हिंदी दिवस 2026: 'भाषा की ताकत शब्दकोश में नहीं, रोज़मर्रा की जीवंतता में है' — लेखक वसीम अकरम
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी दिवस (14 सितंबर) के अवसर पर लेखक वसीम अकरम ने हिंदी के बदलते स्वरूप, हिंग्लिश के बढ़ते प्रचलन और सोशल मीडिया पर भाषा के लोकतांत्रिकरण पर विस्तार से अपने विचार रखे। उनका मानना है कि भाषा की असली ताकत उसके शब्दकोश की विशालता में नहीं, बल्कि उसके शब्दों की लोगों की दैनंदिन ज़िंदगी में जीवंतता में निहित है।
हिंग्लिश: नई हिंदी का स्वाभाविक पड़ाव
अकरम के अनुसार, भाषा हमेशा समय के साथ चलती है और हिंग्लिश को हिंदी के बदलते स्वरूप का एक स्वाभाविक पड़ाव माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब भी हिंदी रचनाशीलता में कोई नया प्रयोग होता है और वह लोगों को आकर्षित करता है, तो उसे 'हिंदी का नया दौर' कहा जाने लगता है। उनके शब्दों में — 'नई हिंदी वही होगी जो आधुनिक भी हो, सहज भी हो और अपनी पहचान पर गर्व भी करे।'
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि नई पीढ़ी की भाषा को खारिज करने के बजाय उसमें हिंदी की मिठास और अपनी जड़ों से जुड़ाव बनाए रखना आवश्यक है।
हिंदी शब्द ट्रेंड में क्यों नहीं आते
अकरम के अनुसार, हिंदी में शब्दों की कोई कमी नहीं है — कमी है उन्हें नए संदर्भों, नए माध्यमों और नई पीढ़ी की बातचीत तक सहजता से पहुँचाने की। उन्होंने कहा कि अंग्रेज़ी के शब्द बोलचाल में आसानी से जुबान पर उतर जाते हैं, इसलिए 'जेन-ज़ी' जैसे शब्दों का प्रचलन बढ़ता है। 'भाषा की ताकत उसके शब्दकोश में नहीं, बल्कि इस बात में है कि उसके शब्द लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कितने जीवंत हैं' — यह उनका केंद्रीय तर्क रहा।
उन्होंने सुझाया कि यदि हिंदी शब्दों को सोशल मीडिया, सिनेमा, संगीत और तकनीक से रोचक तरीके से जोड़ा जाए, तो वे भी ट्रेंड बना सकते हैं।
अंग्रेज़ी वर्चस्व बनाम हिंदी आत्मविश्वास
उच्च पदों, न्यायपालिका और तकनीकी क्षेत्रों में अंग्रेज़ी की प्रधानता के सवाल पर अकरम ने कहा कि अंग्रेज़ी सीखना जरूरी हो सकता है, लेकिन अपनी भाषा को कमतर समझना बिल्कुल जरूरी नहीं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी अत्याधुनिक तकनीक भी भारत में हिंदी के भरोसे काम कर रही है। उनका संदेश स्पष्ट था — 'भाषा ज्ञान की सीमा नहीं, ज्ञान तक पहुँचने का माध्यम है।'
हिंदी विरोध और बहुभाषिकता का प्रश्न
जब उनसे एक ओर विश्व नेताओं और यूट्यूबर्स द्वारा हिंदी शब्दों के बढ़ते इस्तेमाल और दूसरी ओर भारत के भीतर हिंदी-विरोध की विरोधाभासी स्थिति पर सवाल किया गया, तो अकरम ने कहा कि हिंदी का सम्मान बढ़ना निश्चित रूप से खुशी की बात है, किंतु किसी दूसरी भारतीय भाषा का अपमान करके हिंदी को मजबूत नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, 'भारत की खूबसूरती ही उसकी बहुभाषिकता है — हिंदी को प्रेम और संवाद की भाषा बनना चाहिए, दबाव या टकराव की नहीं।'
सोशल मीडिया और 'शुद्ध हिंदी' की नई परिभाषा
अकरम का मानना है कि सोशल मीडिया ने हिंदी को किताबों और संस्थानों की सीमाओं से निकालकर करोड़ों लोगों की रोज़मर्रा की अभिव्यक्ति बना दिया है। आम जनता नए शब्द और मुहावरे गढ़ रही है, जिन्हें समय की कसौटी पर टिकने पर हिंदी अपना लेती है। 'शुद्ध हिंदी' की अवधारणा पर उनका दृष्टिकोण उदार था — उनके लिए शुद्ध हिंदी वह है 'जिसमें विचार स्पष्ट, अभिव्यक्ति सहज और भाव सच्चे हों।' उन्होंने याद दिलाया कि हिंदी ने संस्कृत, फारसी, अरबी, तुर्की, अंग्रेज़ी और अनेक भारतीय भाषाओं से शब्द ग्रहण कर खुद को समृद्ध किया है — यही उसकी उदारता और पहचान है।
गौरतलब है कि हिंदी दिवस प्रतिवर्ष 14 सितंबर को मनाया जाता है, जब 1949 में संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। अकरम के विचार ऐसे समय में आए हैं जब डिजिटल मंचों पर हिंदी कंटेंट की माँग तेज़ी से बढ़ रही है और भाषा-नीति को लेकर राष्ट्रीय बहस जारी है।