29 जून 2026
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होर्मुज संकट में भी भारत में नहीं हुई ईंधन किल्लत, पूर्व राजनयिक नवदीप सूरी ने खोला सरकार की रणनीति का राज़

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होर्मुज संकट में भी भारत में नहीं हुई ईंधन किल्लत, पूर्व राजनयिक नवदीप सूरी ने खोला सरकार की रणनीति का राज़

सारांश

होर्मुज संकट में जब पाकिस्तान ने स्कूल बंद किए और चार दिन का कार्य सप्ताह लागू किया, भारत ने 90% आयात-निर्भरता के बावजूद ईंधन आपूर्ति बनाए रखी। पूर्व राजनयिक नवदीप सूरी के अनुसार, नियंत्रित मूल्य प्रणाली, सक्रिय कूटनीति और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत — यही तीन कारक भारत की असली ढाल बने।

मुख्य बातें

होर्मुज संकट के दौरान कच्चे तेल की कीमत $70 से बढ़कर $126 प्रति बैरल तक पहुँची, फिर भी भारत में आपातकालीन ईंधन प्रतिबंध नहीं लगाए गए।
सरकार ने बढ़ी हुई लागत का बड़ा हिस्सा स्वयं वहन किया और तेल कंपनियों ने भी मुनाफे में कटौती की।
भारत अपनी करीब 90 प्रतिशत जीवाश्म ईंधन जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, जिसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है।
पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी की कतर यात्रा और प्रधानमंत्री की UAE यात्रा ने द्विपक्षीय ऊर्जा संबंधों को मजबूती दी।
भारत ने UAE , अमेरिका , अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से वैकल्पिक आपूर्ति सुनिश्चित की।
एलपीजी रीफिल पर 25 दिन का अंतराल तय कर घरेलू माँग को प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया गया।

होर्मुज जलडमरूमध्य संकट के दौरान जब दुनिया के कई देशों में ईंधन की भारी कमी, लंबी कतारें और आपातकालीन पाबंदियाँ देखने को मिलीं, तब भारत में पेट्रोल-डीजल की आपूर्ति बिना किसी बड़े व्यवधान के बनी रही। पूर्व राजनयिक नवदीप सूरी ने 29 जून को अमृतसर में इस विषय पर विस्तार से बताया कि किस प्रकार सरकार की दूरदर्शिता और ऊर्जा कूटनीति ने भारतीय नागरिकों को इस वैश्विक संकट की सबसे बुरी मार से बचाया।

मूल्य नियंत्रण और सरकारी हस्तक्षेप

सूरी ने बताया कि भारत की नियंत्रित मूल्य प्रणाली इस संकट में एक बड़े रक्षा-कवच के रूप में काम आई। उन्होंने कहा, 'अलग-अलग देशों में ईंधन की कीमत तय करने के अलग-अलग तरीके होते हैं। कुछ देशों में कीमतें सीधे वैश्विक बाजार से जुड़ी होती हैं, जबकि भारत एक नियंत्रित मूल्य प्रणाली अपनाता है।' 28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद जब कच्चे तेल की कीमतें लगभग $70 प्रति बैरल से उछलकर $126 प्रति बैरल तक पहुँच गईं, तब सरकार ने बढ़ी हुई लागत का बड़ा हिस्सा स्वयं वहन किया। सरकारी तेल कंपनियों ने भी अपने मुनाफे में कटौती की और करों में राहत देकर पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें नियंत्रण में रखी गईं।

ऊर्जा कूटनीति की अहम भूमिका

सूरी ने सरकार की सक्रिय ऊर्जा कूटनीति को इस सफलता का केंद्रीय कारण बताया। उन्होंने कहा कि पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी स्वयं पूर्व राजनयिक हैं, इसलिए उनकी कूटनीतिक समझ और अनुभव ने बातचीत में बड़ा लाभ दिया। संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब और कतर के साथ भारत के दीर्घकालिक मजबूत संबंध भी इस दौरान काम आए। प्रधानमंत्री की UAE यात्रा और युद्धकाल में पेट्रोलियम मंत्री की कतर यात्रा ने द्विपक्षीय रिश्तों को और मजबूती का संकेत दिया।

वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की तलाश

भारत ने केवल खाड़ी देशों पर निर्भर न रहते हुए UAE, अमेरिका और अफ्रीकालैटिन अमेरिका के नए बाजारों से भी ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित की। सूरी ने बताया कि भारत अपनी करीब 90 प्रतिशत जीवाश्म ईंधन जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है और इसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है — बावजूद इसके, सरकार ने समय रहते वैकल्पिक व्यवस्था कर ली थी। यह ऐसे समय में आया जब होर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए सबसे खतरनाक परिदृश्यों में से एक माना जाता है।

