भारत के फार्मा पेटेंट में दशक भर में चार गुना उछाल, वैश्विक हिस्सेदारी 10% पर पहुँची
सारांश
मुख्य बातें
बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) और हेल्थकोइस की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, भारत में विकसित फार्मास्युटिकल पेटेंट फैमिली की संख्या 2015 में लगभग 716 से बढ़कर 2024 में 2,995 हो गई है — यानी एक दशक में चार गुना से अधिक की वृद्धि। साथ ही, देश की दवा खोज पाइपलाइन अब 195 कंपनियों में 1,095 से अधिक अणुओं तक विस्तृत हो चुकी है। 15 जुलाई को जारी यह रिपोर्ट दर्शाती है कि भारत जेनेरिक दवाओं के उत्पादन-आधारित मॉडल से तेज़ी से इनोवेशन-आधारित रिसर्च मॉडल की ओर कदम बढ़ा रहा है।
पेटेंट और निवेश में ऐतिहासिक उछाल
रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक फार्मा पेटेंट में भारत की हिस्सेदारी 3-4% से बढ़कर लगभग 10% हो गई है। यह वृद्धि केवल संख्यात्मक नहीं, बल्कि गुणवत्ता के स्तर पर भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। वित्त वर्ष 2026 में फार्मास्युटिकल क्षेत्र में प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल निवेश दोगुने से अधिक बढ़कर 73.1 करोड़ डॉलर तक पहुँच गया। इसी अवधि में देश में बायोटेक स्टार्टअप्स की संख्या लगभग 1,500 से बढ़कर 2,400 हो गई है।
तेज़ी के पीछे चार प्रमुख कारण
रिपोर्ट ने इस उल्लेखनीय वृद्धि के पीछे चार मुख्य कारण रेखांकित किए हैं। पहला, शुरुआती और ट्रांसलेशनल रिसर्च के लिए सरकार की ओर से लगभग 5 अरब डॉलर की फंडिंग। दूसरा, शिक्षा संस्थानों और उद्योग के बीच मज़बूत सहयोग। तीसरा, नियामकीय सुधारों के कारण दवा विकास की समयसीमा 180-270 दिनों से घटकर 60-120 दिन रह जाना। चौथा, जीनोम वैली और सी-कैंप जैसी साझा अनुसंधान एवं विनिर्माण अवसंरचना का विकास।
स्वदेशी सफलताएँ — CRISPR से CAR-T तक
रिपोर्ट में कुछ उल्लेखनीय स्वदेशी उपलब्धियों का भी जिक्र है। BIRSA 101, भारत की पहली स्वदेशी CRISPR-आधारित थेरेपी, और NexCAR19, एक स्वदेशी CAR-T थेरेपी, इसमें प्रमुख हैं। गौरतलब है कि NexCAR19 की कीमत विदेशों में उपलब्ध समान उपचारों की तुलना में लगभग दसवें हिस्से के बराबर है, जो इसे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाती है। पिछले एक दशक में भारत ने 10 से अधिक नई दवा परिसंपत्तियाँ विकसित की हैं।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
BCG इंडिया एवं दक्षिण-पूर्व एशिया की मैनेजिंग डायरेक्टर और सीनियर पार्टनर प्रियंका अग्रवाल ने कहा, 'भारत की नवाचार यात्रा अब वास्तविक गति पकड़ चुकी है और एक स्थायी नवाचार इंजन के रूप में उसका विकास तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।'
हेल्थकोइस के सह-संस्थापक और मैनेजिंग पार्टनर चार्ल्स जानसेन ने कहा, 'हम देख रहे हैं कि भारत में विकसित वैज्ञानिक शोध को वैश्विक फार्मा कंपनियाँ लाइसेंस दे रही हैं और स्वदेशी CAR-T थेरेपी वैश्विक लागत की तुलना में बेहद कम कीमत पर मरीज़ों का इलाज कर रही है। ऐसे निवेश की आवश्यकता है जो विज्ञान को समझे और शुरुआती अनिश्चित वर्षों में उसका साथ दे।'
आगे की राह और चुनौतियाँ
रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि भारत एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहाँ अगले पाँच वर्ष यह तय करेंगे कि वह अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा, लागत प्रतिस्पर्धा और डेटा की ताकत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी लाइफ साइंसेज इनोवेशन इकोसिस्टम में बदल पाता है या नहीं। भारतीय कंपनियाँ अब केवल जेनेरिक और बायोसिमिलर दवाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वैश्विक बाज़ारों के लिए इनोवेटिव दवाओं के विकास, लाइसेंसिंग और व्यावसायीकरण की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं।