15 सितंबर 2026
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ICWA सिल्वर जुबली पर जयशंकर: भारत अब वैश्विक विमर्श में अपनी शर्तों पर भागीदारी कर रहा है

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ICWA सिल्वर जुबली पर जयशंकर: भारत अब वैश्विक विमर्श में अपनी शर्तों पर भागीदारी कर रहा है

सारांश

ICWA की रजत जयंती पर जयशंकर का संदेश साफ था — भारत अब दूसरों के बनाए ढाँचों में फिट होने की जगह, अपनी शर्तों पर वैश्विक विमर्श में हिस्सेदारी करेगा। यह कूटनीतिक आत्मविश्वास का ऐलान है, जो बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की नई भूमिका को रेखांकित करता है।

मुख्य बातें

ICWA की रजत जयंती ( राष्ट्रीय महत्व की संस्था के रूप में 25 वर्ष ) 15 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के विवेक ऑडिटोरियम में मनाई गई।
जयशंकर ने कहा — भारत वैश्विक चुनौतियों पर पहले से कहीं अधिक आत्मविश्वास के साथ अपने विचार रख रहा है।
ICWA की स्थापना 1943 में हुई थी; 2001 में संसद ने इसे राष्ट्रीय महत्व की संस्था का दर्जा दिया।
राधाकृष्णन ने BRICS के 'नई दिल्ली लीडर्स डिक्लेरेशन' को बड़ी उपलब्धि बताया।
जयशंकर ने आह्वान किया कि भारत को अपनी बौद्धिक शब्दावली और दृष्टिकोण से वैश्विक विमर्श में योगदान देना चाहिए।

विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने 15 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के मंडी हाउस स्थित विवेक ऑडिटोरियम में आयोजित इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स (ICWA) की रजत जयंती (राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित होने के 25 वर्ष) के अवसर पर कहा कि भारत अब वैश्विक चुनौतियों पर अपने विचार पहले की तुलना में कहीं अधिक आत्मविश्वास के साथ सामने रख रहा है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि जैसे जैसे दुनिया में भारत की भूमिका बढ़ रही है, अंतरराष्ट्रीय मामलों पर भारत की बौद्धिक भागीदारी को भी उसी गति से विकसित होना होगा।

समारोह में कौन कौन उपस्थित रहे

इस विशेष कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जो ICWA के अध्यक्ष भी हैं। उनके साथ विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और विदेश सचिव विक्रम मिस्री भी मंच पर रहे। जयशंकर ने अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति का विशेष आभार व्यक्त किया।

ICWA की ऐतिहासिक भूमिका

जयशंकर ने बताया कि ICWA की स्थापना 1943 में हुई थी और तब से यह संस्था अंतरराष्ट्रीय मामलों के अध्ययन और उनके प्रचार प्रसार में निरंतर योगदान देती रही है। वर्ष 2001 में संसद ने इसे राष्ट्रीय महत्व की संस्था का दर्जा प्रदान किया, जो वैश्विक मुद्दों पर भारत की बौद्धिक भागीदारी में इसके असाधारण योगदान की आधिकारिक स्वीकृति थी।

उन्होंने कहा कि यह वर्षगांठ केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह सोचने का भी समय है कि आने वाले वर्षों में ICWA की क्या भूमिका होनी चाहिए — विशेषकर तब, जब भारत और दुनिया दोनों तेज़ी से बदल रहे हैं।

जयशंकर का मुख्य संदेश: भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक विमर्श

जयशंकर ने रेखांकित किया कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर पारंपरिक सोच और चर्चा काफी हद तक दूसरे देशों के अनुभवों और वहाँ विकसित हुए विचारों पर टिकी रही है। उन्होंने कहा, "एक उभरते हुए भारत को अब दुनिया को देखने और समझने के अपने तरीके में अपनी बुद्धिमत्ता, अनुभव, हितों, विचारों और यहाँ तक कि अपनी शब्दावली को भी शामिल करना होगा।"

