सुप्रीम कोर्ट का NSE पूर्व CEO चित्रा रामकृष्ण को झटका, हाईकोर्ट के फैसले में दखल से इनकार
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 15 सितंबर 2026 को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) की पूर्व प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी चित्रा रामकृष्ण की याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। रामकृष्ण ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की कार्रवाई को चुनौती देते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) के तहत अपनी 'लोक सेवक' (Public Servant) की परिभाषा को विवादित किया था।
मामले की पृष्ठभूमि
चित्रा रामकृष्ण का मुख्य तर्क यह था कि NSE एक निजी संस्था है और वह किसी सरकारी या नियामक नियुक्ति के आधार पर उस पद पर नहीं थीं, इसलिए उन पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम लागू नहीं होना चाहिए। उनकी दलील थी कि भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत कार्यवाही पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं, किंतु PC Act के प्रावधान उन पर नहीं थोपे जा सकते।
गौरतलब है कि दिल्ली उच्च न्यायालय पहले ही रामकृष्ण की इस याचिका को खारिज कर चुका था। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि NSE लोकसेवा का कार्य निष्पादित करती है और रामकृष्ण, पूर्व MD एवं CEO होने के नाते, संस्था की ओर से किए गए कार्यों से खुद को अलग नहीं कर सकतीं।
सुनवाई में क्या हुआ
सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान रामकृष्ण के अधिवक्ता बलबीर सिंह ने दोहराया कि उनकी मुवक्किल पर PC Act लागू नहीं किया जा सकता। इस पर न्यायालय ने पूछा कि क्या उन्होंने ट्रायल कोर्ट में डिस्चार्ज एप्लीकेशन दाखिल की है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि ट्रायल कोर्ट यह निर्धारित करता है कि आरोपी 'लोक सेवक' नहीं हैं, तो इससे स्पेशल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र स्वतः समाप्त नहीं हो जाएगा।
सर्वोच्च न्यायालय का आदेश
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले में कोई विधिक त्रुटि नहीं पाई गई। न्यायालय ने कहा कि चित्रा रामकृष्ण NSE की MD और CEO थीं, और यह प्रश्न — कि क्या एक निजी/गैर-सरकारी संस्था की प्रमुख होने के नाते वह 'लोक कर्तव्य' निभा रही थीं — ट्रायल के दौरान उठाया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि इस मुद्दे का निपटारा ट्रायल कोर्ट अपने गुण-दोष के आधार पर स्वतंत्र रूप से करे।
NSE घोटाला: व्यापक संदर्भ
यह मामला NSE के कथित को-लोकेशन घोटाले और संस्थागत प्रशासन विफलताओं से जुड़ा है, जिसकी जाँच CBI एवं भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) दोनों कर रहे हैं। रामकृष्ण पर आरोप है कि उन्होंने एक अज्ञात 'हिमालयी योगी' से संस्थागत जानकारी साझा की और बिना उचित प्रक्रिया के पूर्व ग्रुप ऑपरेटिंग ऑफिसर आनंद सुब्रमणियन को नियुक्त किया। यह ऐसे समय में आया है जब भारत के वित्तीय बाजारों में पारदर्शिता और कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर सार्वजनिक बहस तेज हो रही है।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद अब मामला ट्रायल कोर्ट में आगे बढ़ेगा, जहाँ 'लोक सेवक' की परिभाषा पर अंतिम निर्णय होगा। विधि विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला भविष्य में निजी नियामक संस्थाओं के शीर्ष अधिकारियों की कानूनी जवाबदेही तय करने की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण नज़ीर बन सकता है।