3 अक्टूबर 2026
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राजकोट में बुजुर्ग महिला डॉक्टर से 'डिजिटल अरेस्ट' कर ₹58.5 लाख ठगे, अहमदाबाद से दो आरोपी गिरफ्तार

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राजकोट में बुजुर्ग महिला डॉक्टर से 'डिजिटल अरेस्ट' कर ₹58.5 लाख ठगे, अहमदाबाद से दो आरोपी गिरफ्तार

सारांश

राजकोट में एक बुजुर्ग महिला डॉक्टर को 'डिजिटल अरेस्ट' का भय दिखाकर ₹58.5 लाख ठगे गए — और साइबर क्राइम पुलिस ने मुकदमा दर्ज होने के कुछ ही घंटों में अहमदाबाद से दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। यह मामला देशभर में तेज़ी से फैल रहे 'डिजिटल अरेस्ट' घोटाले की गंभीरता को एक बार फिर उजागर करता है।

मुख्य बातें

राजकोट की साइबर क्राइम पुलिस ने 3 अक्टूबर 2026 को एक बुजुर्ग महिला डॉक्टर से ₹58.5 लाख की 'डिजिटल अरेस्ट' ठगी के मामले में दो आरोपी गिरफ्तार किए।
आरोपी दर्शन मकवाना (34) और शुभम परमार (29) अहमदाबाद से गिरफ्तार किए गए; दोनों ने कथित तौर पर कमीशन पर अपने बैंक खाते ठगों को दिए।
मामले में भारतीय न्याय संहिता, 2023 और IT एक्ट की धारा 66(डी) सहित कई धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज।
पुलिस ने आरोपियों से 4 मोबाइल फोन और 1 लैपटॉप (कुल कीमत ₹1.20 लाख ) जब्त किए।
गिरफ्तारी पुलिस कमिश्नर ब्रजेशकुमार झा और एडिशनल पुलिस कमिश्नर चैतन्य मांडलिक की देखरेख में हुई।

राजकोट की साइबर क्राइम पुलिस ने एक बुजुर्ग महिला डॉक्टर को कथित तौर पर 'डिजिटल अरेस्ट' कर ₹58.5 लाख की धोखाधड़ी करने के मामले में 3 अक्टूबर 2026 को मुकदमा दर्ज होने के कुछ ही घंटों के भीतर अहमदाबाद से दो आरोपियों को गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार, साइबर ठगी से हासिल की गई यह रकम आरोपियों के बैंक खातों के ज़रिए ट्रांसफर की गई थी।

आरोपियों की पहचान

गिरफ्तार किए गए आरोपियों की पहचान दर्शन मकवाना (34) — जो अहमदाबाद के इसानपुर इलाके के निवासी हैं और मूलतः धोलेरा तालुका के भांगढ़ गांव के रहने वाले हैं — तथा शुभम परमार (29) — जो भावनगर के निवासी और मूलतः बोटाद के रहने वाले हैं — के रूप में की गई है। साइबर क्राइम पुलिस के अनुसार, दोनों ने कथित तौर पर कमीशन के बदले अपनी कंपनी के बैंक खाते साइबर अपराधियों को उपलब्ध कराए, जिससे ठगी की रकम को आसानी से स्थानांतरित किया जा सका।

मामले का घटनाक्रम

पुलिस ने बताया कि जांच एक बुजुर्ग महिला डॉक्टर की शिकायत के आधार पर शुरू हुई, जिन्हें कथित तौर पर फर्जी कानून प्रवर्तन अधिकारी बनकर फोन किया गया और 'डिजिटल अरेस्ट' का भय दिखाकर ₹58.5 लाख ट्रांसफर करवाए गए। 'डिजिटल अरेस्ट' घोटाले में ठग, फर्जी सरकारी या पुलिस अधिकारी बनकर पीड़ितों से वीडियो कॉल पर संपर्क करते हैं और किसी कथित जांच का हवाला देकर उन्हें मानसिक दबाव में रखते हैं तथा रकम ट्रांसफर करवाते हैं।

पुलिस ने कहा, 'ये गिरफ्तारियां टेक्निकल एनालिसिस और बैंक से जुड़ी जानकारी के आधार पर की गईं।' गिरफ्तारी की कार्रवाई सिटी पुलिस कमिश्नर ब्रजेशकुमार झा और एडिशनल पुलिस कमिश्नर चैतन्य मांडलिक की देखरेख में गठित टीम ने की।

