जयशंकर का यूरोप को करारा जवाब: रूसी तेल खरीद उचित, यूरोपीय हथियार भारत पर हुए इस्तेमाल
सारांश
मुख्य बातें
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 12 जून 2025 को हेलसिंकी में यूरोपीय आलोचनाओं को सीधे नकारते हुए रूस से तेल खरीदने के भारत के फैसले का पुरज़ोर बचाव किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह निर्णय कीमत और उपलब्धता के व्यावहारिक आधार पर लिया गया था, और साथ ही यूरोपीय देशों की हथियार निर्यात नीति पर तीखे सवाल खड़े किए।
हेलसिंकी में क्या हुआ
फिनलैंड की राजधानी हेलसिंकी में आयोजित 'कुलतारना वार्ता' में जयशंकर ने फिनलैंड की विदेश मंत्री एलिना वाल्टोनन और यूएई की सहायक विदेश मंत्री लाना नुसेबेह के साथ 'उभरती ताकतें और नया जियोपॉलिटिकल मुकाबला' विषयक पैनल चर्चा में भाग लिया। जब उनसे यूक्रेन-रूस युद्ध में भारत के रुख और रूसी तेल खरीद पर यूरोपीय चिंताओं के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बिना लाग-लपेट के जवाब दिया।
तेल खरीद पर जयशंकर का तर्क
जयशंकर ने कहा, 'मैं तेल उसकी कीमत और उपलब्धता के आधार पर खरीदता हूं। उस समय बाज़ार में सबसे ज़्यादा उपलब्ध तेल रूस का था, क्योंकि यूरोपीय देश मध्य पूर्व से तेल खरीद रहे थे, जो पहले हमारा पारंपरिक सप्लायर था। ऐसे हालात में हमें एक अलग दिशा में जाना पड़ा।' यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिमी देश लगातार भारत से रूसी ऊर्जा पर अपनी निर्भरता कम करने का आग्रह करते रहे हैं।
यूरोपीय हथियारों पर सीधा प्रहार
चर्चा का सबसे तीखा क्षण तब आया जब जयशंकर ने 'नैतिक अस्पष्टता' के सवाल पर यूरोप को आईना दिखाया। उन्होंने कहा, 'किसी भी यूरोपीय देश पर भारतीय हथियारों से हमला नहीं हुआ है। काश मैं यही बात यूरोपीय हथियारों के बारे में भी कह पाता, जो भारत के खिलाफ इस्तेमाल हुए हैं। इसलिए इस बात को भी ध्यान में रखिए।'
जब उनसे इस पर और विस्तार से पूछा गया, तो उन्होंने भारत की सुरक्षा चिंताओं को और स्पष्ट करते हुए कहा, 'यूरोपीय देश ऐसे हथियार बेचते हैं जिनका इस्तेमाल कई वर्षों से भारत पर हमले करने के लिए किया जाता रहा है। भारत ने कभी भी ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे यूरोप की सुरक्षा को खतरा पैदा हो। मुझे लगता है कि यह एक बिल्कुल जायज बात है।'
भारत का व्यापक रुख
गौरतलब है कि भारत लगातार रूस से तेल खरीदने के अपने फैसले को राष्ट्रीय हित, नागरिकों की भलाई और ऊर्जा सुरक्षा के नज़रिये से उचित ठहराता रहा है। नई दिल्ली का यह भी स्पष्ट रुख रहा है कि यूक्रेन संघर्ष का समाधान बातचीत और कूटनीति के ज़रिये निकाला जाना चाहिए, न कि किसी एक पक्ष को समर्थन देकर।
आगे क्या
जयशंकर की यह टिप्पणियाँ ऐसे समय में आई हैं जब भारत-यूरोप संबंधों में ऊर्जा और रक्षा नीति पर मतभेद उभरते रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह दो-टूक कूटनीतिक भाषा संकेत देती है कि नई दिल्ली पश्चिमी दबाव में अपनी स्वतंत्र विदेश नीति से पीछे हटने को तैयार नहीं है।