पड़ोसी देशों से तुलना

सूरी ने पाकिस्तान का उदाहरण देते हुए भारत की स्थिति को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि पाकिस्तान में स्कूल बंद करने पड़े, चार दिन का कार्य सप्ताह लागू करना पड़ा और गंभीर ईंधन संकट उत्पन्न हुआ। इसके विपरीत, भारत में स्थिति काफी सामान्य रही। अमृतसर में केवल एक दिन अफवाहों के कारण पेट्रोल पंपों पर भीड़ देखी गई और एलपीजी की कमी मात्र दो-तीन दिन ही रही।

घरेलू माँग प्रबंधन

सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं के लिए एलपीजी सिलेंडर की रीफिल पर 25 दिन का अंतराल निर्धारित किया, जो अधिकांश परिवारों की ज़रूरतों के अनुरूप था। सूरी के अनुसार, देश के भीतर माँग को प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया गया, जिससे आपूर्ति श्रृंखला पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ा। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब भारत ने किसी वैश्विक ऊर्जा उथल-पुथल में अपेक्षाकृत स्थिर रहने में सफलता पाई हो, लेकिन होर्मुज जैसे बड़े संकट में यह प्रदर्शन नीति-निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा थी।

आने वाले समय में भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति और खाड़ी देशों के साथ कूटनीतिक संबंध इसी तरह केंद्रीय भूमिका निभाते रहेंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन एक बड़ा सवाल अनुत्तरित रहता है — इस 'बोझ वहन' की दीर्घकालिक वित्तीय कीमत क्या है? तेल कंपनियों के घाटे और राजकोषीय दबाव का आकलन सार्वजनिक नहीं किया गया है। $126 प्रति बैरल पर सब्सिडी का बोझ उठाना अल्पकाल में राहत देता है, लेकिन यह वही नीति है जो 2012-14 में तेल कंपनियों को 'अंडर-रिकवरी' के दलदल में ले गई थी। ऊर्जा विविधीकरण की दिशा में कदम सराहनीय हैं, पर 90% आयात-निर्भरता की संरचनात्मक कमजोरी एक संकट में नहीं बदली — अगले संकट में यही परीक्षा फिर होगी।
RashtraPress
29 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

होर्मुज संकट के दौरान भारत में ईंधन की कमी क्यों नहीं हुई?
सरकार ने नियंत्रित मूल्य प्रणाली के तहत कच्चे तेल की बढ़ी कीमत का बड़ा हिस्सा स्वयं वहन किया और तेल कंपनियों ने भी मुनाफे में कटौती की। इसके साथ ही UAE, अमेरिका और अफ्रीका-लैटिन अमेरिका से वैकल्पिक आपूर्ति सुनिश्चित की गई।
होर्मुज संकट के दौरान कच्चे तेल की कीमत कितनी बढ़ी?
28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद कच्चे तेल की कीमत लगभग $70 प्रति बैरल से बढ़कर $126 प्रति बैरल तक पहुँच गई। इसके बावजूद भारत सरकार ने पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें नियंत्रण में रखीं।
भारत की ऊर्जा कूटनीति ने इस संकट में कैसे मदद की?
पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी की कतर यात्रा और प्रधानमंत्री की UAE यात्रा ने खाड़ी देशों के साथ आपूर्ति संबंध मजबूत किए। UAE, सऊदी अरब और कतर के साथ भारत के दीर्घकालिक संबंध इस दौरान विशेष रूप से उपयोगी साबित हुए।
भारत में एलपीजी की कमी कितने समय तक रही?
पूर्व राजनयिक नवदीप सूरी के अनुसार, एलपीजी की कमी केवल दो-तीन दिन रही और फिर स्थिति सामान्य हो गई। सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं के लिए एलपीजी सिलेंडर रीफिल पर 25 दिन का अंतराल निर्धारित कर माँग को प्रबंधित किया।
पाकिस्तान की तुलना में भारत की स्थिति कैसी रही?
पाकिस्तान में स्कूल बंद करने पड़े और चार दिन का कार्य सप्ताह लागू करना पड़ा, जबकि भारत में ऐसी कोई आपातकालीन पाबंदी नहीं लगानी पड़ी। अमृतसर में केवल एक दिन अफवाहों के कारण पेट्रोल पंपों पर भीड़ देखी गई।
राष्ट्र प्रेस
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