15 सितंबर 2026
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हिंदी में 'शुद्ध-अशुद्ध' नहीं, 'परिचित-अपरिचित' का फर्क है: लेखक अनंत विजय

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हिंदी में 'शुद्ध-अशुद्ध' नहीं, 'परिचित-अपरिचित' का फर्क है: लेखक अनंत विजय

सारांश

पत्रकार-लेखक अनंत विजय ने हिंदी की 'शुद्धता' की बहस को नया मोड़ दिया — उनके अनुसार असली सवाल शुद्ध-अशुद्ध का नहीं, परिचित-अपरिचित का है। रोमन लिपि के बढ़ते चलन और स्कूली शिक्षा में हिंदी की कमज़ोर उपस्थिति को उन्होंने भाषा के भविष्य के लिए सबसे गहरी चुनौती बताया।

मुख्य बातें

पत्रकार-लेखक अनंत विजय के अनुसार हिंदी में 'शुद्ध-अशुद्ध' का वर्गीकरण व्यावहारिक नहीं; सही भेद 'परिचित' और 'अपरिचित' शब्दों के बीच है।
हिंदी ने संस्कृत, फारसी, अरबी, उर्दू और अंग्रेजी समेत अनेक भाषाओं से शब्द ग्रहण किए — यही उसकी ऐतिहासिक ताकत है।
रोमन लिपि में हिंदी लिखने के बढ़ते डिजिटल चलन को उन्होंने देवनागरी की आदत के लिए दीर्घकालिक खतरा बताया।
टेलीविजन, सिनेमा और साहित्य — जैसे 'कौन बनेगा करोड़पति' और 'रामायण' — हिंदी के प्रसार में सोशल मीडिया से अधिक प्रभावशाली रहे हैं।
हिंदी के भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती स्कूली और उच्च शिक्षा में उसकी मज़बूत उपस्थिति सुनिश्चित करना है ताकि वह विज्ञान, तकनीक और रोज़गार की भाषा बन सके।

पत्रकार और लेखक अनंत विजय ने 15 सितंबर 2026 को हिंदी दिवस के अवसर पर भाषा के बदलते स्वरूप पर एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण साझा किया — उनके अनुसार हिंदी में 'शुद्ध' और 'अशुद्ध' जैसा कोई वर्गीकरण व्यावहारिक नहीं है; असली अंतर 'परिचित' और 'अपरिचित' शब्दों के बीच है। नई दिल्ली में दिए गए इस विचार-विमर्श में उन्होंने हिंदी को एक जीवंत, बहती हुई नदी की संज्ञा दी, जो सदियों से अनेक भाषाओं का जल ग्रहण करती आई है।

भाषा की यात्रा: संस्कृत से सोशल मीडिया तक

अनंत विजय के अनुसार हिंदी का पूरा विकास-क्रम दूसरी भाषाओं और बोलियों से शब्द ग्रहण करने की प्रक्रिया पर टिका है। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, फारसी, अरबी, उर्दू और देश की विविध बोलियों से लिए गए शब्दों ने हिंदी को समृद्ध किया है, कमज़ोर नहीं। उन्होंने याद दिलाया कि 'जंगल' और 'बंदोबस्त' जैसे शब्द अब अंग्रेजी के अभिन्न अंग हैं — तो यदि उधार लेना किसी भाषा को क्षीण करता, तो अंग्रेजी भी कब की कमज़ोर हो गई होती।

उनका तर्क है कि कोई शब्द केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वह किसी अन्य भाषा से आया है। यदि वह शब्द समाज में सहज रूप से प्रचलित है और उसका अर्थ लोगों को सुबोध है, तो वह भाषा का स्वाभाविक हिस्सा बन चुका है।

परिचित बनाम अपरिचित: शुद्धता का नया पैमाना

अनंत विजय इस बात पर जोर देते हैं कि संस्कृत से आए बहुत से शब्द आज के पाठक को कठिन लग सकते हैं, परंतु 'कठिन' या 'अपरिचित' होना 'अशुद्ध' होने का प्रमाण नहीं है। किसी शब्द का उपयोग घट जाना उसे गलत नहीं बनाता — हो सकता है वह पाठक की रोज़मर्रा की भाषा से बाहर हो गया हो।

इसीलिए वे 'शुद्ध हिंदी' की जगह 'परिचित हिंदी' और 'अपरिचित हिंदी' का भेद अधिक व्यावहारिक मानते हैं। साहित्यकारों की भूमिका इसी अपरिचित शब्द-भंडार को फिर से पाठकों की दृष्टि में लाने की है — जैसा प्रेमचंद, निराला, अज्ञेय और दिनकर ने किया।

तकनीकी युग में नए शब्दों का स्वागत

आज 'कंप्यूटर', 'इंटरनेट', 'मोबाइल' और 'माउस' जैसे शब्द हिंदी की रोज़मर्रा की भाषा में रच-बस गए हैं। अनंत विजय का मत है कि इनके लिए जबरन ऐसे नवीन शब्द गढ़ना जिन्हें आम जन समझ ही न पाएँ, भाषा को सहज बनाने के बजाय उसे दुरूह बना देता है।

उनके अनुसार दुनिया बदल रही है और नई तकनीक के साथ नए शब्द आएंगे ही। भाषा का मूल प्रयोजन विचार और जानकारी को लोगों तक पहुँचाना है — इसलिए शब्द-स्वीकृति का मापदंड 'शुद्धता' नहीं, 'सामाजिक स्वीकार्यता' होनी चाहिए।

