भारत में ईंधन मूल्य वृद्धि 4.4% — प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कम, अमेरिका में 45% तक उछाल
सारांश
मुख्य बातें
भारत में 15 मई 2026 को लागू पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ₹3.91 प्रति लीटर यानी 4.4 प्रतिशत की वृद्धि, तेल उत्पादक देशों को छोड़कर किसी भी प्रमुख अर्थव्यवस्था में दर्ज की गई सबसे कम बढ़ोतरी है। GlobalPetrolPrices.com द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, जहाँ दुनिया के अधिकांश देशों में ईंधन की खुदरा कीमतें 10 से 90 प्रतिशत तक बढ़ी हैं, वहीं भारत ने इस दबाव को काफी हद तक सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों पर वहन करते हुए उपभोक्ताओं को राहत दी।
76 दिन की कम वसूली के बाद उठाया गया कदम
इंडियन ऑयल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि 23 फरवरी 2026 से 15 मई 2026 तक — यानी 76 दिनों तक — सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतें लगभग अपरिवर्तित रखीं और रिफाइनरी गेट पर कच्चे तेल की बढ़ी हुई लागत स्वयं वहन की। इस दौरान इन कंपनियों को प्रतिदिन लगभग ₹1,000 करोड़ की कम वसूली हो रही थी।
अधिकारी के अनुसार, ₹3.91 प्रति लीटर की मौजूदा वृद्धि के बाद भी यह दैनिक नुकसान घटकर ₹750 करोड़ रह गया है — अर्थात खुदरा मूल्य वृद्धि से नुकसान में केवल 25 प्रतिशत की कमी आई है और कच्चे तेल की लागत की भरपाई आंशिक ही हुई है।
वैश्विक तुलना: भारत बनाम बाकी दुनिया
आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें 45 प्रतिशत और डीजल की कीमतें 48 प्रतिशत बढ़ी हैं। यूके में पेट्रोल 19 प्रतिशत और डीजल 34 प्रतिशत महंगा हुआ है। जर्मनी में पेट्रोल में 14 प्रतिशत और डीजल में 20 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि फ्रांस में क्रमशः 21 प्रतिशत और 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में स्थिति और भी विकट रही। पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमत तीन महीने पहले की तुलना में 55 प्रतिशत, मलेशिया में 56 प्रतिशत और संयुक्त अरब अमीरात में 52 प्रतिशत अधिक हो गई है। म्यांमार में भी पेट्रोल की कीमत युद्ध-पूर्व स्तर से आधे से अधिक बढ़ गई है। सिंगापुर में डीजल की कीमत 65 प्रतिशत उछली है, जो वैश्विक व्यापार और माल ढुलाई से डीजल के प्रत्यक्ष संबंध को दर्शाता है।
जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर की स्थिति
जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर में पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी 20 प्रतिशत से कम रही है, हालांकि डीजल की कीमतों में इन देशों में भी तेज उछाल देखा गया। यह प्रवृत्ति वैश्विक माल ढुलाई श्रृंखला पर डीजल की कीमतों के व्यापक प्रभाव को रेखांकित करती है।
आगे क्या
इंडियन ऑयल के अधिकारी ने संकेत दिया कि ₹750 करोड़ प्रतिदिन का नुकसान अभी भी जारी है और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों पर वित्तीय दबाव बना हुआ है। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें अस्थिर बनी हुई हैं और घरेलू मुद्रास्फीति पर नज़र रखना सरकार की प्राथमिकता है। आने वाले महीनों में यदि कच्चे तेल की कीमतें नहीं घटतीं, तो कंपनियों पर एक और मूल्य समीक्षा का दबाव बढ़ सकता है।