जयशंकर का UNGA में AI पर बड़ा बयान: राष्ट्रीय नियंत्रण और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का आह्वान
सारांश
मुख्य बातें
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 26 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में स्पष्ट किया कि प्रत्येक देश को अपनी प्राथमिकताओं के अनुरूप कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) प्रणालियाँ विकसित करने और उन्हें तैनात करने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए। उन्होंने 1945 के बाद की वैश्विक व्यवस्था को नई वास्तविकताओं के सामने अपर्याप्त बताते हुए बहुध्रुवीय विश्व की ओर संक्रमण को अपरिहार्य करार दिया।
AI पर भारत का रुख
जयशंकर ने कहा कि भारत प्रत्येक राष्ट्र के अपने AI पारिस्थितिकी तंत्र को आकार देने के अधिकार में विश्वास रखता है। उनके अनुसार, देशों को यह तय करने में सक्षम होना चाहिए कि वे कौन-से AI मॉडल विकसित करें और उन्हें किस तरह उपयोग में लाएँ — किसी एक निर्धारित मार्ग का अनुसरण करना उचित नहीं।
उन्होंने AI को एक ऐसे उपकरण के रूप में वर्णित किया जो लोगों को सशक्त बना सकता है, आर्थिक विकास को गति दे सकता है और बड़े पैमाने की समस्याओं के समाधान में सहायक हो सकता है। साथ ही उन्होंने यह भी चेताया कि AI के दुरुपयोग से पूर्वाग्रह बढ़ सकता है और आपसी सम्मान कमज़ोर पड़ सकता है।
भारत की AI साझेदारी और 'AI इम्पैक्ट समिट'
जयशंकर ने उल्लेख किया कि भारत ने फरवरी 2026 में 'AI इम्पैक्ट समिट' की मेजबानी की थी और वैश्विक दक्षिण (Global South) के साथ अपनी साझेदारी में इस तकनीक को शामिल करने का इरादा रखता है। यह कदम भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसमें वह विकासशील देशों के बीच डिजिटल और तकनीकी सहयोग का नेतृत्व करने की महत्वाकांक्षा रखता है।
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब यूरोप और अमेरिका AI नियामक ढाँचों पर आपस में मतभेद रखते हैं, और वैश्विक दक्षिण के देश प्रायः उन चर्चाओं से बाहर रह जाते हैं जहाँ AI के वैश्विक मानक तय किए जाते हैं।
बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का आह्वान
विदेश मंत्री ने UNGA मंच से यह भी रेखांकित किया कि विश्व अब बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर अग्रसर है और 1945 के बाद स्थापित अंतरराष्ट्रीय ढाँचा नई वास्तविकताओं के सामने कमज़ोर पड़ रहा है। उनके अनुसार, वर्तमान वैश्विक अशांति के कुछ कारण इसी संक्रमण की कठिनाइयों में निहित हैं।
उन्होंने कहा कि शांति को स्थायी बनाने के लिए सभ्य चर्चा, व्यापक परामर्श और पारदर्शी निर्णय-प्रक्रिया अनिवार्य है, तथा मानवता के बड़े हिस्से को इस प्रक्रिया से बाहर नहीं रखा जा सकता।
सांस्कृतिक परिवर्तन की ज़रूरत
जयशंकर ने देशों से एक-दूसरे की संस्कृतियों, विरासत और परंपराओं को अधिक सम्मान देने का आग्रह किया। उनका तर्क था कि जब आर्थिक शक्ति में बदलाव हो रहा है और राजनीतिक परिवर्तन दृश्यमान है, तब सांस्कृतिक परिवर्तन भी अपरिहार्य है।
उन्होंने प्रौद्योगिकी की व्यापक उपलब्धता को शांति-निर्माण के एक संभावित साधन के रूप में देखा, बशर्ते कि देश एक-दूसरे के हितों और विचारों के प्रति संवेदनशील रहें। यह बयान भारत की उस दीर्घकालिक कूटनीतिक स्थिति को दोहराता है जो तकनीक, व्यापार और भू-राजनीति — सभी क्षेत्रों में — बहुपक्षीय लोकतांत्रिक ढाँचे की माँग करती है।