गौतमबुद्धनगर में 13 अप्रैल की श्रमिक हिंसा की मजिस्ट्रियल जांच, 15 मई तक साक्ष्य जमा करने का आदेश
सारांश
मुख्य बातें
गौतमबुद्धनगर में 13 अप्रैल 2026 को थाना फेस-2 और थाना सेक्टर-63 क्षेत्र में श्रमिकों और कामगारों द्वारा किए गए धरना-प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा की अब मजिस्ट्रियल जांच होगी। पीठासीन अधिकारी विशेष न्यायालय एवं अपर पुलिस आयुक्त (मुख्यालय) अजय कुमार को इस जांच के लिए नामित किया गया है और आम नागरिकों से 15 मई 2026 तक मौखिक, लिखित एवं इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्रस्तुत करने का आग्रह किया गया है।
13 अप्रैल को क्या हुआ था
प्रशासन की ओर से जारी आधिकारिक सूचना के अनुसार, 13 अप्रैल को थाना फेस-2 और थाना सेक्टर-63 के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में श्रमिकों और कामगारों ने धरना-प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान कई स्थानों पर स्थिति तनावपूर्ण हो गई और हिंसक घटनाएँ सामने आईं। प्रशासन का कहना है कि उपद्रव, तोड़फोड़ और अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हुई, जिससे कानून-व्यवस्था एवं लोक व्यवस्था प्रभावित हुई।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस प्रशासन को हल्का बल प्रयोग करना पड़ा। यह ऐसे समय में आया जब औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिक असंतोष की घटनाएँ पहले भी सामने आती रही हैं।
मजिस्ट्रियल जांच का दायरा
शासन स्तर पर लिए गए निर्णय के अनुसार, जांच का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि हिंसक प्रदर्शन किन कारणों और परिस्थितियों में हुआ। जांच में यह भी देखा जाएगा कि क्या किसी व्यक्ति अथवा संगठन द्वारा श्रमिकों को उकसाया गया था और हिंसा के पीछे कौन-कौन से कारक जिम्मेदार थे। अपर पुलिस आयुक्त अजय कुमार इस पूरे प्रकरण की गहन जांच करेंगे।
साक्ष्य कैसे और कहाँ जमा करें
प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जिन नागरिकों के पास घटना से संबंधित वीडियो, ऑडियो, फोटो अथवा अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य हैं, वे उन्हें जांच टीम के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। प्रत्यक्षदर्शी अपना मौखिक या लिखित बयान भी दर्ज करा सकते हैं। सभी साक्ष्य 15 मई 2026 तक किसी भी कार्य दिवस में पुलिस लाइन, गौतमबुद्धनगर स्थित पुलिस उपायुक्त लाइन्स कार्यालय में सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे IST के बीच जमा किए जा सकते हैं।
प्रशासन का आश्वासन
प्रशासन ने कहा है कि जांच पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ की जाएगी ताकि घटना के वास्तविक कारणों का पता लगाया जा सके। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाएगा कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। गौरतलब है कि मजिस्ट्रियल जांच का आदेश आमतौर पर तभी दिया जाता है जब घटना की गंभीरता और सार्वजनिक प्रभाव असाधारण हो।