पेट्रोल-डीजल पर ₹3 की बढ़ोतरी नाकाफी, तेल कंपनियाँ रोज़ाना ₹1,000 करोड़ का घाटा झेल रहीं: वरिष्ठ अधिकारी

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पेट्रोल-डीजल पर ₹3 की बढ़ोतरी नाकाफी, तेल कंपनियाँ रोज़ाना ₹1,000 करोड़ का घाटा झेल रहीं: वरिष्ठ अधिकारी

सारांश

पेट्रोल-डीजल पर ₹3 की बढ़ोतरी सुर्खियाँ बटोर रही है, लेकिन असली तस्वीर यह है कि सरकारी तेल कंपनियाँ रोज़ाना ₹1,000 करोड़ का नुकसान उठा रही हैं। पेट्रोल पर ₹26 और डीजल पर ₹82 प्रति लीटर की अंडर-रिकवरी के बीच यह बढ़ोतरी महज़ राहत की एक बूँद है।

मुख्य बातें

सरकारी तेल कंपनियाँ इंडियन ऑयल , बीपीसीएल और एचपीसीएल मिलकर रोज़ाना करीब ₹1,000 करोड़ का नुकसान उठा रही हैं।
15 मई 2026 को पेट्रोल-डीजल पर ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई, जबकि अंडर-रिकवरी पेट्रोल पर ₹26 और डीजल पर ₹82 प्रति लीटर है।
वैश्विक कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार; अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर खतरा प्रमुख कारण।
भारत का सालाना कच्चे तेल का आयात बिल ₹12–15 लाख करोड़ ; हर 10 डॉलर की वृद्धि से 13–14 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ।
सरकार पहले से ही ₹2.25 लाख करोड़ की उर्वरक सब्सिडी का बोझ उठा रही है।
देश के पास 60 दिनों का कच्चे तेल का भंडार; रिफाइनरियाँ पूरी क्षमता पर चालू।

सरकारी तेल कंपनियाँ — इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल — इस समय प्रतिदिन करीब ₹1,000 करोड़ का संयुक्त नुकसान उठा रही हैं, जबकि 15 मई 2026 को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में की गई ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी इस विशाल अंडर-रिकवरी के सामने ऊँट के मुँह में जीरे के समान है। वैश्विक बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँच चुकी है, और एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।

अंडर-रिकवरी का पैमाना

सूत्रों के अनुसार, फिलहाल पेट्रोल पर प्रति लीटर लगभग ₹26 और डीजल पर करीब ₹82 का अंडर-रिकवरी नुकसान हो रहा है। अधिकारियों का कहना है कि ₹3 की बढ़ोतरी इस घाटे का केवल एक छोटा-सा हिस्सा ही पाट सकती है। यह बढ़ोतरी सरकार की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत भारतीय उपभोक्ताओं को वैश्विक तेल संकट की पूरी मार से बचाया जा रहा है।

गौरतलब है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव — विशेषकर अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर इसके संभावित असर — के कारण वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें तेज़ी से ऊपर गई हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य से सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत ऊर्जा निर्यात गुज़रते हैं। एक सूत्र ने कहा, 'इन भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर भारत का कोई नियंत्रण नहीं है।'

आयात बिल पर दोहरा दबाव

भारत का सालाना कच्चे तेल का आयात बिल करीब ₹12 से ₹15 लाख करोड़ है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से देश के आयात बिल पर लगभग 13 से 14 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। सूत्रों ने इसे तेल और सोने के आयात से होने वाला 'दोहरा बड़ा दबाव' बताया।

केंद्र सरकार कृषि क्षेत्र को भी वैश्विक कीमतों के झटकों से बचाने की कोशिश कर रही है — इसके लिए सरकार पहले से ही लगभग ₹2.25 लाख करोड़ की उर्वरक सब्सिडी का बोझ उठा रही है।

महंगाई और आम जनता पर असर

अधिकारियों ने चेताया कि ईंधन की कीमतों में अचानक तेज़ बढ़ोतरी से परिवहन लागत बढ़ेगी, खाद्य पदार्थ महंगे होंगे और घरेलू बजट पर सीधा असर पड़ेगा — जिससे अर्थव्यवस्था में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है। इसीलिए सरकार की मौजूदा नीति अचानक मूल्य वृद्धि के बजाय धीरे-धीरे ईंधन खपत घटाने और ऊर्जा दक्षता बढ़ाने पर केंद्रित है।

सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ईंधन की खपत कम करने और आयात पर निर्भरता घटाने पर ज़ोर दे रहे हैं।

आर्थिक स्थिति 2012-13 से बेहतर

अधिकारियों ने यह भी रेखांकित किया कि 2012-13 के संकट काल की तुलना में भारत की आर्थिक बुनियाद अब काफ़ी मज़बूत है। चालू खाता घाटा इस समय जीडीपी के 1.5 प्रतिशत से नीचे है, जबकि उस दौर में यह लगभग 5 प्रतिशत तक पहुँच गया था। वैश्विक अस्थिरता के बावजूद महंगाई भी फ़िलहाल नियंत्रण में बताई जा रही है।

आपूर्ति पर कोई संकट नहीं

इंडियन ऑयल के अधिकारियों के अनुसार, ईंधन की किसी भी तरह की कमी से बचने के लिए कंपनी की रिफाइनरियाँ फ़िलहाल पूरी क्षमता के साथ चौबीसों घंटे काम कर रही हैं। देश के पास 60 दिनों की ज़रूरत के बराबर कच्चे तेल का भंडार मौजूद है, जो रिफाइनरियों की आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त बताया जा रहा है। आगे की राह इस बात पर निर्भर करेगी कि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें किस दिशा में जाती हैं और भू-राजनीतिक तनाव कब तक बना रहता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

000 करोड़ का घाटा यदि जारी रहा, तो तेल कंपनियों की बैलेंस शीट कमज़ोर होगी, जो दीर्घकाल में ऊर्जा निवेश और रिफाइनरी विस्तार को प्रभावित कर सकती है। 2012-13 से तुलना आश्वस्त करने वाली है, लेकिन चालू खाता घाटा और उर्वरक सब्सिडी का संयुक्त दबाव राजकोषीय जोखिम को कम नहीं आँकने देता। सवाल यह है कि 'धीरे-धीरे कीमत सुधार' की नीति कब तक टिकेगी, और क्या इसका रोडमैप सार्वजनिक किया जाएगा।
RashtraPress
15 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पेट्रोल-डीजल पर ₹3 की बढ़ोतरी के बाद भी तेल कंपनियाँ घाटे में क्यों हैं?
क्योंकि वैश्विक कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँच चुकी है और पेट्रोल पर ₹26 तथा डीजल पर ₹82 प्रति लीटर की अंडर-रिकवरी है। ₹3 की बढ़ोतरी इस विशाल अंतर का केवल एक छोटा-सा हिस्सा ही पाटती है।
तेल कंपनियों को प्रतिदिन कितना नुकसान हो रहा है?
वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल मिलकर रोज़ाना करीब ₹1,000 करोड़ का संयुक्त घाटा उठा रही हैं। यह नुकसान खुदरा कीमतों और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार भाव के बीच के अंतर से उत्पन्न होता है।
कच्चे तेल की ऊँची कीमतों का भारत के आयात बिल पर क्या असर पड़ता है?
भारत का सालाना कच्चे तेल का आयात बिल करीब ₹12 से ₹15 लाख करोड़ है। कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की वृद्धि से देश के आयात बिल पर लगभग 13 से 14 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
क्या भारत में ईंधन की कमी का कोई खतरा है?
नहीं। इंडियन ऑयल के अधिकारियों के अनुसार देश के पास 60 दिनों की ज़रूरत के बराबर कच्चे तेल का भंडार है और रिफाइनरियाँ पूरी क्षमता के साथ चौबीसों घंटे चल रही हैं। फ़िलहाल ईंधन आपूर्ति में कोई व्यवधान नहीं है।
सरकार ईंधन की कीमतें पूरी तरह क्यों नहीं बढ़ा रही?
अधिकारियों के अनुसार, कीमतों में अचानक तेज़ बढ़ोतरी से परिवहन लागत और खाद्य पदार्थ महंगे होंगे, जिससे महंगाई का दबाव बढ़ेगा। सरकार का लक्ष्य उपभोक्ताओं को वैश्विक तेल संकट की पूरी मार से बचाना है और धीरे-धीरे ऊर्जा दक्षता बढ़ाने पर ज़ोर देना है।
राष्ट्र प्रेस
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