30 जुलाई 2026
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भारत-जर्मनी साझेदारी से एआई और ग्रीन हाइड्रोजन में खुलेंगे नए द्वार: आईजीसीसी इंडस्ट्री डायलॉग 2026

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भारत-जर्मनी साझेदारी से एआई और ग्रीन हाइड्रोजन में खुलेंगे नए द्वार: आईजीसीसी इंडस्ट्री डायलॉग 2026

सारांश

भारत-जर्मनी तकनीकी साझेदारी अब सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं — एआई, ग्रीन हाइड्रोजन और सेमीकंडक्टर में साझा अनुसंधान की ओर बड़ा कदम। आईजीसीसी इंडस्ट्री डायलॉग 2026 ने यह संकेत दिया कि दोनों देश मिलकर वैश्विक तकनीकी मानक तय करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

मुख्य बातें

आईजीसीसी ने 30 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में आईजीसीसी इंडस्ट्री डायलॉग 2026 के दूसरे संस्करण का आयोजन किया।
कार्यक्रम में एआई , ग्रीन हाइड्रोजन , सेमीकंडक्टर और आरएंडडी में भारत-जर्मनी सहयोग पर चर्चा हुई।
बेंगलुरु स्टार्टअप प्रतियोगिता में 90 स्टार्टअप्स ने भाग लिया; विजेताओं को सियोल एशिया-प्रशांत सम्मेलन में सीमेंस, बायर, बीएएसएफ के सीईओ के सामने प्रस्तुति का अवसर मिलेगा।
जर्मनी अपनी लगभग आधी बिजली नवीकरणीय स्रोतों से उत्पन्न करता है और ग्रीन हाइड्रोजन के लिए भारत को प्रमुख साझेदार मान रहा है।
एलएंडटी सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजीज के सीईओ डॉ.
संदीप कुमार ने भारत में आत्मनिर्भर सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को 'समय की सबसे बड़ी आवश्यकता' बताया।

इंडो-जर्मन चैंबर ऑफ कॉमर्स (आईजीसीसी) ने 30 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में आईजीसीसी इंडस्ट्री डायलॉग 2026 के दूसरे संस्करण का आयोजन किया, जिसमें भारत और जर्मनी के नीति-निर्माताओं, उद्योग प्रतिनिधियों और तकनीकी विशेषज्ञों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), ग्रीन हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर और अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) जैसे उभरते क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग की रूपरेखा तैयार की। यह मंच दोनों देशों के बीच औद्योगिक और तकनीकी संबंधों को नई दिशा देने का प्रयास है।

मुख्य घटनाक्रम

आईजीसीसी के महानिदेशक जान नोएथर ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि यह मंच भारत और जर्मनी के नीति-निर्माताओं, उद्योग जगत के नेताओं और विशेषज्ञों को एक साथ लाता है — जहाँ नए विचारों का आदान-प्रदान होता है, साझेदारियाँ मजबूत होती हैं और सहयोग के नए अवसर तलाशे जाते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष के संस्करण की सफलता को देखते हुए इसे वार्षिक आयोजन बनाने का निर्णय लिया गया है।

इस कार्यक्रम से ठीक दो दिन पहले बेंगलुरु में आयोजित एक स्टार्टअप प्रतियोगिता में करीब 90 स्टार्टअप्स ने भाग लिया। नोएथर के अनुसार प्रतियोगिता में कई नवोन्मेषी और उत्कृष्ट उत्पाद प्रदर्शित किए गए।

स्टार्टअप्स को वैश्विक मंच

जान नोएथर ने कहा, 'विजेताओं को सियोल में होने वाले अगले एशिया-प्रशांत सम्मेलन में आमंत्रित किया जाएगा, जहाँ वे सीमेंस, बायर, बीएएसएफ और अन्य प्रमुख जर्मन निगमों के सीईओ के सामने अपने उत्पाद और परियोजनाएँ प्रस्तुत करेंगे। इससे दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को और मजबूती मिलेगी।' यह पहल भारतीय स्टार्टअप्स को जर्मन उद्योग जगत के शीर्ष नेतृत्व तक सीधी पहुँच देने का एक महत्वपूर्ण अवसर है।

एआई और आरएंडडी: साझेदारी का केंद्र

नोएथर ने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब जर्मनी के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) इकोसिस्टम का प्रमुख फोकस बन चुका है। उनका मानना है कि यदि दोनों देशों के उद्योग और शोध संस्थान मिलकर नई तकनीकों पर काम करें, तो उनके परिणाम वैश्विक स्तर पर मिसाल बन सकते हैं। भारत-जर्मनी सहयोग विशेष रूप से अनुसंधान एवं विकास पर केंद्रित है, जो दीर्घकालिक तकनीकी स्वायत्तता की दिशा में एक सुदृढ़ कदम है।

