वलीनाथ धाम में कच्छ परिवार का महादान: बेटे 'श्रीयांश' को धर्म सेवा के लिए किया समर्पित
सारांश
मुख्य बातें
मेहसाणा जिले के प्रसिद्ध तीर्थस्थल तरभ स्थित वलीनाथ धाम में 31 अगस्त 2026 को आस्था और त्याग की एक विरल मिसाल देखने को मिली। कच्छ जिले की अंजार तहसील के मोखाना गांव के निवासी विसाभाई करमशीभाई नागजीभाई और उनके परिवार ने अपने छोटे बेटे श्रीयांश को वलीनाथ अखाड़े में ईश्वर और धर्म सेवा के लिए समर्पित किया। ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच परिवार वलीनाथ धाम पहुंचा और सनातन परंपरा के अनुसार यह पवित्र अनुष्ठान संपन्न हुआ।
नामकरण और धार्मिक विधि-विधान
बालक को अखाड़े में अर्पित किए जाने के पश्चात वलीनाथ अखाड़े के गादीपति पूज्य महंत श्री जयरामगिरी बापू ने शास्त्रोक्त विधि-विधान से बालक का नामकरण किया। बापू ने इस बालक को 'श्रीयांशगिरी' नाम प्रदान किया। अब श्रीयांशगिरी वलीनाथ धाम में पूज्य बापू के सानिध्य में रहकर धर्म, संस्कृति और सेवा के संस्कार ग्रहण करेंगे।
वलीनाथ परंपरा और पुत्र-दान की पृष्ठभूमि
वलीनाथ परंपरा में पुत्र-दान की यह प्रथा वर्षों से चली आ रही है। इसका मूल उद्देश्य सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार करना और साधु जीवन के माध्यम से समाज का कल्याण करना है। महंत जयरामगिरी बापू के अनुसार, पिछले 5 वर्षों में इस गद्दी को 5 बालक धर्म-सेवा के लिए समर्पित किए जा चुके हैं। यह ऐसे समय में आया है जब सनातन परंपराओं के प्रति युवा पीढ़ी की रुचि को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है।
बालक की इच्छा को प्राथमिकता
गौरतलब है कि इस परंपरा में बालक पर कोई एकतरफा निर्णय नहीं थोपा जाता। अखाड़े में शिक्षा-दीक्षा पूर्ण होने के बाद, वयस्क होने पर बालक की स्वयं की इच्छा के अनुसार ही उसे संत जीवन में दीक्षित किया जाता है। यह प्रावधान इस परंपरा को स्वैच्छिक और सम्मानजनक बनाता है।
आम जनता और श्रद्धालुओं की प्रतिक्रिया
इस अनुष्ठान ने पूरे क्षेत्र के श्रद्धालुओं और धार्मिक समुदाय में गहरी श्रद्धा और कौतूहल का भाव जगाया है। मोखाना गांव के इस परिवार के त्याग को स्थानीय लोग उच्च आस्था का प्रतीक मान रहे हैं। आने वाले समय में श्रीयांशगिरी सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार और समाज-सेवा में योगदान देंगे — यही इस परिवार की आकांक्षा है।