रोमन लिपि और सोशल मीडिया की चुनौती

विजय ने स्पष्ट किया कि हिंदी की पहचान देवनागरी लिपि से अटूट रूप से जुड़ी है। सोशल मीडिया, चैट और डिजिटल मंचों पर रोमन अक्षरों में हिंदी लिखने का बढ़ता चलन बातचीत को भले सुविधाजनक बनाए, लेकिन लंबे समय में देवनागरी पढ़ने-लिखने की आदत पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। फिल्मी पटकथाओं, टेलीप्रॉम्प्टर और कुछ डिजिटल माध्यमों में रोमन हिंदी के बढ़ते प्रचलन पर वे देवनागरी के पक्षधरों से गंभीर विमर्श की माँग करते हैं।

सोशल मीडिया पर भाषा को लेकर उनका नजरिया संतुलित है — एक ओर हिंदी को बिगाड़कर लिखने वाले हैं, तो दूसरी ओर ऐसे सजग उपयोगकर्ता भी हैं जो हिंदी को बेहतरीन तरीके से प्रस्तुत करते हैं। इसलिए सोशल मीडिया की प्रवृत्तियाँ भाषा का अंतिम पैमाना नहीं हो सकतीं।

हिंदी का भविष्य: शिक्षा और रोज़गार की भाषा बनना ज़रूरी

अनंत विजय ने टेलीविजन, सिनेमा, साहित्य और जनसंचार माध्यमों को भाषा के स्वरूप को आकार देने में निर्णायक भूमिका निभाने वाला बताया। 'कौन बनेगा करोड़पति', 'महाभारत' और 'रामायण' जैसे कार्यक्रमों ने हिंदी के शब्दों और मुहावरों को करोड़ों घरों तक पहुँचाया। अमिताभ बच्चन की भाषा-शैली को उन्होंने हिंदी के प्रति दर्शकों के आकर्षण का एक सशक्त उदाहरण माना।

उनके अनुसार हिंदी के भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती स्कूली और उच्च शिक्षा में भारतीय भाषाओं की पर्याप्त उपस्थिति सुनिश्चित करना है। जब तक हिंदी केवल भावनाओं, साहित्य और मनोरंजन की भाषा बनी रहेगी और विज्ञान, तकनीक, शोध तथा रोज़गार के क्षेत्र में उसकी साख नहीं बनेगी, तब तक उसका समग्र विकास अधूरा रहेगा। यह टिप्पणी उस व्यापक बहस को नई दिशा देती है जो हिंदी दिवस पर हर वर्ष उठती है — पर जिसका उत्तर नीति और शिक्षा-व्यवस्था के स्तर पर दिया जाना बाकी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसकी एक सीमा भी है। स्वीकार्यता को ही एकमात्र पैमाना मान लेने पर यह जोखिम रहता है कि देवनागरी लिपि और विशिष्ट हिंदी शब्द-भंडार को 'अपरिचित' घोषित कर धीरे-धीरे हाशिये पर धकेला जाए। स्कूली शिक्षा में हिंदी की जो कमज़ोरी वे रेखांकित करते हैं, वह दशकों की नीतिगत उदासीनता का परिणाम है — और इसे केवल सांस्कृतिक आंदोलन से नहीं, पाठ्यक्रम और रोज़गार नीति में ठोस बदलाव से ही बदला जा सकता है।
RashtraPress
15 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अनंत विजय 'शुद्ध हिंदी' की बहस पर क्या कहते हैं?
अनंत विजय के अनुसार हिंदी में शुद्ध और अशुद्ध जैसा कोई स्थायी वर्गीकरण नहीं होता — असली अंतर 'परिचित' और 'अपरिचित' शब्दों के बीच है। यदि कोई शब्द समाज में सहज रूप से प्रचलित है और उसका अर्थ समझा जाता है, तो उसकी मूल भाषा कोई भी हो, वह हिंदी का वैध हिस्सा है।
हिंदी ने किन-किन भाषाओं से शब्द ग्रहण किए हैं?
अनंत विजय के अनुसार हिंदी ने संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, फारसी, अरबी, उर्दू, अंग्रेजी और देश की विभिन्न बोलियों से शब्द लिए हैं। यह प्रक्रिया भाषा के क्षरण का नहीं, बल्कि उसके विस्तार और जीवंतता का प्रमाण है।
रोमन लिपि में हिंदी लिखना भाषा के लिए खतरा क्यों है?
अनंत विजय का मानना है कि हिंदी की पहचान देवनागरी लिपि से जुड़ी है, और सोशल मीडिया तथा डिजिटल मंचों पर रोमन अक्षरों में हिंदी लिखने का बढ़ता चलन दीर्घकाल में देवनागरी पढ़ने-लिखने की आदत को कमज़ोर कर सकता है।
हिंदी के भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
अनंत विजय के अनुसार हिंदी के भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती स्कूली और उच्च शिक्षा में भारतीय भाषाओं की मजबूत उपस्थिति सुनिश्चित करना है। जब तक हिंदी विज्ञान, तकनीक, शोध और रोज़गार की भाषा नहीं बनेगी, तब तक वह केवल भावना और मनोरंजन की भाषा बनकर रह जाएगी।
टेलीविजन और सिनेमा का हिंदी पर क्या प्रभाव पड़ा है?
'कौन बनेगा करोड़पति', 'महाभारत' और 'रामायण' जैसे कार्यक्रमों ने हिंदी के शब्दों और मुहावरों को करोड़ों घरों तक पहुँचाया। अनंत विजय के अनुसार अमिताभ बच्चन की भाषा-शैली भी लंबे समय तक दर्शकों के लिए हिंदी के आकर्षण का प्रतीक रही है।
राष्ट्र प्रेस
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