ग्रीन हाइड्रोजन: भारत बनेगा जर्मनी का रणनीतिक भागीदार

नोएथर ने बताया कि जर्मनी वर्तमान में अपनी लगभग आधी बिजली नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से उत्पन्न करता है और अब ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र को और विस्तार देना चाहता है। इस दिशा में भारत एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में उभर रहा है, क्योंकि भारत प्रतिस्पर्धी लागत पर ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन की क्षमता रखता है। यही कारण है कि जर्मन कंपनियाँ भारत के साथ इस क्षेत्र में दीर्घकालिक सहयोग बढ़ाने की इच्छुक हैं।

सेमीकंडक्टर आत्मनिर्भरता पर जोर

एलएंडटी सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजीज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. संदीप कुमार ने 'एडवांसिंग आत्मनिर्भरता कॉन्फ्रेंस ऑन डिजाइन एंड मैन्युफैक्चरिंग' में कहा कि आज के दौर में सेमीकंडक्टर उद्योग वैश्विक अर्थव्यवस्था और तकनीकी विकास का सबसे महत्वपूर्ण आधार बन चुका है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत के लिए एक मजबूत और आत्मनिर्भर सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम विकसित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है — इससे देश न केवल तकनीकी रूप से सशक्त होगा, बल्कि वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन में भी अपनी निर्णायक भूमिका निभा सकेगा।

यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला पुनर्गठन के दौर से गुज़र रही है और भारत इस अवसर को भुनाने की स्थिति में है। आईजीसीसी इंडस्ट्री डायलॉग जैसे मंच इस दिशा में ठोस औद्योगिक संवाद की नींव रख रहे हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी यह है कि संवाद से ठोस निवेश और साझा अनुसंधान परियोजनाएँ कब तक ज़मीन पर उतरती हैं। ग्रीन हाइड्रोजन में भारत की 'प्रतिस्पर्धी लागत' की क्षमता तब तक कागज़ी रहेगी जब तक इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माण और नवीकरणीय ऊर्जा ग्रिड एकीकरण में ठोस प्रगति न हो। सेमीकंडक्टर आत्मनिर्भरता की बात नई नहीं है — लेकिन एलएंडटी जैसी कंपनियों की सक्रियता संकेत देती है कि उद्योग जगत अब केवल नीतिगत घोषणाओं का इंतज़ार नहीं कर रहा।
RashtraPress
30 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आईजीसीसी इंडस्ट्री डायलॉग 2026 क्या है?
यह इंडो-जर्मन चैंबर ऑफ कॉमर्स (आईजीसीसी) द्वारा आयोजित वार्षिक मंच है, जो भारत और जर्मनी के नीति-निर्माताओं, उद्योग नेताओं और विशेषज्ञों को एआई, ग्रीन हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर और आरएंडडी जैसे उभरते क्षेत्रों में सहयोग के लिए एक साथ लाता है। इसका दूसरा संस्करण 30 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में आयोजित हुआ।
भारत और जर्मनी ग्रीन हाइड्रोजन में कैसे सहयोग करेंगे?
जर्मनी अपनी ग्रीन हाइड्रोजन माँग को पूरा करने के लिए भारत को प्रमुख साझेदार मान रहा है, क्योंकि भारत प्रतिस्पर्धी लागत पर ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन की क्षमता रखता है। आईजीसीसी महानिदेशक जान नोएथर के अनुसार जर्मन कंपनियाँ इस क्षेत्र में दीर्घकालिक सहयोग के लिए उत्सुक हैं।
बेंगलुरु स्टार्टअप प्रतियोगिता के विजेताओं को क्या मिलेगा?
विजेता स्टार्टअप्स को सियोल में होने वाले अगले एशिया-प्रशांत सम्मेलन में आमंत्रित किया जाएगा, जहाँ वे सीमेंस, बायर और बीएएसएफ सहित प्रमुख जर्मन निगमों के सीईओ के सामने अपने उत्पाद और परियोजनाएँ प्रस्तुत कर सकेंगे।
भारत में सेमीकंडक्टर आत्मनिर्भरता क्यों ज़रूरी है?
एलएंडटी सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजीज के सीईओ डॉ. संदीप कुमार के अनुसार सेमीकंडक्टर उद्योग वैश्विक अर्थव्यवस्था और तकनीकी विकास का सबसे महत्वपूर्ण आधार बन चुका है। एक आत्मनिर्भर सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम भारत को तकनीकी रूप से सशक्त बनाएगा और वैश्विक सप्लाई चेन में उसकी भूमिका सुनिश्चित करेगा।
एआई के क्षेत्र में भारत-जर्मनी सहयोग किस पर केंद्रित है?
जान नोएथर के अनुसार एआई जर्मनी के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) इकोसिस्टम का प्रमुख फोकस बन चुका है और भारत-जर्मनी सहयोग विशेष रूप से अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) पर केंद्रित है। दोनों देशों के उद्योग और शोध संस्थान मिलकर ऐसी तकनीकें विकसित करना चाहते हैं जो वैश्विक स्तर पर मिसाल बन सकें।
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