24 अक्टूबर 2026
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डिजिटल अरेस्ट से ₹2 करोड़ की ठगी: बुलढाणा साइबर पुलिस ने कोलकाता से 2 जालसाज़ दबोचे

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डिजिटल अरेस्ट से ₹2 करोड़ की ठगी: बुलढाणा साइबर पुलिस ने कोलकाता से 2 जालसाज़ दबोचे

सारांश

खामगांव के एक बुज़ुर्ग को TRAI, CBI और ED अधिकारी बनकर 'डिजिटल अरेस्ट' का डर दिखाया और ₹2 करोड़ म्यूल अकाउंट्स में ट्रांसफर करवा लिए। बुलढाणा साइबर पुलिस ने बैंक ट्रेल और मोबाइल लोकेशन के आधार पर कोलकाता से दो जालसाज़ों को दबोचा; गिरोह का मास्टरमाइंड अभी फरार है।

मुख्य बातें

बुलढाणा साइबर पुलिस ने 24 अक्टूबर 2026 को कोलकाता से 2 आरोपियों को गिरफ्तार किया।
जालसाज़ों ने खामगांव के बुज़ुर्ग पीड़ित को TRAI, मुंबई क्राइम ब्रांच और CBI-ED अधिकारी बनकर डराया।
पीड़ित से डर के कारण करीब ₹2 करोड़ म्यूल अकाउंट्स में ट्रांसफर करवाए गए।
गिरोह VPN , फर्ज़ी सिम और शेल कंपनियों के नाम पर खोले सैकड़ों म्यूल अकाउंट्स का उपयोग करता था।
पुलिस ने ठगी की कुछ रकम फ्रीज़ की; गिरोह के मास्टरमाइंड की तलाश जारी।

बुलढाणा साइबर पुलिस (महाराष्ट्र) ने 24 अक्टूबर 2026 को डिजिटल अरेस्ट के एक बड़े मामले का भंडाफोड़ करते हुए कोलकाता से दो आरोपियों को गिरफ्तार किया। इन जालसाज़ों ने खामगांव के एक बुज़ुर्ग व्यक्ति को झूठे सरकारी अधिकारी बनकर डराया और करीब ₹2 करोड़ विभिन्न खातों में ट्रांसफर करवा लिए।

कैसे हुई ठगी

पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने पहले पीड़ित बुज़ुर्ग को फोन किया और खुद को भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI), मुंबई क्राइम ब्रांच तथा केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) एवं प्रवर्तन निदेशालय (ED) का अधिकारी बताया। इसके बाद वीडियो कॉल पर पुलिस की वर्दी पहनकर सामने आए और दावा किया कि पीड़ित के मोबाइल नंबर तथा बैंक खाते का उपयोग मनी लॉन्ड्रिंग व गंभीर अपराधों में हुआ है।

जालसाज़ों ने बुज़ुर्ग को यह भी बताया कि उनका 'डिजिटल अरेस्ट' हो चुका है और सहयोग न करने पर तत्काल गिरफ्तारी की जाएगी। विश्वास दिलाने के लिए उन्होंने फर्ज़ी दस्तावेज़, सर्वोच्च न्यायालय की कथित गाइडलाइन और सरकारी मोहर वाले नोटिस भी दिखाए।

पैसों का ट्रांसफर

भय में आकर पीड़ित बुज़ुर्ग ने आरोपियों द्वारा बताए गए कई म्यूल अकाउंट्स में धनराशि भेजनी शुरू की। ठगों ने आश्वासन दिया था कि जाँच पूरी होने के बाद संपूर्ण रकम लौटा दी जाएगी। इस तरह पीड़ित ने डर के कारण करीब ₹2 करोड़ विभिन्न खातों में स्थानांतरित कर दिए।

काफी समय बीतने के बाद भी पैसे वापस नहीं आए तो बुज़ुर्ग को ठगी का एहसास हुआ और उन्होंने खामगांव साइबर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

