हिंदी दिवस 2026: लेखिका अंकिता जैन बोलीं — 'हिंदी फोन सिस्टम की तरह हर दौर में खुद को अपग्रेड करती है'
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी दिवस के अवसर पर नई दिल्ली में लेखिका अंकिता जैन ने हिंदी भाषा के विकास, सोशल मीडिया के प्रभाव और भाषाई शुद्धता को लेकर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि हिंदी एक ऐसा जीवंत माध्यम है जो ब्रज, अवधी, मैथिली, राजस्थानी और भोजपुरी जैसी समृद्ध लोक-बोलियों की विरासत को समेटते हुए देश की बहुसंख्यक आबादी तक पहुँचती है। 15 सितंबर 2026 को दिए इस साक्षात्कार में अंकिता जैन ने जोर देकर कहा कि हिंदी कोई स्थिर इकाई नहीं, बल्कि एक जीवित और अनवरत विकसित होती भाषा है।
हिंदी की समग्रता और भाषाई विकास
अंकिता जैन के अनुसार, हिंदी हमेशा से एक समग्र भाषा रही है जिसने अन्य भाषाओं के शब्दों को सहज रूप से आत्मसात किया है। उन्होंने कहा, 'मुझे नहीं लगता कि आज से 30 वर्ष पुराने लेखकों ने उस समय के चलन वाले शब्दों का इस्तेमाल न किया हो।' उन्होंने मुंशी प्रेमचंद का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया कि साहित्य के महान हस्ताक्षरों ने भी 'ट्रेन' को 'लौह पथ गामिनी' नहीं लिखा — उन्होंने वही शब्द लिखा जो लोक-जीवन में प्रचलित था।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अंग्रेजी शब्द हिंदी में इसलिए बढ़े हैं क्योंकि वे स्थानीय बोलचाल में रच-बस गए हैं। 'कॉल' जैसे शब्दों का कोई व्यावहारिक हिंदी विकल्प नहीं है, इसलिए भाषा ने उन्हें स्वाभाविक रूप से अपना लिया।
शुद्ध हिंदी की ओर युवा पीढ़ी का झुकाव
अंकिता जैन ने एक दिलचस्प पहलू की ओर ध्यान दिलाया — अब के बच्चे अपनी कविता और कहानियों में उर्दू के बजाय शुद्ध हिंदी शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। उन्होंने बताया, 'शाम' की जगह 'संध्या' लिखा जा रहा है, जो शुद्ध हिंदी का शब्द है।' उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि केरल में लोग 'Sunlight' के लिए 'सूर्य प्रकाश' का प्रयोग करते हैं, जबकि हिंदी-भाषी क्षेत्रों में उर्दू शब्द अधिक प्रचलित रहे — यह एक महत्त्वपूर्ण भाषाई अंतर है।
सोशल मीडिया का हिंदी साहित्य पर असर
लेखिका ने माना कि सोशल मीडिया ने हिंदी को गहरे प्रभावित किया है। एक सकारात्मक पक्ष यह है कि इसने उन 'मठाधीशों' की जकड़ तोड़ी जो भाषा का मापदंड तय करते थे। उनके शब्दों में, 'सोशल मीडिया ने बहुत अच्छा लिखने वाले लेखकों को जन्म दिया।' परंतु उन्होंने चेताया कि सोशल मीडिया पर लोकप्रियता और साहित्यिक गुणवत्ता एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। उनके अनुसार, 'साहित्य वह होना चाहिए जो हमारे भीतर कुछ परिवर्तन ला रहा हो — जिसे पढ़कर हम अपने भीतर कुछ बदल सकें।'
गाली-गलौज और भाषा का पतन
हिंदी में 'गाली' के बढ़ते प्रचलन पर अंकिता जैन ने स्पष्ट रुख अपनाया। उन्होंने कहा, 'गाली के पक्ष में मैं कभी भी नहीं रही हूं — चाहे वह साहित्य में लिखी गई हो या सिनेमा में दिखाई गई हो।' उन्होंने बताया कि उनकी माँ के अनुसार पुराने जमाने में 'धिक्कार' जैसा शब्द भी गाली मानी जाती थी, लेकिन आज अश्लील भाषा आम बोलचाल का हिस्सा बन गई है। उनके अनुसार, 'नकारात्मक शब्द हमारे व्यक्तित्व को खराब करते हैं, और सिनेमा ने इस प्रभाव को और बढ़ाया है।'
हिंदी का वैश्विक और राष्ट्रीय दर्जा
वैश्विक स्तर पर हिंदी को मान्यता मिलने की बात स्वीकार करते हुए भी अंकिता जैन ने एक महत्त्वपूर्ण विरोधाभास उजागर किया — देश के भीतर ही कई राज्यों के लोग हिंदी को अपनाने को तैयार नहीं हैं। उनके अनुसार हिंदी मुख्यतः मध्य और उत्तर भारत की भाषा है, और दक्षिण तथा पश्चिम भारत के राज्यों की अपनी भाषाएँ हैं। यह तथ्य भाषाई एकता की सीमाओं को रेखांकित करता है।
अंत में लेखिका ने कहा कि हिंदी का 'नया जन्म' कोई नई घटना नहीं — यह प्रक्रिया तो सदियों से जारी है। फारसी हो, अंग्रेजी हो या कोई भी बाहरी प्रभाव — हिंदी ने हर बार खुद को समृद्ध किया है। उनके मशहूर शब्दों में: 'हिंदी, फोन या लैपटॉप के एक सिस्टम की तरह है — जो हमेशा अपग्रेड हो रही है।' यह टिप्पणी हिंदी दिवस की बहस को एक नया, समकालीन आयाम देती है।