नीति आयोग रिपोर्ट: वैश्विक फार्मा निर्यात में भारत की हिस्सेदारी मात्र 2.8%, बायोलॉजिक्स में विस्तार ज़रूरी
सारांश
मुख्य बातें
नीति आयोग ने 23 जून 2026 को जारी अपनी ताज़ा रिपोर्ट में कहा है कि भारत जेनेरिक दवाओं का दुनिया का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता होने के बावजूद वैश्विक फार्मास्युटिकल और एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) निर्यात में उसकी हिस्सेदारी केवल 2.8 प्रतिशत है। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि बायोलॉजिक्स, वैक्सीन और एडवांस्ड थेरेप्यूटिक्स जैसे उच्च-मूल्य वाले क्षेत्रों में भारत को अपनी उपस्थिति बढ़ानी होगी, तभी वह एक वास्तविक वैश्विक फार्मा और नवाचार केंद्र बन सकता है।
रिपोर्ट के प्रमुख आँकड़े
वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही की इस रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में वैश्विक फार्मास्युटिकल और API आयात की माँग लगभग 1.3 ट्रिलियन डॉलर आँकी गई है, जिसमें अकेले API की माँग 261.2 अरब डॉलर की है। भारत का फार्मास्युटिकल उद्योग अभी 35.8 अरब डॉलर के उत्पादों का निर्यात करता है और देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 1.7 प्रतिशत से अधिक का योगदान देता है।
विनिर्माण क्षेत्र के सकल मूल्य वर्धन (GVA) में इस उद्योग की हिस्सेदारी 7.2 प्रतिशत है। साथ ही यह क्षेत्र लगभग 27 लाख लोगों को रोज़गार और आजीविका प्रदान करता है।
भारत की ताकत और कमज़ोरी
रिपोर्ट के अनुसार, भारत की सबसे बड़ी ताकत फार्मूलेशन और जेनेरिक दवाओं के क्षेत्र में है। अमेरिका और यूरोप जैसे सख्त नियामकीय मानकों वाले बाज़ारों में भी भारत प्रतिस्पर्धी बना हुआ है। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं तेज़ी से पुनर्गठित हो रही हैं।
हालाँकि, वैश्विक फार्मा उद्योग अब बायोलॉजिक्स, इम्यूनोलॉजिकल्स और एडवांस्ड थेरेप्यूटिक्स की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है — और इन उच्च-मूल्य खंडों में भारत की निर्यात हिस्सेदारी अभी भी सीमित है। रिपोर्ट में यही वह अंतर बताया गया है जिसे पाटना सबसे ज़रूरी है।
नीति आयोग के उपाध्यक्ष का बयान
नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी ने कहा कि भारत का व्यापार क्षेत्र लगातार मज़बूती और अनुकूलन क्षमता का प्रदर्शन कर रहा है। उन्होंने कहा, "भारत दुनिया का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा आपूर्तिकर्ता है और वैक्सीन तथा आवश्यक उपचार दवाओं का प्रमुख प्रदाता भी है, जिससे वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा को मज़बूती मिलती है।"
लाहिड़ी ने आगे कहा कि बदलते माँग पैटर्न, कड़े नियामकीय मानक और विकसित होती वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं उद्योग के स्वरूप को बदल रही हैं। उन्होंने कहा कि उच्च-मूल्य वाले क्षेत्रों में विस्तार और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के विविधीकरण से मिलने वाले अवसरों का लाभ उठाकर भारत खुद को एक वैश्विक फार्मास्युटिकल और नवाचार केंद्र के रूप में और मज़बूत बना सकता है।
व्यापार का बड़ा परिदृश्य
गौरतलब है कि वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल वस्तु और सेवा व्यापार लगभग 1.84 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गया — जो वैश्विक बाज़ारों के साथ भारत के बढ़ते एकीकरण को दर्शाता है। लाहिड़ी के अनुसार, 'विकसित भारत' के दीर्घकालिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाना, घरेलू मूल्य संवर्धन को मज़बूत करना और वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में गहरी भागीदारी सुनिश्चित करना अनिवार्य होगा।
आगे की राह
रिपोर्ट स्पष्ट संकेत देती है कि भारत के पास वैश्विक फार्मा बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की पर्याप्त क्षमता है — बशर्ते नवाचार, नियामकीय अनुपालन और उच्च-मूल्य खंडों में निवेश को प्राथमिकता दी जाए। आने वाले वर्षों में भारत की फार्मा नीति की दिशा यह तय करेगी कि क्या यह संभावना वास्तविकता में बदल पाती है।