पर उन्होंने बड़े घरों में बच्चों की देखभाल का काम भी किया। परिवार के लोग अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो गए और जब उन्हें खुद सहारे की ज़रूरत पड़ी, तब किसी ने उन्हें गौरी गोपाल आश्रम के बारे में बताया और वह यहाँ आ गईं।
कृष्णनगरी में उत्सव का माहौल
यह ऐसे समय में आया है जब मथुरा-वृंदावन में जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिरों से लेकर आश्रमों तक हर कोने में भक्ति का वातावरण छाया रहता है। गौरी गोपाल आश्रम की ये बुजुर्ग महिलाएं इस उत्सव में न केवल श्रद्धालु के रूप में, बल्कि कृष्ण भक्ति की जीवंत वाहक के रूप में भाग लेती हैं। आने वाले वर्षों में भी यह परंपरा यहाँ इसी उत्साह के साथ जारी रहने की उम्मीद है।