जाँच और गिरफ्तारी

शिकायत मिलते ही बुलढाणा साइबर सेल ने तकनीकी जाँच शुरू की। बैंक ट्रेल और मोबाइल लोकेशन डेटा का विश्लेषण कर पुलिस ने कोलकाता में दबिश दी और दोनों संदिग्धों को हिरासत में ले लिया। पुलिस ने ठगी की कुछ रकम को फ्रीज़ भी कर दिया है।

संगठित गिरोह का नेटवर्क

शुरुआती जाँच में यह सामने आया है कि यह एक संगठित साइबर गिरोह है जो VPN, फर्ज़ी सिम कार्ड और शेल कंपनियों के नाम पर खोले गए सैकड़ों म्यूल अकाउंट्स का उपयोग करता है। ठगी की रकम को कई परतों में घुमाया जाता है ताकि उसकी पहचान न हो सके। गिरोह के मास्टरमाइंड की तलाश अभी जारी है।

गौरतलब है कि डिजिटल अरेस्ट के मामले पिछले दो वर्षों में पूरे देश में तेज़ी से बढ़े हैं, और यह मामला इस श्रेणी की सबसे बड़ी ठगियों में से एक है। यह ऐसे समय में सामने आया है जब केंद्र सरकार और साइबर एजेंसियाँ इस तरह के फर्ज़ी 'डिजिटल अरेस्ट' के बारे में आम लोगों को लगातार सतर्क कर रही हैं। आगे की जाँच में गिरोह के अन्य सदस्यों की पहचान और बरामदगी की उम्मीद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि असली मास्टरमाइंड और पैसों का नेटवर्क अछूता रहता है। जब तक म्यूल अकाउंट्स के खिलाफ बैंकों की जवाबदेही और अंतर-राज्यीय साइबर जाँच एजेंसियों के बीच समन्वय नहीं बढ़ता, इस तरह के मामलों में पूर्ण न्याय मिलना कठिन रहेगा।
RashtraPress
24 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डिजिटल अरेस्ट क्या होता है?
'डिजिटल अरेस्ट' एक साइबर ठगी की तकनीक है जिसमें जालसाज़ खुद को पुलिस, CBI या ED अधिकारी बताकर पीड़ित को वीडियो कॉल पर 'गिरफ्तार' होने का डर दिखाते हैं। यह कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है — भारत में 'डिजिटल अरेस्ट' जैसा कोई कानूनी प्रावधान मौजूद नहीं है।
बुलढाणा पुलिस ने आरोपियों को कैसे पकड़ा?
बुलढाणा साइबर सेल ने बैंक ट्रेल और मोबाइल लोकेशन डेटा के आधार पर तकनीकी जाँच की और कोलकाता में दबिश देकर दोनों संदिग्धों को हिरासत में लिया। पुलिस ने ठगी की कुछ रकम को फ्रीज़ भी कर दिया है।
इस ठगी में पीड़ित से कितने पैसे लिए गए?
खामगांव के बुज़ुर्ग पीड़ित से करीब ₹2 करोड़ विभिन्न म्यूल अकाउंट्स में ट्रांसफर करवाए गए। जालसाज़ों ने आश्वासन दिया था कि जाँच पूरी होने पर रकम लौटा दी जाएगी।
यह गिरोह कैसे काम करता था?
यह संगठित गिरोह VPN, फर्ज़ी सिम कार्ड और शेल कंपनियों के नाम पर खोले गए सैकड़ों म्यूल अकाउंट्स का उपयोग करता था। ठगी की रकम को कई परतों में घुमाकर निकाला जाता था ताकि पुलिस की पकड़ में न आए।
डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड से बचने के लिए क्या करें?
कोई भी सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल पर 'डिजिटल अरेस्ट' नहीं करती — ऐसी कोई कॉल आने पर तुरंत फोन काटें और नज़दीकी पुलिस स्टेशन या साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत दर्ज कराएँ। किसी अनजान खाते में पैसे बिल्कुल न भेजें।
राष्ट्र प्रेस
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