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पट्टिनापक्कम सचिवालय विरोध: 10 तटीय गाँवों के मछुआरे आज काला झंडा मार्च निकालेंगे

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पट्टिनापक्कम सचिवालय विरोध: 10 तटीय गाँवों के मछुआरे आज काला झंडा मार्च निकालेंगे

सारांश

चेन्नई के पट्टिनापक्कम तट पर दशकों पुरानी मछुआरा बस्ती बनाम तमिलनाडु का नया सचिवालय सपना — 10 गाँवों के मछुआरे रविवार को काला झंडा मार्च से अपना विरोध तेज़ करेंगे। 1957 में उनके पुनर्वास के लिए अधिगृहीत इसी भूमि पर अब सरकार जीओ 564 के तहत नया प्रशासनिक परिसर बनाना चाहती है।

मुख्य बातें

पट्टिनापक्कम के 10 तटीय गाँवों के मछुआरे 5 अक्टूबर 2026 (रविवार) को काला झंडा मार्च निकालेंगे।
विरोध का केंद्र तमिलनाडु सरकार का जीओ 564 है, जिसके तहत इस भूमि पर नई विधानसभा व सचिवालय परिसर बनाने की योजना है।
यह भूमि मूलतः 10 अक्टूबर 1957 के जीओ एमएस नंबर 3313 द्वारा मछुआरों के पुनर्वास और आवास के लिए अधिगृहीत की गई थी।
इससे पहले 29 सितंबर 2026 को भी विरोध प्रदर्शन हो चुका है; सरकार के रुख में कोई बदलाव नहीं आया।
मछुआरों ने 'तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना, 2019' के तहत इलाके को आधिकारिक मछुआरा रिहायशी ज़ोन घोषित करने की माँग की है।

चेन्नई के पट्टिनापक्कम क्षेत्र के 10 तटीय गाँवों के मछुआरे 5 अक्टूबर 2026 (रविवार) को तमिलनाडु सरकार के उस प्रस्तावित कदम के विरोध में काला झंडा मार्च निकालेंगे, जिसके तहत इस भूमि पर नई विधानसभा और सचिवालय परिसर बनाने की योजना है। माइलापुर क्षेत्र की समस्त मछुआरा ग्राम पंचायत परिषद द्वारा आयोजित यह प्रदर्शन मुल्लिकुप्पम-श्रीनिवासपुरम लूप रोड जंक्शन पर होगा, साथ ही समुद्र तट पर भी काले झंडे फहराए जाएंगे।

मुख्य माँगें और विरोध की पृष्ठभूमि

मछुआरा ग्राम पंचायत परिषद ने राज्य सरकार से जीओ (सरकारी आदेश) 564 को तत्काल वापस लेने की माँग की है। यह वही आदेश है जिसके अंतर्गत पट्टिनापक्कम में प्रस्तावित विधानसभा और सचिवालय परिसर निर्माण की योजना बनाई गई है। मछुआरों का स्पष्ट कहना है कि यह भूमि पारंपरिक मछुआरा समुदाय के कल्याण, पुनर्वास और आवास की ज़रूरतों के लिए ही आरक्षित रहनी चाहिए।

गौरतलब है कि 29 सितंबर 2026 को भी इस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन हो चुका है, जिसमें मछुआरों ने सरकार से आदेश वापस लेने और तटीय ज़मीन को समुदाय के लिए सुनिश्चित रखने की माँग की थी। सरकार के रुख में कोई बदलाव न आने के कारण परिषद ने अपना अभियान तेज़ करते हुए अब काला झंडा मार्च का निर्णय लिया है।

भूमि का ऐतिहासिक संदर्भ

परिषद के अनुसार, सर्वे नंबर 4592 और 4593 के अंतर्गत आने वाली यह भूमि मूलतः 10 अक्टूबर 1957 को जारी जीओ एमएस नंबर 3313 के ज़रिए अधिगृहीत की गई थी। उस समय इसका उद्देश्य विशेष रूप से इलाके के मछुआरों के पुनर्वास और दीर्घकालिक आवास की व्यवस्था करना था। परिषद का तर्क है कि इस भूमि को सरकारी प्रशासनिक परिसर के लिए उपयोग करना उस मूल उद्देश्य के विरुद्ध होगा, जिसके लिए इसे अधिग्रहीत किया गया था, और इससे मछुआरा समुदाय को पहले दिए गए आश्वासनों का भी उल्लंघन होगा।

