पट्टिनापक्कम सचिवालय विरोध: 10 तटीय गाँवों के मछुआरे आज काला झंडा मार्च निकालेंगे
सारांश
मुख्य बातें
चेन्नई के पट्टिनापक्कम क्षेत्र के 10 तटीय गाँवों के मछुआरे 5 अक्टूबर 2026 (रविवार) को तमिलनाडु सरकार के उस प्रस्तावित कदम के विरोध में काला झंडा मार्च निकालेंगे, जिसके तहत इस भूमि पर नई विधानसभा और सचिवालय परिसर बनाने की योजना है। माइलापुर क्षेत्र की समस्त मछुआरा ग्राम पंचायत परिषद द्वारा आयोजित यह प्रदर्शन मुल्लिकुप्पम-श्रीनिवासपुरम लूप रोड जंक्शन पर होगा, साथ ही समुद्र तट पर भी काले झंडे फहराए जाएंगे।
मुख्य माँगें और विरोध की पृष्ठभूमि
मछुआरा ग्राम पंचायत परिषद ने राज्य सरकार से जीओ (सरकारी आदेश) 564 को तत्काल वापस लेने की माँग की है। यह वही आदेश है जिसके अंतर्गत पट्टिनापक्कम में प्रस्तावित विधानसभा और सचिवालय परिसर निर्माण की योजना बनाई गई है। मछुआरों का स्पष्ट कहना है कि यह भूमि पारंपरिक मछुआरा समुदाय के कल्याण, पुनर्वास और आवास की ज़रूरतों के लिए ही आरक्षित रहनी चाहिए।
गौरतलब है कि 29 सितंबर 2026 को भी इस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन हो चुका है, जिसमें मछुआरों ने सरकार से आदेश वापस लेने और तटीय ज़मीन को समुदाय के लिए सुनिश्चित रखने की माँग की थी। सरकार के रुख में कोई बदलाव न आने के कारण परिषद ने अपना अभियान तेज़ करते हुए अब काला झंडा मार्च का निर्णय लिया है।
भूमि का ऐतिहासिक संदर्भ
परिषद के अनुसार, सर्वे नंबर 4592 और 4593 के अंतर्गत आने वाली यह भूमि मूलतः 10 अक्टूबर 1957 को जारी जीओ एमएस नंबर 3313 के ज़रिए अधिगृहीत की गई थी। उस समय इसका उद्देश्य विशेष रूप से इलाके के मछुआरों के पुनर्वास और दीर्घकालिक आवास की व्यवस्था करना था। परिषद का तर्क है कि इस भूमि को सरकारी प्रशासनिक परिसर के लिए उपयोग करना उस मूल उद्देश्य के विरुद्ध होगा, जिसके लिए इसे अधिग्रहीत किया गया था, और इससे मछुआरा समुदाय को पहले दिए गए आश्वासनों का भी उल्लंघन होगा।
जलवायु जोखिम और तटीय सुरक्षा का हवाला
मछुआरों ने निवासियों के विस्थापन का विरोध करते हुए राज्य के जलवायु जोखिम आकलन का भी उल्लेख किया है। उनका दावा है कि इन आकलनों के अनुसार 2050 और 2100 तक समुद्र जलस्तर वृद्धि के अनुमान के बावजूद मुल्लिकुप्पम का इलाका काफ़ी हद तक सुरक्षित रहेगा। इसी आधार पर समुदाय का तर्क है कि विस्थापन की कोई तात्कालिक आवश्यकता नहीं है।
कानूनी और नियामक माँगें
मछुआरा समुदाय ने सरकार से यह भी माँग की है कि 'तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना, 2019' (Coastal Regulation Zone Notification, 2019) के अंतर्गत इस क्षेत्र को आधिकारिक रूप से मछुआरों के रिहायशी ज़ोन के रूप में मान्यता दी जाए। विरोध करने वालों का कहना है कि मछुआरा समुदायों से परंपरागत रूप से जुड़ी तटीय भूमि को बड़े बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के लिए इस्तेमाल करने के बजाय, उनकी आजीविका और आवास की ज़रूरतों के लिए संरक्षित रखा जाना चाहिए।
आगे की राह
परिषद ने राज्य सरकार से अपील की है कि वह प्रस्तावित भूमि आवंटन पर पुनर्विचार करे और सचिवालय परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले स्थानीय निवासियों के साथ सार्थक संवाद करे। यदि सरकार की ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो आंदोलन के और तेज़ होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।