यूएनजीए में एर्दोआन की कश्मीर टिप्पणी पर भारत का कड़ा जवाब: 'किसी बाहरी पक्ष का अधिकार नहीं'
सारांश
मुख्य बातें
भारत ने 29 सितंबर 2026 को तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन द्वारा संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) में दिए गए संबोधन के दौरान केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर का संदर्भ दिए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई। विदेश मंत्रालय ने इन टिप्पणियों को 'अनावश्यक और अनुचित' करार दिया तथा स्पष्ट किया कि यह भारत की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का मामला है, जिस पर किसी बाहरी पक्ष का कोई अधिकार नहीं।
भारत का आधिकारिक बयान
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नई दिल्ली में द्वि-साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान कहा, 'भारत, तुर्किये के राष्ट्रपति द्वारा यूएनजीए संबोधन के दौरान भारतीय केंद्रशासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर के बारे में की गई अनावश्यक टिप्पणियों को खारिज करता है।' उन्होंने आगे कहा, 'यह मामला भारत की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता से जुड़ा है और इस मुद्दे पर किसी भी बाहरी पक्ष का कोई अधिकार नहीं है।'
जायसवाल का यह बयान उस पैटर्न की पुनरावृत्ति है जो नई दिल्ली वर्षों से यूएनजीए मंच पर तुर्किये की कश्मीर संबंधी टिप्पणियों के जवाब में देती आई है।
पुराना विवाद, नया संदर्भ
गौरतलब है कि तुर्किये के राष्ट्रपति एर्दोआन अतीत में भी महासभा के मंच से कश्मीर का मुद्दा उठाते रहे हैं। सितंबर 2025 में यूएनजीए के 80वें सत्र में भी एर्दोआन द्वारा इसी तरह की टिप्पणी किए जाने पर जायसवाल ने कहा था कि 'कश्मीर पर हमारा रुख पिछले कुछ वर्षों से स्पष्ट रहा है और हर कोई इससे वाकिफ है।' भारत की स्थिति अपरिवर्तित रही है — कश्मीर एक द्विपक्षीय मुद्दा है जिसमें तीसरे पक्ष की कोई भूमिका स्वीकार्य नहीं।
यह ऐसे समय में आया है जब भारत-तुर्किये संबंध पहले से ही कूटनीतिक तनाव के दौर से गुज़र रहे हैं, और एर्दोआन का रवैया इस्लामिक देशों के बीच कश्मीर प्रश्न पर पाकिस्तान के नज़रिए से सहानुभूति रखने वाला माना जाता है।
ओआईसी पर भारत की पूर्व प्रतिक्रिया
इससे पहले उसी सप्ताह, भारत ने ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) के तथाकथित 'जम्मू और कश्मीर पर संपर्क समूह' की संयुक्त विज्ञप्ति में की गई टिप्पणियों को भी सिरे से नकार दिया था। विदेश मंत्रालय ने उन्हें 'अनावश्यक और तथ्यात्मक रूप से गलत' बताते हुए स्पष्ट किया था कि 'ओआईसी को भारत के पूरी तरह से आंतरिक मामलों पर बोलने का कोई अधिकार नहीं है।'
मंत्रालय ने यह भी दोहराया था कि केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का संपूर्ण क्षेत्र भारत का 'अभिन्न और अविभाज्य' हिस्सा है, और 'राजनीतिक रूप से प्रेरित प्रचार को चाहे कितनी भी बार दोहराया जाए, यह वास्तविकता नहीं बदल सकती।'
भारत का सुस्थापित रुख और आगे की राह
भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर पर बाहरी हस्तक्षेप की किसी भी कोशिश को नकारने की अपनी नीति पर दृढ़ रहा है। आलोचकों का कहना है कि एर्दोआन का यह कदम घरेलू मुस्लिम वोट बैंक और पाकिस्तान के साथ संबंधों को ध्यान में रखकर उठाया जाता है। भारत इस विषय पर द्विपक्षीय चैनलों के माध्यम से तुर्किये के साथ अपनी चिंताएँ साझा करता रहा है, हालाँकि इससे एर्दोआन के रवैये में अब तक कोई बदलाव नहीं आया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत इस मुद्दे को यूएन में किस स्तर तक उठाता है।