15 सितंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

हिंदी दिवस 2026: लेखिका अंकिता जैन बोलीं — 'हिंदी फोन सिस्टम की तरह हर दौर में खुद को अपग्रेड करती है'

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
हिंदी दिवस 2026: लेखिका अंकिता जैन बोलीं — 'हिंदी फोन सिस्टम की तरह हर दौर में खुद को अपग्रेड करती है'

सारांश

हिंदी दिवस पर लेखिका अंकिता जैन का एक दमदार नजरिया — भाषा न मरती है, न रुकती है। वह हर युग में खुद को अपग्रेड करती है, ठीक उस फोन सिस्टम की तरह जो पुराना पड़ते ही नया अपडेट ले लेता है। सोशल मीडिया से लेकर गाली-गलौज तक — हिंदी के हर पहलू पर बेबाक राय।

मुख्य बातें

लेखिका अंकिता जैन ने हिंदी दिवस 2026 पर कहा कि हिंदी हमेशा से एक समग्र भाषा रही है जो अन्य भाषाओं के शब्दों को आत्मसात करती आई है।
उन्होंने मुंशी प्रेमचंद का उदाहरण देकर बताया कि बड़े लेखकों ने भी अपने दौर की बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया — 'ट्रेन' को कभी 'लौह पथ गामिनी' नहीं लिखा।
अंकिता जैन के अनुसार अब की पीढ़ी साहित्य में उर्दू के बजाय शुद्ध हिंदी शब्द — जैसे 'शाम' की जगह 'संध्या' — अपना रही है।
सोशल मीडिया ने भाषा के 'मठाधीशों' की पकड़ तोड़ी, नए लेखकों को मंच दिया, लेकिन साहित्यिक गुणवत्ता को नहीं बढ़ाया।
गाली-प्रयोग को लेखिका ने नकारात्मक माना और कहा कि सिनेमा ने इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया।
हिंदी को वैश्विक पहचान मिली है, लेकिन देश के दक्षिण और पश्चिम भारत के कई राज्य इसे अपनाने को तैयार नहीं — यह बड़ी चुनौती है।

हिंदी दिवस के अवसर पर नई दिल्ली में लेखिका अंकिता जैन ने हिंदी भाषा के विकास, सोशल मीडिया के प्रभाव और भाषाई शुद्धता को लेकर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि हिंदी एक ऐसा जीवंत माध्यम है जो ब्रज, अवधी, मैथिली, राजस्थानी और भोजपुरी जैसी समृद्ध लोक-बोलियों की विरासत को समेटते हुए देश की बहुसंख्यक आबादी तक पहुँचती है। 15 सितंबर 2026 को दिए इस साक्षात्कार में अंकिता जैन ने जोर देकर कहा कि हिंदी कोई स्थिर इकाई नहीं, बल्कि एक जीवित और अनवरत विकसित होती भाषा है।

हिंदी की समग्रता और भाषाई विकास

अंकिता जैन के अनुसार, हिंदी हमेशा से एक समग्र भाषा रही है जिसने अन्य भाषाओं के शब्दों को सहज रूप से आत्मसात किया है। उन्होंने कहा, 'मुझे नहीं लगता कि आज से 30 वर्ष पुराने लेखकों ने उस समय के चलन वाले शब्दों का इस्तेमाल न किया हो।' उन्होंने मुंशी प्रेमचंद का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया कि साहित्य के महान हस्ताक्षरों ने भी 'ट्रेन' को 'लौह पथ गामिनी' नहीं लिखा — उन्होंने वही शब्द लिखा जो लोक-जीवन में प्रचलित था।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अंग्रेजी शब्द हिंदी में इसलिए बढ़े हैं क्योंकि वे स्थानीय बोलचाल में रच-बस गए हैं। 'कॉल' जैसे शब्दों का कोई व्यावहारिक हिंदी विकल्प नहीं है, इसलिए भाषा ने उन्हें स्वाभाविक रूप से अपना लिया।

शुद्ध हिंदी की ओर युवा पीढ़ी का झुकाव

अंकिता जैन ने एक दिलचस्प पहलू की ओर ध्यान दिलाया — अब के बच्चे अपनी कविता और कहानियों में उर्दू के बजाय शुद्ध हिंदी शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। उन्होंने बताया, 'शाम' की जगह 'संध्या' लिखा जा रहा है, जो शुद्ध हिंदी का शब्द है।' उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि केरल में लोग 'Sunlight' के लिए 'सूर्य प्रकाश' का प्रयोग करते हैं, जबकि हिंदी-भाषी क्षेत्रों में उर्दू शब्द अधिक प्रचलित रहे — यह एक महत्त्वपूर्ण भाषाई अंतर है।

सोशल मीडिया का हिंदी साहित्य पर असर

लेखिका ने माना कि सोशल मीडिया ने हिंदी को गहरे प्रभावित किया है। एक सकारात्मक पक्ष यह है कि इसने उन 'मठाधीशों' की जकड़ तोड़ी जो भाषा का मापदंड तय करते थे। उनके शब्दों में, 'सोशल मीडिया ने बहुत अच्छा लिखने वाले लेखकों को जन्म दिया।' परंतु उन्होंने चेताया कि सोशल मीडिया पर लोकप्रियता और साहित्यिक गुणवत्ता एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। उनके अनुसार, 'साहित्य वह होना चाहिए जो हमारे भीतर कुछ परिवर्तन ला रहा हो — जिसे पढ़कर हम अपने भीतर कुछ बदल सकें।'

गाली-गलौज और भाषा का पतन

हिंदी में 'गाली' के बढ़ते प्रचलन पर अंकिता जैन ने स्पष्ट रुख अपनाया। उन्होंने कहा, 'गाली के पक्ष में मैं कभी भी नहीं रही हूं — चाहे वह साहित्य में लिखी गई हो या सिनेमा में दिखाई गई हो।' उन्होंने बताया कि उनकी माँ के अनुसार पुराने जमाने में 'धिक्कार' जैसा शब्द भी गाली मानी जाती थी, लेकिन आज अश्लील भाषा आम बोलचाल का हिस्सा बन गई है। उनके अनुसार, 'नकारात्मक शब्द हमारे व्यक्तित्व को खराब करते हैं, और सिनेमा ने इस प्रभाव को और बढ़ाया है।'

हिंदी का वैश्विक और राष्ट्रीय दर्जा

वैश्विक स्तर पर हिंदी को मान्यता मिलने की बात स्वीकार करते हुए भी अंकिता जैन ने एक महत्त्वपूर्ण विरोधाभास उजागर किया — देश के भीतर ही कई राज्यों के लोग हिंदी को अपनाने को तैयार नहीं हैं। उनके अनुसार हिंदी मुख्यतः मध्य और उत्तर भारत की भाषा है, और दक्षिण तथा पश्चिम भारत के राज्यों की अपनी भाषाएँ हैं। यह तथ्य भाषाई एकता की सीमाओं को रेखांकित करता है।

अंत में लेखिका ने कहा कि हिंदी का 'नया जन्म' कोई नई घटना नहीं — यह प्रक्रिया तो सदियों से जारी है। फारसी हो, अंग्रेजी हो या कोई भी बाहरी प्रभाव — हिंदी ने हर बार खुद को समृद्ध किया है। उनके मशहूर शब्दों में: 'हिंदी, फोन या लैपटॉप के एक सिस्टम की तरह है — जो हमेशा अपग्रेड हो रही है।' यह टिप्पणी हिंदी दिवस की बहस को एक नया, समकालीन आयाम देती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

एक ज़रूरी बहस खोलता है — कि भाषा की 'शुद्धता' की माँग अक्सर एलीट वर्ग की सुविधा होती है, आम जन की नहीं। मुंशी प्रेमचंद से लेकर आज तक, हिंदी ने वही शब्द लिए जो जीवन में थे — यही उसकी असली ताकत है। लेकिन सोशल मीडिया वाले 'लोकतंत्र' की जो तस्वीर जैन खींचती हैं, उसमें एक खतरा भी छिपा है: लोकप्रियता को गुणवत्ता मान लेने की भूल। हिंदी के वैश्विक विस्तार और घरेलू प्रतिरोध का विरोधाभास — जो देश में ही कई राज्यों को स्वीकार्य नहीं — वह असली नीतिगत प्रश्न है जिस पर हिंदी दिवस की बहस को केंद्रित होना चाहिए।
RashtraPress
15 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लेखिका अंकिता जैन ने हिंदी दिवस पर क्या कहा?
अंकिता जैन ने कहा कि हिंदी एक जीवंत और समग्र भाषा है जो हर युग में खुद को अपग्रेड करती है — ठीक फोन या लैपटॉप के सिस्टम की तरह। उन्होंने हिंदी के विकास, सोशल मीडिया के प्रभाव और गाली-प्रयोग पर बेबाक विचार रखे।
अंकिता जैन के अनुसार सोशल मीडिया ने हिंदी को कैसे प्रभावित किया है?
उनके अनुसार सोशल मीडिया ने भाषा के परंपरागत 'मठाधीशों' की पकड़ तोड़ी और नए लेखकों को मंच दिया — यह सकारात्मक पहलू है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर लोकप्रिय सामग्री साहित्यिक दृष्टि से हमेशा उत्कृष्ट नहीं होती।
हिंदी में अंग्रेजी शब्दों के बढ़ते प्रयोग पर लेखिका का क्या मत है?
अंकिता जैन ने कहा कि अंग्रेजी शब्द हिंदी में इसलिए बढ़े हैं क्योंकि वे स्थानीय बोलचाल का हिस्सा बन गए हैं। उन्होंने मुंशी प्रेमचंद का उदाहरण दिया कि बड़े लेखकों ने भी 'ट्रेन' को 'लौह पथ गामिनी' नहीं लिखा — भाषा को जनजीवन से जोड़ना ज़रूरी है।
क्या हिंदी को भारत में पर्याप्त पहचान मिली है?
अंकिता जैन के अनुसार वैश्विक स्तर पर हिंदी को कुछ हद तक पहचान मिली है, लेकिन देश के भीतर दक्षिण और पश्चिम भारत के कई राज्यों में लोग हिंदी को अपनाने को तैयार नहीं हैं। यह हिंदी के राष्ट्रीय प्रसार में सबसे बड़ी चुनौती है।
अंकिता जैन ने हिंदी साहित्य में गाली-प्रयोग पर क्या रुख अपनाया?
उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे साहित्य या सिनेमा में गाली-प्रयोग के पक्ष में कभी नहीं रही हैं। उनके अनुसार नकारात्मक शब्द व्यक्तित्व को खराब करते हैं और सिनेमा ने इस प्रवृत्ति को बढ़ाया है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 23 मिनट पहले
  2. 38 मिनट पहले
  3. 1 घंटा पहले
  4. 2 घंटे पहले
  5. 2 घंटे पहले
  6. 21 घंटे पहले
  7. 23 घंटे पहले
  8. कल