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हिंदी दिवस 2026: रील क्रांति ने हिंदी को नई पहचान दी, 'शुद्ध हिंदी' महज कल्पना — विजयश्री तनवीर

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हिंदी दिवस 2026: रील क्रांति ने हिंदी को नई पहचान दी, 'शुद्ध हिंदी' महज कल्पना — विजयश्री तनवीर

सारांश

हिंदी दिवस पर लेखिका विजयश्री तनवीर का दो-टूक कहना है — 'शुद्ध हिंदी' एक कल्पना है, रील संस्कृति ने भाषा को नई साँस दी है, और हिंदी का विरोध नहीं बल्कि उसे थोपने का विरोध होता है। भाषा जल की तरह है — बदलाव उसकी कमज़ोरी नहीं, ताकत है।

मुख्य बातें

लेखिका विजयश्री तनवीर ने हिंदी दिवस 2026 पर कहा कि 'शुद्ध हिंदी' आज के दौर में एक कल्पना मात्र है।
उनके अनुसार, सोशल मीडिया और रील क्रांति ने हिंदी को नया आयाम दिया है और युवाओं को भाषा से जोड़ा है।
90 के दशक की तुलना में आज की पीढ़ी हिंदी को लेकर हीनभावना से मुक्त है।
जेन-ज़ी और जेन-अल्फा हिंदी को हिंग्लिश की तरह अपना रहे हैं; स्कूलों में भी हिंदी अध्यापक हिंग्लिश में पढ़ा रहे हैं।
विजयश्री ने स्पष्ट किया कि भारत में हिंदी का विरोध नहीं, उसे जबरन थोपने का विरोध हुआ है; हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं, राजभाषा है।
उनके अनुसार, हिंदी ने हमेशा दूसरी भाषाओं से शब्द लिए हैं — यह उदारता है, हीनता नहीं।

हिंदी साहित्य की चर्चित युवा लेखिका और कहानीकार विजयश्री तनवीर ने हिंदी दिवस, 14 सितंबर 2026 के अवसर पर हिंदी की बदलती तस्वीर पर खुलकर अपने विचार रखे। उनके अनुसार, सोशल मीडिया और रील संस्कृति ने हिंदी को एक नया और व्यापक आयाम दिया है, जबकि 'शुद्ध हिंदी' की अवधारणा आज के व्यावहारिक जीवन में अप्रासंगिक हो चुकी है। नई दिल्ली में हुई इस बातचीत में उन्होंने हिंदी के लोकतांत्रिककरण, हिंग्लिश के उभार और भाषाई विविधता पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए।

नई पीढ़ी और हिंदी का बदलता रिश्ता

विजयश्री तनवीर ने कहा, '90 के दशक में हिंदी पढ़ते-लिखते समय हीनता महसूस होती थी, लेकिन आज के बच्चों में यह भावना नहीं है।' उनका मानना है कि आज की युवा पीढ़ी हिंदी में लिख और पढ़ रही है, और यह बदलाव उन लेखकों की वजह से संभव हुआ जिन्होंने नए तरीके से हिंदी को प्रस्तुत किया — भले ही उन पर भाषा का स्वरूप बिगाड़ने के आरोप लगे हों।

उन्होंने यह भी कहा कि दशकों तक बच्चों को परिवार और स्कूल में अंग्रेजी की ओर धकेला गया, जिससे हिंदी को नुकसान पहुँचा। लेकिन सोशल मीडिया के विस्तार ने इस प्रवृत्ति को आंशिक रूप से पलटा है।

जेन-ज़ी और हिंग्लिश का उभार

जेन-ज़ी और जेन-अल्फा पीढ़ियों पर विजयश्री ने कहा कि हिंदी की वर्णमाला — जिसमें मात्राएँ, अर्धाक्षर और अनुस्वार शामिल हैं — अंग्रेजी की तुलना में जटिल है, इसलिए युवाओं ने सरलता के लिए हिंग्लिश को अपनाया। उन्होंने रेखांकित किया, 'हिंदी अध्यापक भी हिंग्लिश में पढ़ा रहे हैं, ऐसे में स्कूलों में हिंदी को कमतर आँका जा रहा है।'

उनके अनुसार, माता-पिता भी घर में बच्चों को अंग्रेजी में संवाद करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जिससे हिंग्लिश का चलन और तेज़ हुआ है।

रील क्रांति और सोशल मीडिया की भूमिका

विजयश्री तनवीर ने कहा, 'सोशल मीडिया और रील क्रांति ने हिंदी को नया आयाम दिया है।' हिंदी गानों पर रील बनाने का बढ़ता क्रेज और नेताओं का जनता को हिंदी में संबोधित करना — ये दोनों प्रवृत्तियाँ हिंदी के प्रसार में सहायक हैं। उन्होंने इसे एक सकारात्मक शुरुआत करार दिया।

यह ऐसे समय में आया है जब डिजिटल मंचों पर हिंदी कंटेंट की माँग लगातार बढ़ रही है और यूट्यूब, इंस्टाग्राम तथा अन्य प्लेटफॉर्म पर हिंदी निर्माता करोड़ों दर्शकों तक पहुँच रहे हैं।

