27 सितंबर 2026
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यूएनजीए में एआई संप्रभुता पर बहस: जयशंकर बोले — हर देश को अपना एआई मॉडल बनाने का अधिकार

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यूएनजीए में एआई संप्रभुता पर बहस: जयशंकर बोले — हर देश को अपना एआई मॉडल बनाने का अधिकार

सारांश

संयुक्त राष्ट्र महासभा में एआई की बागडोर को लेकर बड़ी बहस छिड़ी — भारत, मलेशिया, जर्मनी समेत दर्जनों देशों ने एक स्वर में कहा: मुट्ठी भर देशों या कंपनियों को यह तय करने का अधिकार नहीं कि बाकी दुनिया किस एआई से जीएगी। जयशंकर की माँग — हर देश को अपना एआई मॉडल बनाने की आजादी — असल में डिजिटल युग की संप्रभुता की लड़ाई का नया मोर्चा है।

मुख्य बातें

जयशंकर ने 27 सितंबर 2026 को यूएनजीए में कहा कि हर देश को अपनी जरूरतों के अनुसार एआई मॉडल विकसित करने का अधिकार होना चाहिए।
जयशंकर ने एआई को 'बड़ा बदलाव लाने वाली ताकत' बताते हुए इसके दुरुपयोग से पक्षपात बढ़ने और आपसी सम्मान कमजोर होने की चेतावनी दी।
मलेशिया के विदेश मंत्री मोहम्मद हाजी हसन ने कहा — 'ग्लोबल साउथ सिर्फ डेटा सेंटर लगाने की जगह नहीं बन सकता।' जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल ने बताया कि एआई के अधिकांश पेटेंट केवल दो देशों की कंपनियों के पास केंद्रित हैं।
संयुक्त राष्ट्र का 2024 का वैश्विक डिजिटल समझौता लागू करने योग्य नियमों में बदलने की चुनौती अभी भी बनी हुई है।
सऊदी अरब ने रियाद में एआई अनुसंधान और नैतिकता केंद्र स्थापित करने की जानकारी दी।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 27 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) की जनरल डिबेट में स्पष्ट कहा कि हर देश को अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और जरूरतों के अनुसार अपने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) मॉडल विकसित करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। उन्होंने एआई को लोगों को सशक्त बनाने और आर्थिक खुशहाली बढ़ाने में 'बड़ा बदलाव लाने वाली ताकत' बताया, लेकिन साथ ही चेतावनी दी कि इसका दुरुपयोग पक्षपात को बढ़ावा देता है और देशों के बीच आपसी सम्मान को कमजोर करता है।

मुख्य घटनाक्रम

संयुक्त राष्ट्र में 27 सितंबर को हुई जनरल डिबेट में एआई प्रशासन, उस पर नियंत्रण और विकासशील देशों की भागीदारी का मुद्दा केंद्र में रहा। भारत, मलेशिया, जर्मनी, सिंगापुर, बेलीज, सऊदी अरब और कैमरून — सभी ने इस प्रश्न पर अपनी स्थिति रखी कि एआई जैसी रूपांतरकारी तकनीक की बागडोर किसके हाथ में होगी।

जयशंकर का बयान यूएन में चल रही एक बड़ी बहस का हिस्सा था, जिसमें यह सवाल उठ रहे हैं कि एआई के नियम कौन तय करेगा और क्या विकासशील देशों को इस तकनीक का भविष्य गढ़ने में वास्तविक भागीदारी मिलेगी।

ग्लोबल साउथ की चिंताएँ

मलेशिया के विदेश मंत्री मोहम्मद हाजी हसन ने कड़ी चेतावनी दी। उन्होंने कहा, 'ग्लोबल साउथ सिर्फ डेटा सेंटर लगाने की जगह नहीं बन सकता, जबकि एआई से जुड़े फैसले कहीं और लिए जाएं।' उन्होंने तर्क दिया कि विकासशील देशों को केवल एआई के ग्राहक और बाजार बनाकर नहीं छोड़ा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें नई तकनीक तैयार करने में बराबर का साझेदार बनाना होगा।

हसन ने यह भी रेखांकित किया कि आज मुट्ठी भर निजी कंपनियों के पास इस बात पर असाधारण प्रभाव है कि दुनिया के अरबों लोग कैसे संवाद करते हैं, काम करते हैं और जानकारी हासिल करते हैं। उन्होंने डेटा सेंटर के लिए आवश्यक पानी, बिजली और जमीन का बोझ विकासशील देशों पर डालने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाया।

यूरोप और छोटे देशों की आवाज़

जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल ने चिंता जताई कि दुनिया में एआई से जुड़े अधिकांश पेटेंट केवल दो बड़े देशों की कंपनियों के पास केंद्रित हैं। उन्होंने कहा, 'जब ताकत वैश्विक हो जाती है, तो जिम्मेदारी भी वैश्विक होनी चाहिए।' उन्होंने देशों से सबसे उन्नत एआई मॉडलों के लिए साझा सुरक्षा मानक तय करने की अपील की और चेताया कि एआई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के नियम बनाने की रफ्तार से कहीं तेज दौड़ रहा है।

बेलीज के प्रधानमंत्री जॉन ब्रिसेन्यो ने कहा कि सही नीति-ढाँचे के बिना एआई असमानता बढ़ा सकता है, जरूरी व्यवस्थाओं को खतरे में डाल सकता है और विकासशील देशों को दूसरों के नियमों पर निर्भर बना सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी एक देश के घरेलू कानून ऐसी तकनीक को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं जो सीमाओं से परे काम करती है।

