12 अक्टूबर 2026
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ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग: पटना में गांधी मैदान से राजभवन तक मार्च का ऐलान

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ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग: पटना में गांधी मैदान से राजभवन तक मार्च का ऐलान

सारांश

सीपीआई (एमएल) विधायक संदीप सौरव ने पटना में एआईएसए और आरवाईए के बैनर तले गांधी मैदान से राजभवन तक मार्च का ऐलान किया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाने के आरोपों के बीच यह विरोध लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर उठते सवालों का नया मोर्चा बन सकता है।

मुख्य बातें

सीपीआई (एमएल) विधायक संदीप सौरव ने एआईएसए और आरवाईए के बैनर तले पटना में मार्च का ऐलान किया।
मार्च गांधी मैदान से राजभवन तक निकाला जाएगा; मुख्य उद्देश्य मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा माँगना है।
सौरव ने दावा किया कि करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए और उत्तर प्रदेश में 16 लाख अज्ञात नाम जोड़े गए।
सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली में बैरिकेडिंग और सड़क बंदी पर सरकारी विभागों तथा दिल्ली मेट्रो को नोटिस जारी किया है।
सौरव ने मार्च को पूरी तरह शांतिपूर्ण बताते हुए पुलिस से बिना बाधा प्रदर्शन की अनुमति देने की अपील की।

सीपीआई (एमएल) विधायक संदीप सौरव ने 12 अक्टूबर 2026 को जानकारी दी कि ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एआईएसए) और रेवोल्यूशनरी यूथ एसोसिएशन (आरवाईए) के कार्यकर्ता पटना के गांधी मैदान से राजभवन तक मार्च निकालेंगे। इस मार्च का मुख्य उद्देश्य मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करना और दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर लगाए जा रहे कथित प्रतिबंधों के विरुद्ध आवाज़ उठाना है।

मार्च का उद्देश्य और पृष्ठभूमि

सौरव ने कहा कि आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहेगा। कार्यकर्ता लोकतंत्र, संविधान और निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास बनाए रखने की माँग उठाएंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि देशभर में चल रहे ऐसे आंदोलनों में एआईएसए की प्रमुख भूमिका रही है।

उन्होंने कहा कि दिल्ली में असहमति और शांतिपूर्ण विरोध की आवाज़ को दबाने की कोशिश हो रही है। उनके अनुसार, युवाओं को अपने अधिकारों और लोकतंत्र की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरना होगा।

दिल्ली में प्रदर्शन पर पाबंदी का विरोध

सौरव ने जंतर-मंतर के बजाय अन्य स्थानों के विकल्प दिए जाने के मुद्दे पर भी आपत्ति जताई। उनके अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के विभिन्न विभागों और दिल्ली मेट्रो को नोटिस जारी कर सड़कें बंद करने और बैरिकेडिंग जैसे कदमों पर सवाल किए हैं। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध को रोकने के लिए व्यापक पाबंदियाँ लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध हैं।

मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर आरोप

सौरव ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मुद्दे को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने दावा किया कि करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं और उत्तर प्रदेश में 16 लाख अज्ञात नाम जोड़े गए हैं। उनके अनुसार इन मुद्दों पर समय रहते प्रभावी कदम उठाए जाते तो मौजूदा स्थिति पैदा नहीं होती।

गौरतलब है कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर इस तरह के सवाल कोई नई बात नहीं है — विपक्षी दल पिछले कुछ समय से मतदाता पंजीकरण और चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सवाल उठाते रहे हैं। यह ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दलों ने सर्वोच्च न्यायालय तक मार्च करने का प्रयास किया था और कथित तौर पर मुख्य न्यायाधीश से मिलने से इनकार किया गया।

न्यायपालिका के हस्तक्षेप की माँग

सौरव ने कहा कि इस पूरे मामले में न्यायपालिका का हस्तक्षेप ज़रूरी है। उनके अनुसार चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा कमज़ोर होना लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने सरकार से अपील की कि विरोध करने वालों से संवाद किया जाए और असहमति के लिए लोकतांत्रिक स्थान सुनिश्चित किया जाए।

पुलिस की भूमिका और आगे की राह

प्रस्तावित मार्च के दौरान पुलिस की भूमिका पर सौरव ने स्वीकार किया कि पुलिस कानून-व्यवस्था के नाम पर प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिश कर सकती है। हालाँकि उन्होंने पुलिस से अपील की कि कार्यकर्ताओं को शांतिपूर्ण तरीके से मार्च निकालने दिया जाए। आने वाले दिनों में यह मार्च बिहार में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता के इर्द-गिर्द उभर रही व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इन्हें जिस तरह से एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन का रूप दिया जा रहा है, वह ध्यान देने योग्य है। 13 करोड़ नाम हटाने और उत्तर प्रदेश में 16 लाख अज्ञात नाम जोड़ने जैसे आँकड़े अगर सही हैं तो यह संसदीय लोकतंत्र की नींव पर गंभीर सवाल है — लेकिन इन दावों का स्वतंत्र सत्यापन अभी तक सामने नहीं आया है। सर्वोच्च न्यायालय का नोटिस इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका भी इसे मामूली नहीं मान रही। असली परीक्षा यह है कि क्या विरोध की यह ऊर्जा संस्थागत जवाबदेही में बदल पाती है, या महज़ राजनीतिक प्रतीकवाद बनकर रह जाती है।
RashtraPress
12 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पटना में प्रस्तावित मार्च किस मुद्दे पर है?
यह मार्च मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग और दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर लगाए जा रहे कथित प्रतिबंधों के विरोध में है। एआईएसए और आरवाईए के कार्यकर्ता पटना के गांधी मैदान से राजभवन तक मार्च निकालेंगे।
संदीप सौरव कौन हैं और वे क्यों यह मार्च आयोजित कर रहे हैं?
संदीप सौरव सीपीआई (एमएल) के विधायक हैं, जो लंबे समय से चुनावी पारदर्शिता और लोकतांत्रिक अधिकारों के मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं। उनके अनुसार चुनाव आयोग की कार्यशैली और मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव ने निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं।
मतदाता सूची से 13 करोड़ नाम हटाने का दावा क्या है?
सौरव के अनुसार, करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं और उत्तर प्रदेश में 16 लाख अज्ञात नाम जोड़े गए हैं। ये दावे विपक्षी दलों की ओर से उठाए गए हैं और इनका स्वतंत्र सत्यापन अभी बाकी है।
सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली प्रदर्शन पर क्या रुख लिया है?
सौरव के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी विभागों और दिल्ली मेट्रो को नोटिस जारी कर सड़कें बंद करने और बैरिकेडिंग जैसे कदमों पर सवाल किए हैं। अदालत का यह कदम शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को लेकर व्यापक कानूनी बहस का हिस्सा है।
क्या यह मार्च कानूनी और शांतिपूर्ण होगा?
सौरव ने स्पष्ट किया है कि मार्च पूरी तरह शांतिपूर्ण रहेगा और उन्होंने पुलिस से अपील की है कि प्रदर्शनकारियों को बिना बाधा मार्च निकालने दिया जाए। हालाँकि उन्होंने यह भी माना कि पुलिस कानून-व्यवस्था के नाम पर कार्रवाई कर सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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