हिंदी का विरोध नहीं, थोपने का विरोध

हिंदी के विरोध के प्रश्न पर विजयश्री ने स्पष्ट किया, 'भारत में हिंदी का कभी विरोध नहीं हुआ — हिंदी को जबरन थोपने पर विरोध हुआ।' उन्होंने याद दिलाया कि भारत एक बहुभाषी देश है जहाँ संविधान ने 22 से अधिक भाषाओं को मान्यता दी है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है — अंग्रेजी और हिंदी दोनों राजभाषाएँ हैं। उनके अनुसार, हिंदी को प्राथमिकता देकर अन्य प्राचीन भारतीय भाषाओं को गौण नहीं बनाना चाहिए।

'शुद्ध हिंदी' एक कल्पना, भाषा जल की तरह बहती है

लेखिका का सबसे चर्चित मत रहा उनका 'शुद्ध हिंदी' पर दृष्टिकोण। उन्होंने कहा, 'शुद्ध हिंदी एक कल्पना है — आज के दौर में शुद्ध हिंदी इतनी असंगत है कि इस भाषा में कभी बात नहीं कर सकते।' उनके अनुसार, हिंदी ने हमेशा दूसरी भाषाओं से शब्द लिए हैं और यह हीनता नहीं, उदारता है।

गौरतलब है कि भाषाविज्ञान में भी यह मान्यता है कि जीवित भाषाएँ निरंतर विकसित होती हैं। विजयश्री के शब्दों में, 'भाषा का स्वरूप जल की तरह है, जो हमेशा बदलती रहती है — समाज में जैसे-जैसे बदलाव होगा, भाषा भी वैसे-वैसे बदलेगी।' आने वाले वर्षों में हिंदी का यह विकास किस दिशा में जाएगा, यह काफी हद तक डिजिटल माध्यमों और नई पीढ़ी के लेखकों पर निर्भर करेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि हिंग्लिश की स्वीकृति कहीं हिंदी की व्याकरणिक नींव को कमज़ोर तो नहीं कर रही। रील संस्कृति ने भाषा की पहुँच बढ़ाई है, पर गहराई घटाई है या बढ़ाई — इसका उत्तर अभी बाकी है। हिंदी को थोपने बनाम अपनाने की यह बहस तब तक अधूरी रहेगी जब तक शिक्षा नीति में हिंदी को रोज़गार से नहीं जोड़ा जाएगा।
RashtraPress
15 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विजयश्री तनवीर के अनुसार 'शुद्ध हिंदी' क्यों एक कल्पना है?
विजयश्री तनवीर का कहना है कि आज के व्यावहारिक जीवन में शुद्ध हिंदी इतनी असंगत हो चुकी है कि इसमें बातचीत संभव नहीं। हिंदी ने हमेशा दूसरी भाषाओं से शब्द लिए हैं और भाषा का स्वरूप जल की तरह निरंतर बदलता रहता है — यह उसकी उदारता है, कमज़ोरी नहीं।
रील क्रांति ने हिंदी को कैसे नया आयाम दिया है?
लेखिका के अनुसार, सोशल मीडिया और रील संस्कृति ने हिंदी गानों और कंटेंट को करोड़ों युवाओं तक पहुँचाया है। नेताओं का हिंदी में जनता को संबोधित करना और हिंदी निर्माताओं का डिजिटल मंचों पर उभार — ये मिलकर हिंदी के प्रचार-प्रसार में सहायक बने हैं।
जेन-ज़ी और जेन-अल्फा हिंदी क्यों नहीं सीख पा रहे?
विजयश्री तनवीर के अनुसार, हिंदी की जटिल वर्णमाला — मात्राएँ, अर्धाक्षर, अनुस्वार — अंग्रेजी की तुलना में कठिन लगती है, इसलिए युवाओं ने हिंग्लिश को सरल विकल्प के रूप में चुना। घर और स्कूल में अंग्रेजी को मिलने वाली प्राथमिकता ने इस प्रवृत्ति को और मज़बूत किया।
क्या भारत में हिंदी का विरोध हुआ है?
विजयश्री तनवीर स्पष्ट करती हैं कि भारत में हिंदी का विरोध नहीं, बल्कि उसे जबरन थोपने का विरोध हुआ है। भारत बहुभाषी देश है और संविधान ने 22 से अधिक भाषाओं को मान्यता दी है; हिंदी और अंग्रेजी दोनों राजभाषाएँ हैं, राष्ट्रभाषा कोई नहीं।
90 के दशक और आज की पीढ़ी में हिंदी के प्रति नज़रिए में क्या फर्क है?
लेखिका के अनुसार, 90 के दशक में हिंदी पढ़ने-लिखने में हीनभावना होती थी और बच्चों को अंग्रेजी की ओर धकेला जाता था। आज की पीढ़ी में यह हीनभावना नहीं है — नए लेखकों ने हिंदी को आकर्षक बनाया और युवाओं को भाषा से दोबारा जोड़ा।
राष्ट्र प्रेस
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