24 सितंबर 2026
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खाद्य तेल सस्ता होगा: कच्चे सूरजमुखी तेल पर आयात शुल्क शून्य, सोयाबीन-पाम ऑयल पर 5% किया

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खाद्य तेल सस्ता होगा: कच्चे सूरजमुखी तेल पर आयात शुल्क शून्य, सोयाबीन-पाम ऑयल पर 5% किया

सारांश

खाद्य महंगाई से राहत के लिए केंद्र सरकार का बड़ा फैसला — कच्चे सूरजमुखी तेल पर आयात शुल्क पूरी तरह शून्य, सोयाबीन और पाम ऑयल पर 10% से घटाकर 5%। घरेलू रिफाइनिंग उद्योग बचाने के लिए 19.25% का शुल्क अंतर बरकरार; उद्योग को लाभ उपभोक्ताओं तक पहुँचाने की सलाह भी जारी।

मुख्य बातें

केंद्र सरकार ने 24 सितंबर 2026 को कच्चे खाद्य तेलों पर बेसिक कस्टम ड्यूटी (BCD) में कटौती की घोषणा की।
कच्चे सूरजमुखी तेल पर आयात शुल्क 10% से घटाकर शून्य कर दिया गया।
कच्चे सोयाबीन तेल और कच्चे पाम ऑयल पर शुल्क 10% से घटाकर 5% किया गया।
कच्चे और रिफाइंड तेलों के बीच 19.25% का शुल्क अंतर बरकरार रखा गया, ताकि घरेलू रिफाइनिंग उद्योग सुरक्षित रहे।
सरकार ने उद्योग संगठनों को सलाह (advisory) जारी कर शुल्क कटौती का लाभ जल्द उपभोक्ताओं तक पहुँचाने की अपील की।

केंद्र सरकार ने 24 सितंबर 2026 को खाद्य महंगाई से राहत दिलाने के लिए प्रमुख आयातित कच्चे खाद्य तेलों पर बेसिक कस्टम ड्यूटी (BCD) में उल्लेखनीय कटौती की है। नई व्यवस्था के तहत कच्चे सूरजमुखी तेल पर लागू 10 प्रतिशत आयात शुल्क पूरी तरह समाप्त कर शून्य कर दिया गया है, जबकि कच्चे सोयाबीन तेल और कच्चे पाम ऑयल पर शुल्क 10 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया है। यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में खाद्य तेलों की कीमतों में तेज़ उछाल आई है और उसका सीधा असर घरेलू खुदरा बाज़ार पर पड़ रहा था।

नई शुल्क संरचना क्या है

शुल्क कटौती की नई व्यवस्था के अनुसार, कच्चे सूरजमुखी तेल (क्रूड सनफ्लावर ऑयल) पर पहले लागू 10% की बेसिक कस्टम ड्यूटी को पूरी तरह हटा दिया गया है। वहीं, कच्चे सोयाबीन तेल और कच्चे पाम ऑयल पर आयात शुल्क 10% से घटाकर 5% कर दिया गया है।

सरकार ने परिष्कृत (रिफाइंड) खाद्य तेलों पर लागू सीमा शुल्क में भी कमी की है, लेकिन कच्चे और रिफाइंड तेलों के बीच 19.25 प्रतिशत का शुल्क अंतर बरकरार रखा है। यह फर्क जानबूझकर बनाए रखा गया है, ताकि रिफाइंड तेल के आयात को प्रोत्साहन न मिले।

घरेलू रिफाइनिंग उद्योग की सुरक्षा

सरकार ने शुल्क ढाँचे में यह सुनिश्चित किया है कि कच्चे तेल पर राहत देते हुए भी देश के रिफाइनिंग उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता बनी रहे। अधिकारियों के अनुसार, यह नीति घरेलू रिफाइनर्स के लिए समान प्रतिस्पर्धात्मक माहौल तैयार करेगी और देश के भीतर वैल्यू एडिशन को प्रोत्साहित करेगी। इस तरह तैयार तेल के आयात पर अंकुश लगाते हुए स्थानीय उद्योग को संरक्षित रखा गया है।

वैश्विक कीमतों का दबाव और भारत की आयात-निर्भरता

भारत अपनी खाद्य तेल ज़रूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के ज़रिए पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में आई तेज़ी का सीधा असर घरेलू लैंडेड कॉस्ट और खुदरा कीमतों पर पड़ता है। गौरतलब है कि वैश्विक आपूर्ति में व्यवधान और मुद्रा उतार-चढ़ाव के कारण पिछले कुछ महीनों में आयात लागत काफी बढ़ी है, जिसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर आ रहा था।