जलवायु जोखिम और तटीय सुरक्षा का हवाला

मछुआरों ने निवासियों के विस्थापन का विरोध करते हुए राज्य के जलवायु जोखिम आकलन का भी उल्लेख किया है। उनका दावा है कि इन आकलनों के अनुसार 2050 और 2100 तक समुद्र जलस्तर वृद्धि के अनुमान के बावजूद मुल्लिकुप्पम का इलाका काफ़ी हद तक सुरक्षित रहेगा। इसी आधार पर समुदाय का तर्क है कि विस्थापन की कोई तात्कालिक आवश्यकता नहीं है।

कानूनी और नियामक माँगें

मछुआरा समुदाय ने सरकार से यह भी माँग की है कि 'तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना, 2019' (Coastal Regulation Zone Notification, 2019) के अंतर्गत इस क्षेत्र को आधिकारिक रूप से मछुआरों के रिहायशी ज़ोन के रूप में मान्यता दी जाए। विरोध करने वालों का कहना है कि मछुआरा समुदायों से परंपरागत रूप से जुड़ी तटीय भूमि को बड़े बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के लिए इस्तेमाल करने के बजाय, उनकी आजीविका और आवास की ज़रूरतों के लिए संरक्षित रखा जाना चाहिए।

आगे की राह

परिषद ने राज्य सरकार से अपील की है कि वह प्रस्तावित भूमि आवंटन पर पुनर्विचार करे और सचिवालय परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले स्थानीय निवासियों के साथ सार्थक संवाद करे। यदि सरकार की ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो आंदोलन के और तेज़ होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो मछुआरों के पुनर्वास के लिए ज़मीन देने का वादा करता था, अब उसी ज़मीन को सरकारी ऐशोआराम के लिए छीनने का आधार बनने की ओर है — यह विरोधाभास गहरा है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर 'विकास बनाम विरोध' का सरलीकृत ढाँचा देती है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या तमिलनाडु सरकार ने CRZ 2019 और जलवायु जोखिम आकलनों की अनदेखी की है। जब तक सरकार पारदर्शी संवाद और कानूनी दायित्वों की समीक्षा नहीं करती, यह आंदोलन और व्यापक रूप लेने की पूरी संभावना रखता है।
RashtraPress
4 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पट्टिनापक्कम सचिवालय कॉम्प्लेक्स विवाद क्या है?
तमिलनाडु सरकार ने जीओ 564 के तहत चेन्नई के पट्टिनापक्कम क्षेत्र की भूमि पर नई विधानसभा और सचिवालय परिसर बनाने की योजना बनाई है। यह भूमि 1957 में विशेष रूप से स्थानीय मछुआरों के पुनर्वास और आवास के लिए अधिगृहीत की गई थी, जिससे समुदाय में गहरा विरोध है।
मछुआरे जीओ 564 का विरोध क्यों कर रहे हैं?
मछुआरों का तर्क है कि सर्वे नंबर 4592 और 4593 की यह भूमि 10 अक्टूबर 1957 के जीओ एमएस नंबर 3313 द्वारा उनके पुनर्वास के लिए ली गई थी। इसे सरकारी प्रशासनिक परिसर के लिए उपयोग करना उस मूल उद्देश्य और पहले दिए गए आश्वासनों का उल्लंघन होगा।
काला झंडा मार्च कब और कहाँ होगा?
यह प्रदर्शन 5 अक्टूबर 2026 (रविवार) को मुल्लिकुप्पम-श्रीनिवासपुरम लूप रोड जंक्शन पर आयोजित किया जाएगा। इसके साथ ही समुद्र तट पर भी काले झंडे फहराए जाएंगे।
मछुआरों की मुख्य कानूनी माँगें क्या हैं?
मछुआरों ने सरकार से जीओ 564 वापस लेने, और 'तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना, 2019' के तहत इस क्षेत्र को आधिकारिक मछुआरा रिहायशी ज़ोन के रूप में मान्यता देने की माँग की है। इसके अलावा उन्होंने सचिवालय परियोजना पर निर्णय लेने से पहले निवासियों के साथ सार्थक संवाद की भी अपील की है।
क्या पहले भी इस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं?
हाँ, 29 सितंबर 2026 को भी मछुआरों ने विरोध प्रदर्शन किया था और जीओ 564 वापस लेने की माँग की थी। सरकार की ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया न मिलने पर परिषद ने काला झंडा मार्च के ज़रिए अपना आंदोलन तेज़ करने का निर्णय लिया है।
राष्ट्र प्रेस
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