गट माइक्रोबायोम बदलकर कीमोथेरेपी दोगुनी असरदार: नेचर मैटेरियल्स में प्रकाशित शोध
सारांश
मुख्य बातें
यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास एमडी एंडरसन कैंसर सेंटर के शोधकर्ताओं ने कैंसर उपचार में एक महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है — आंतों के बैक्टीरिया यानी गट माइक्रोबायोम में लक्षित बदलाव कर नैनोपार्टिकल-आधारित कीमोथेरेपी दवाओं को ट्यूमर तक पहले से कहीं अधिक मात्रा में पहुंचाया जा सकता है। यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल नेचर मैटेरियल्स में प्रकाशित हुआ है और 4 अगस्त 2026 को वैज्ञानिक जगत में व्यापक चर्चा का विषय बना।
समस्या क्या थी
नैनोपार्टिकल-आधारित कीमोथेरेपी में दवा को अत्यंत सूक्ष्म कणों में पैक कर शरीर में भेजा जाता है, ताकि वह सीधे ट्यूमर तक पहुंच सके। लेकिन शोधकर्ताओं के अनुसार, दवा का बड़ा हिस्सा ट्यूमर तक पहुंचने से पहले ही लिवर की विशेष प्रतिरक्षा कोशिकाएं — जिन्हें कुप्फर सेल्स कहा जाता है — रक्त से हटा देती हैं। इसके परिणामस्वरूप मरीज को दी गई दवा का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।
गट माइक्रोबायोम की भूमिका
अध्ययन में पाया गया कि आंतों के बैक्टीरिया बाइल एसिड नामक रसायन उत्पन्न करते हैं, जो लिवर की कोशिकाओं को संकेत देता है कि वे दवा को कितनी तेजी से साफ करें। शोधकर्ताओं ने मेट्रोनिडाजोल नामक एक पहले से स्वीकृत और सामान्य एंटीबायोटिक का सीमित समय के लिए उपयोग किया। इससे कुछ विशेष बैक्टीरिया की संख्या घटी, बाइल एसिड का स्तर कम हुआ और कुप्फर सेल्स कम सक्रिय हो गईं — जिससे दवा को पहले की तुलना में बहुत कम मात्रा में हटाया गया।
प्रमुख परिणाम
इस हस्तक्षेप के बाद कीमोथेरेपी की दवा शरीर में लगभग दोगुने समय तक बनी रही। प्रीक्लिनिकल मॉडलों में दवा की अधिक मात्रा ट्यूमर तक पहुंची, ट्यूमर की वृद्धि धीमी हुई और जीवित रहने की अवधि भी बढ़ी। यह सकारात्मक असर कोलन, ब्रेस्ट, मेलानोमा और पैंक्रियाटिक कैंसर सहित कई कैंसर मॉडलों में देखा गया।
माइक्रोबायोम की भूमिका की पुष्टि
यह सुनिश्चित करने के लिए कि यह प्रभाव एंटीबायोटिक का प्रत्यक्ष असर नहीं, बल्कि माइक्रोबायोम में बदलाव की वजह से है, वैज्ञानिकों ने फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांट (FMT) का प्रयोग किया। एंटीबायोटिक-उपचारित मॉडल के आंतों के बैक्टीरिया दूसरे मॉडल में स्थानांतरित किए गए और बिना एंटीबायोटिक दिए वही सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए। इससे स्पष्ट हुआ कि असली बदलाव माइक्रोबायोम की वजह से था, न कि दवा के सीधे प्रभाव से।
आगे की राह
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह रिसर्च अभी प्रीक्लिनिकल स्तर पर है और इसे सीधे मरीजों पर लागू नहीं किया जा सकता। हालांकि, चूंकि मेट्रोनिडाजोल पहले से ही स्वीकृत और सुरक्षित दवा है, इसलिए भविष्य में क्लिनिकल ट्रायल के जरिए यह परखा जा सकता है कि क्या इसका अल्पकालिक उपयोग नैनोपार्टिकल-आधारित कीमोथेरेपी के साथ मरीजों को बेहतर परिणाम दे सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि गट माइक्रोबायोम और बाइल एसिड की जांच से यह भी पता चल सकता है कि कौन-से मरीज कीमोथेरेपी से सर्वाधिक लाभ उठा सकते हैं — जो कैंसर उपचार को व्यक्तिगत और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।