सिंगापुर के विदेश मंत्री विवियन बालाकृष्णन ने एआई को 'सबसे जरूरी नई चुनौती' करार देते हुए विज्ञान, बुनियादी ढाँचे और कौशल विकास में अधिक निवेश तथा मानव-केंद्रित सुरक्षा उपायों की माँग की।

वैश्विक डिजिटल समझौता और आगे की राह

गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र ने 2024 में वैश्विक डिजिटल समझौता अपनाया था, जिसका उद्देश्य एआई सहयोग बढ़ाना, डिजिटल असमानता घटाना और सुरक्षित तकनीक को प्रोत्साहन देना था। परंतु सरकारों के बीच अभी भी यह बहस जारी है कि इन वैश्विक सिद्धांतों को लागू करने योग्य ठोस नियमों में कैसे बदला जाए।

सऊदी अरब ने एआई क्षमता निर्माण के लिए अंतरराष्ट्रीय केंद्रों का नेटवर्क बनाने और रियाद में एआई अनुसंधान और नैतिकता केंद्र स्थापित करने के अपने प्रयासों का उल्लेख किया। कैमरून ने नई तकनीक तक पहुँच के मुद्दे को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में सुधार की माँग से जोड़ा, ताकि विकासशील देशों को बराबरी का अवसर मिल सके।

यूएनजीए का यह सत्र स्पष्ट करता है कि एआई अब केवल एक तकनीकी प्रश्न नहीं रहा — यह भू-राजनीतिक संप्रभुता, आर्थिक न्याय और वैश्विक शासन का सवाल बन चुका है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा यह है कि भारत स्वयं किस हद तक स्वदेशी एआई ढाँचे पर निवेश कर रहा है — बड़े अमेरिकी और चीनी मॉडलों पर निर्भरता घटाए बिना यह वक्तव्य खोखला रह जाएगा। मलेशिया की 'डेटा सेंटर कॉलोनी' वाली चेतावनी उस विडंबना को उजागर करती है जो भारत सहित कई देशों पर भी लागू होती है — जहाँ विदेशी हाइपरस्केलर निवेश का स्वागत किया जाता है, पर एआई का निर्णय-नियंत्रण देश में नहीं रहता। जर्मनी का 'दो देशों में पेटेंट केंद्रण' वाला तथ्य उस असंतुलन को नंबरों में रखता है जिसे अब तक केवल राजनीतिक भाषण में उठाया जाता था। यूएन का 2024 का डिजिटल समझौता अब तक सिद्धांतों का दस्तावेज़ है — जब तक इसे जवाबदेह तंत्र से नहीं जोड़ा जाता, यह बहस हर साल यूएनजीए में दोहराई जाती रहेगी।
RashtraPress
27 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यूएनजीए में भारत ने एआई पर क्या रुख अपनाया?
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 27 सितंबर 2026 को यूएनजीए में कहा कि हर देश को अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुसार खुद का एआई मॉडल विकसित करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। उन्होंने एआई को आर्थिक खुशहाली की 'बड़ा बदलाव लाने वाली ताकत' बताया, लेकिन इसके दुरुपयोग से पक्षपात बढ़ने की चेतावनी भी दी।
मलेशिया ने एआई को लेकर क्या चेतावनी दी?
मलेशिया के विदेश मंत्री मोहम्मद हाजी हसन ने कहा कि ग्लोबल साउथ के देशों को केवल डेटा सेंटर और बुनियादी ढाँचा लगाने की जगह नहीं बनाया जाना चाहिए, जबकि एआई के फैसले और नियंत्रण कहीं और बैठी सरकारों व कंपनियों के हाथ में रहें। उन्होंने विकासशील देशों को एआई निर्माण में बराबर का भागीदार बनाने की माँग की।
जर्मनी ने एआई पेटेंट केंद्रण पर क्या कहा?
जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल ने बताया कि दुनिया के अधिकांश एआई पेटेंट केवल दो बड़े देशों की कंपनियों के पास हैं। उन्होंने कहा कि जब तकनीकी ताकत वैश्विक हो जाती है, तो जिम्मेदारी भी वैश्विक होनी चाहिए, और सभी देशों से उन्नत एआई मॉडलों के लिए साझा सुरक्षा नियम बनाने की अपील की।
संयुक्त राष्ट्र का वैश्विक डिजिटल समझौता क्या है?
संयुक्त राष्ट्र ने 2024 में वैश्विक डिजिटल समझौता अपनाया था, जिसका उद्देश्य एआई के क्षेत्र में देशों के बीच सहयोग बढ़ाना, डिजिटल असमानता घटाना और सुरक्षित, मानव-केंद्रित तकनीक को प्रोत्साहन देना है। हालाँकि, इन वैश्विक सिद्धांतों को व्यावहारिक और लागू करने योग्य नियमों में बदलने पर सरकारों के बीच अभी भी सहमति नहीं बन पाई है।
एआई प्रशासन में विकासशील देशों के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
बेलीज के प्रधानमंत्री जॉन ब्रिसेन्यो के अनुसार, सही नीति-ढाँचे के बिना एआई असमानता को और गहरा कर सकता है तथा विकासशील देशों को दूसरों के तैयार किए नियमों पर निर्भर बना सकता है। मुख्य चुनौती यह है कि एआई देशों की सीमाओं से परे काम करता है, इसलिए किसी एक देश के घरेलू कानून इसे नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
राष्ट्र प्रेस
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