12 अक्टूबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

हरीश साल्वे का दावा: भारत के कुछ विरोध प्रदर्शनों में विदेशी फंडिंग और बाहरी दखल

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
हरीश साल्वे का दावा: भारत के कुछ विरोध प्रदर्शनों में विदेशी फंडिंग और बाहरी दखल

सारांश

पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने दावा किया है कि भारत के कुछ विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग और बाहरी ताकतें हैं। उन्होंने नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश की उथल पुथल से समानता बताई और सरकार से जाँच की माँग की।

मुख्य बातें

वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने 12 अक्टूबर 2026 को दावा किया कि भारत के कुछ विरोध प्रदर्शनों में विदेशी फंडिंग और बाहरी दखल है।
साल्वे ने नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश की राजनीतिक उथल पुथल को उसी पैटर्न का हिस्सा बताया।
पिछले छह से आठ महीनों में एक 'स्पष्ट पैटर्न' दिखने का दावा किया।
उन्होंने इन प्रदर्शनों को वास्तविक जन आंदोलन मानने से इनकार किया, और परीक्षा पेपर लीक प्रदर्शनों से इनकी तुलना की।
साल्वे ने सरकार से विदेशी फंडिंग की जाँच करने और उचित कार्रवाई करने की माँग की।

वरिष्ठ अधिवक्ता और भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने 12 अक्टूबर 2026 को दावा किया कि भारत में हाल के कुछ विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग और बाहरी हस्तक्षेप की भूमिका है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ बाहरी ताकतें देश की प्रशासनिक व्यवस्था को अस्थिर करने और भारत को आर्थिक तथा तकनीकी प्रगति से रोकने की कोशिश कर रही हैं।

साल्वे के मुख्य आरोप

एक साक्षात्कार में साल्वे ने कहा, "कुछ विदेशी देश, खासकर अमेरिका, भारत से खुश नहीं हैं। क्या इस बात में कोई संदेह है कि नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश में उथल पुथल के पीछे कौन था? शेख हसीना को किसने हटाया और वहां नया प्रधानमंत्री कौन लेकर आया? मेरी राय में इन घटनाओं के पीछे बाहरी ताकतें थीं।" उन्होंने इन तीनों पड़ोसी देशों के राजनीतिक बदलावों को एक व्यापक पैटर्न का हिस्सा बताया।

साल्वे ने भारत के संदर्भ में कहा कि यूट्यूबर्स समेत कुछ लोग विरोध प्रदर्शनों के नेता बनकर उभरे हैं, जो जर्मनी और अन्य देशों में रहते हैं। उनका सवाल था, "प्रदर्शन आयोजित करने के लिए धन की जरूरत होती है — वे यह पैसा कहाँ से ला रहे हैं?"

छह से आठ महीनों का पैटर्न

साल्वे के अनुसार, पिछले छह से आठ महीनों में एक स्पष्ट पैटर्न देखा गया है। उन्होंने कहा कि जब मोदी सरकार होर्मुज संकट से निपटने, आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और भारत की सैटेलाइट क्षमताओं को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित कर रही है, उसी दौरान ये समूह सरकार की प्रगति में बाधा डालने की कोशिश कर रहे हैं।

गौरतलब है कि यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में कई मुद्दों पर विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है। साल्वे ने स्पष्ट किया कि उनकी आपत्ति हर विरोध से नहीं, बल्कि उन आंदोलनों से है जिनकी फंडिंग के स्रोत संदिग्ध हैं।

जन आंदोलन बनाम संगठित प्रदर्शन

साल्वे ने वर्तमान विरोध प्रदर्शनों की तुलना परीक्षा पेपर लीक पर हुए छात्र प्रदर्शनों से की, जिन्हें उन्होंने 'असली जन आंदोलन' की श्रेणी में रखा क्योंकि उनके पीछे छात्रों की वास्तविक पीड़ा थी और आम जनता उनसे जुड़ सकती थी।

उन्होंने कहा, "मैं भारत में नहीं रहता और मैंने जो देखा है, उसके आधार पर मुझे बड़े पैमाने पर जनता का विद्रोह नहीं दिखता।" यह स्वीकृति उल्लेखनीय है — साल्वे ने खुद माना कि उनका नजरिया बाहर से बना है।

डिजिटल प्रचार पर चिंता

साल्वे ने कहा कि यूट्यूब वीडियो, रील्स और एक लाइन के संदेशों के ज़रिए भ्रामक दावे बार बार फैलाए जा रहे हैं। उन्होंने हाल ही में दिल्ली पुलिस की पीआर टीम का एक साक्षात्कार देखने का ज़िक्र किया, जिसमें ऐसे दावों का प्रभावी खंडन किया गया था।

उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि विदेशी फंडिंग के आरोपों की जाँच की जाए और उचित कार्रवाई हो। साथ ही उन्होंने भरोसा जताया कि ऐसी जाँच जल्द शुरू होगी और यह आंदोलन लंबे समय तक नहीं चलेगा।

सरकार की जिम्मेदारी और आगे की राह

साल्वे के अनुसार, सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह उन आंदोलनों से सख्ती से निपटे जिनका मकसद व्यवस्था को कमज़ोर करना हो। हालाँकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि जब तक विदेशी फंडिंग के ठोस साक्ष्य सामने नहीं आते, तब तक इन आरोपों को कथित तौर पर ही माना जाना चाहिए।

यह बयान ऐसे राजनीतिक माहौल में आया है जब भारत में नागरिक समाज और सरकार के बीच संवाद की प्रकृति पर बहस तेज़ हो रही है — और साल्वे जैसे प्रतिष्ठित विधिवेत्ता की राय इस बहस को और धार देगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

न कि जाँच एजेंसी का निष्कर्ष — और यह अंतर महत्वपूर्ण है। विदेशी फंडिंग के आरोप नए नहीं हैं, लेकिन अभी तक किसी स्वतंत्र जाँच में इन्हें व्यापक रूप से साबित नहीं किया गया है। साल्वे स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे भारत में नहीं रहते, जो उनके 'पैटर्न' की पहचान को बाहरी नज़रिए तक सीमित करता है। असली सवाल यह है कि क्या सरकार पारदर्शी जाँच के ज़रिए इन दावों को प्रमाणित करेगी, या यह बहस केवल राजनीतिक विमर्श का औज़ार बनकर रह जाएगी।
RashtraPress
12 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हरीश साल्वे ने भारत में विदेशी फंडिंग को लेकर क्या कहा?
हरीश साल्वे ने दावा किया कि भारत के कुछ विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग और बाहरी हस्तक्षेप है। उन्होंने कहा कि पिछले छह से आठ महीनों में एक स्पष्ट पैटर्न उभरा है जिसमें बाहरी ताकतें भारत की प्रगति को बाधित करने की कोशिश कर रही हैं।
साल्वे ने किन देशों का उल्लेख किया?
साल्वे ने नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश की राजनीतिक उथल पुथल का उल्लेख करते हुए इसे उसी बाहरी हस्तक्षेप का हिस्सा बताया। उन्होंने अमेरिका का नाम लेते हुए कहा कि कुछ विदेशी देश भारत से खुश नहीं हैं।
क्या साल्वे के इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि हुई है?
नहीं, ये साल्वे की व्यक्तिगत राय और दावे हैं, जिन्हें किसी जाँच एजेंसी या अदालत ने अभी तक प्रमाणित नहीं किया है। उन्होंने खुद कहा कि वे भारत में नहीं रहते और उनकी राय बाहर से देखे गए पैटर्न पर आधारित है।
साल्वे ने इन विरोध प्रदर्शनों को वास्तविक जन आंदोलन क्यों नहीं माना?
साल्वे के अनुसार उन्हें बड़े पैमाने पर जनता के विद्रोह का कोई सबूत नहीं दिखा। उन्होंने इन प्रदर्शनों की तुलना परीक्षा पेपर लीक पर हुए छात्र प्रदर्शनों से की, जिन्हें उन्होंने असली जन भावना पर आधारित बताया।
साल्वे ने सरकार से क्या माँग की?
साल्वे ने सरकार से विदेशी फंडिंग के आरोपों की जाँच कर उचित कार्रवाई करने का आग्रह किया। साथ ही उन्होंने कहा कि उन्हें भरोसा है कि जाँच जल्द शुरू होगी और यह आंदोलन लंबे समय तक नहीं चलेगा।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 सप्ताह पहले
  2. 2 महीने पहले
  3. 2 महीने पहले
  4. 2 महीने पहले
  5. 4 महीने पहले
  6. 4 महीने पहले
  7. 9 महीने पहले
  8. 11 महीने पहले