यह ऐसे समय में आया है जब खाद्य महंगाई पर नियंत्रण सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में खाद्य तेल की कीमतें प्रमुख योगदानकर्ता रही हैं।

उद्योग को सलाह: राहत उपभोक्ताओं तक पहुँचाएँ

शुल्क कटौती के साथ-साथ सरकार ने खाद्य तेल उद्योग संगठनों और संबंधित कंपनियों को एक सलाह (advisory) भी जारी की है। इसमें उनसे अपील की गई है कि आयात शुल्क में कमी का लाभ जल्द से जल्द उपभोक्ताओं तक पहुँचाया जाए, ताकि खुदरा बाज़ार में कीमतों में वास्तविक राहत दिखे और यह कदम महज़ कागज़ी न रहे।

आम उपभोक्ता पर असर और आगे की राह

सरकार के अनुसार, आयात लागत में कमी का फायदा पूरी आपूर्ति शृंखला के ज़रिए उपभोक्ताओं तक पहुँचने की उम्मीद है। यह कदम घरेलू परिवारों पर बढ़ती खाद्य महंगाई का बोझ कम करने और समग्र मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। अब देखना होगा कि बाज़ार में यह कटौती कितनी तेज़ी से प्रतिबिंबित होती है और उद्योग सरकार की इस अपील पर किस हद तक अमल करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा यह है कि यह राहत आपूर्ति शृंखला से होते हुए आम उपभोक्ता की थाली तक पहुँचे या नहीं। अतीत में देखा गया है कि शुल्क कटौती का लाभ ट्रेडर्स और रिफाइनर्स अपने मार्जिन में समेट लेते हैं और खुदरा कीमतें देर से गिरती हैं। सरकार की advisory सराहनीय है, लेकिन बिना किसी बाध्यकारी मूल्य-निगरानी तंत्र के यह महज़ अपील बनकर रह सकती है। साथ ही, भारत की खाद्य तेल में दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता के लिए तिलहन उत्पादन बढ़ाने की नीतियाँ उतनी ही ज़रूरी हैं जितनी बार-बार की जाने वाली शुल्क कटौतियाँ।
RashtraPress
24 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सरकार ने किन खाद्य तेलों पर आयात शुल्क घटाया है?
सरकार ने कच्चे सूरजमुखी तेल पर आयात शुल्क 10% से घटाकर शून्य और कच्चे सोयाबीन तेल तथा कच्चे पाम ऑयल पर शुल्क 10% से घटाकर 5% किया है। रिफाइंड खाद्य तेलों पर भी शुल्क में कमी की गई है।
खाद्य तेल पर आयात शुल्क क्यों घटाया गया?
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में खाद्य तेलों की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी से आयात लागत बढ़ी थी, जिसका असर घरेलू खुदरा बाज़ार पर पड़ रहा था। शुल्क घटाकर सरकार आयात लागत कम करना और उपभोक्ताओं को महंगाई से राहत दिलाना चाहती है।
कच्चे और रिफाइंड तेल पर शुल्क अंतर क्यों बनाए रखा गया?
कच्चे और रिफाइंड तेलों के बीच 19.25% का शुल्क अंतर इसलिए बरकरार रखा गया है ताकि रिफाइंड तेल का सस्ता आयात न बढ़े और देश का घरेलू रिफाइनिंग उद्योग प्रतिस्पर्धी बना रहे। इससे देश में वैल्यू एडिशन को बढ़ावा मिलता है।
क्या यह शुल्क कटौती उपभोक्ताओं तक पहुँचेगी?
सरकार ने खाद्य तेल उद्योग संगठनों और कंपनियों को एक सलाह जारी कर शुल्क कटौती का लाभ जल्द उपभोक्ताओं तक पहुँचाने की अपील की है। हालाँकि यह राहत वास्तव में खुदरा कीमतों में कब और कितनी दिखेगी, यह आपूर्ति शृंखला की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा।
भारत खाद्य तेल के लिए आयात पर इतना निर्भर क्यों है?
भारत अपनी खाद्य तेल ज़रूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के ज़रिए पूरा करता है क्योंकि घरेलू तिलहन उत्पादन माँग के अनुरूप नहीं है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बदलाव का सीधा असर देश के खुदरा बाज़ार पर पड़ता है।
राष्ट्र प्रेस
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