कानूनी धाराएँ और जब्त सामान

राजकोट के साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराओं 318(4), 308(2), 319(2), 204 और 61(2) के साथ-साथ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट की धारा 66(डी) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिस ने आरोपियों से चार मोबाइल फोन और एक लैपटॉप जब्त किया है, जिनकी कुल अनुमानित कीमत ₹1.20 लाख बताई गई है।

आम जनता के लिए चेतावनी

पुलिस ने नागरिकों से अपील की है कि वे अनजान कॉलर्स के साथ अपनी बैंक डिटेल्स, ओटीपी, पासवर्ड या कोई भी संवेदनशील जानकारी साझा न करें। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि कोई भी वैध सरकारी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर 'डिजिटल अरेस्ट' नहीं करती और न ही इस तरह से धनराशि की मांग करती है। यह ऐसे समय में आया है जब पूरे देश में 'डिजिटल अरेस्ट' साइबर ठगी के मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है।

आगे की कार्रवाई

पुलिस ने बताया कि मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी है और जांच के दायरे को और विस्तृत किया जा सकता है। संदिग्ध साइबर धोखाधड़ी की सूचना देने के लिए नागरिकों से आधिकारिक साइबर क्राइम हेल्पलाइन से संपर्क करने का आग्रह किया गया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो दर्शाता है कि ठगों का नेटवर्क अब टियर-2 शहरों में भी गहरी जड़ें जमा चुका है। जो बात इस मामले को विशेष रूप से चिंताजनक बनाती है वह यह है कि आरोपी खुद कोई साइबर अपराधी नहीं थे — वे केवल बैंक खाते 'किराए' पर देने वाले 'मनी म्यूल' थे, जो इस अपराध पारिस्थितिकी तंत्र की व्यापकता को उजागर करता है। तेज़ गिरफ्तारी उत्साहजनक है, लेकिन असल सवाल यह है कि मुख्य साइबर ठग — जो संभवतः दूसरे राज्य या देश में बैठे हैं — क्या पकड़ में आएंगे? बिना मूल षड्यंत्रकारियों तक पहुँचे, इस तरह की गिरफ्तारियाँ आपराधिक नेटवर्क को बाधित नहीं कर सकतीं।
RashtraPress
3 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'डिजिटल अरेस्ट' घोटाला क्या है?
'डिजिटल अरेस्ट' एक साइबर धोखाधड़ी है जिसमें ठग फर्जी पुलिस, CBI या अन्य सरकारी अधिकारी बनकर वीडियो कॉल पर संपर्क करते हैं और पीड़ित को कथित जांच के नाम पर घर में 'कैद' रहने का डर दिखाकर पैसे ट्रांसफर करवाते हैं। कोई भी वैध सरकारी एजेंसी इस तरह से फोन पर गिरफ्तारी नहीं करती।
राजकोट के इस मामले में कितनी रकम की ठगी हुई और आरोपी कौन हैं?
इस मामले में एक बुजुर्ग महिला डॉक्टर से कथित तौर पर ₹58.5 लाख की ठगी की गई। गिरफ्तार आरोपी दर्शन मकवाना (34) और शुभम परमार (29) हैं, जिन्होंने कथित तौर पर कमीशन के बदले अपनी कंपनी के बैंक खाते साइबर ठगों को उपलब्ध कराए।
आरोपियों पर कौन-सी कानूनी धाराएँ लगाई गई हैं?
राजकोट साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराओं 318(4), 308(2), 319(2), 204 और 61(2) के साथ-साथ IT एक्ट की धारा 66(डी) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।
साइबर ठगी से बचने के लिए क्या सावधानियाँ बरतें?
पुलिस ने नागरिकों को सलाह दी है कि अनजान कॉल पर कभी भी बैंक डिटेल्स, ओटीपी या पासवर्ड साझा न करें। यदि कोई फोन पर गिरफ्तारी या कानूनी कार्रवाई की धमकी दे और पैसे माँगे, तो तुरंत आधिकारिक साइबर क्राइम हेल्पलाइन पर सूचना दें।
क्या इस मामले में मुख्य साइबर अपराधी भी पकड़े गए हैं?
अभी तक केवल दो 'मनी म्यूल' — जिन्होंने अपने बैंक खाते ठगों को दिए — गिरफ्तार किए गए हैं। पुलिस ने बताया कि मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है और जांच का दायरा बढ़ाया जा सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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