उन्होंने आगे कहा कि भारत को सिर्फ दूसरों के बनाए ढाँचों के आधार पर दुनिया को नहीं समझना चाहिए, बल्कि अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण के साथ वैश्विक विमर्श में योगदान देना चाहिए। यह ऐसे समय में आया है जब भारत के राष्ट्रीय हित तेज़ी से वैश्विक होते जा रहे हैं और दुनिया की भारत से अपेक्षाएँ भी उसी अनुपात में बढ़ रही हैं।

उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन का संबोधन

उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने अपने संबोधन में BRICS शिखर सम्मेलन में सर्वसम्मति से अपनाए गए 'नई दिल्ली लीडर्स डिक्लेरेशन' को एक बड़ी उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि इस घोषणापत्र में समावेशी वैश्विक व्यवस्था, बहुपक्षीय सहयोग, अंतरराष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय शांति, तथा सांस्कृतिक एवं लोगों के बीच आपसी सहयोग जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया है।

राधाकृष्णन ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत नए आत्मविश्वास के साथ वैश्विक मंच पर आगे बढ़ रहा है और दुनिया में शांति, प्रगति तथा समृद्धि की एक विश्वसनीय आवाज़ के रूप में उभर रहा है।

आगे ICWA की भूमिका

जयशंकर ने स्पष्ट किया कि ICWA की भूमिका केवल अकादमिक नहीं है — बल्कि यह संस्था भारतीय दृष्टिकोण से सार्थक नीतिगत चर्चाओं को प्रोत्साहित कर भारत के विकल्पों को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती है। उन्होंने कहा कि किसी भी उभरते राष्ट्र के विकास में जो बौद्धिक बहसें होती हैं, उनमें ICWA को सक्रिय और केंद्रीय भूमिका निभानी चाहिए। गौरतलब है कि 1943 में स्थापना से लेकर अब तक ICWA भारत की विदेश नीति विमर्श में एक स्थायी संदर्भ संस्था के रूप में स्थापित हो चुकी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

आलोचकों का कहना है कि बौद्धिक स्वायत्तता का यह आह्वान तब और विश्वसनीय होगा जब ICWA जैसी संस्थाएँ स्वतंत्र शोध के लिए पर्याप्त संसाधन और नीतिगत स्वायत्तता पाएँ — केवल सरकारी विमर्श को प्रतिध्वनित करने की भूमिका से आगे बढ़ें।
RashtraPress
15 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ICWA की सिल्वर जुबली क्या है और यह क्यों मनाई गई?
इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स (ICWA) को वर्ष 2001 में संसद ने राष्ट्रीय महत्व की संस्था का दर्जा दिया था। 15 सितंबर 2026 को इस दर्जे के 25 वर्ष पूरे होने पर नई दिल्ली के विवेक ऑडिटोरियम में रजत जयंती समारोह आयोजित किया गया।
जयशंकर ने ICWA जुबली पर क्या कहा?
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कहा कि भारत अब वैश्विक चुनौतियों पर पहले की तुलना में कहीं अधिक आत्मविश्वास के साथ अपने विचार सामने रख रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत को अपनी बौद्धिक शब्दावली और दृष्टिकोण के साथ वैश्विक विमर्श में योगदान देना चाहिए, न कि केवल दूसरों के बनाए ढाँचों पर निर्भर रहना चाहिए।
ICWA की स्थापना कब हुई और इसे राष्ट्रीय महत्व का दर्जा कब मिला?
ICWA की स्थापना 1943 में हुई थी। वर्ष 2001 में भारतीय संसद ने इसे राष्ट्रीय महत्व की संस्था का दर्जा दिया, जो अंतरराष्ट्रीय मामलों पर भारत की बौद्धिक भागीदारी में इसके विशेष योगदान की पहचान थी।
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने समारोह में क्या कहा?
उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने BRICS शिखर सम्मेलन में सर्वसम्मति से अपनाए गए 'नई दिल्ली लीडर्स डिक्लेरेशन' को एक बड़ी उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत वैश्विक शांति, प्रगति और समृद्धि की एक विश्वसनीय आवाज़ के रूप में उभर रहा है।
भारत की वैश्विक भूमिका में ICWA का क्या महत्व है?
जयशंकर के अनुसार, ICWA भारतीय दृष्टिकोण से सार्थक नीतिगत चर्चाओं को बढ़ावा देकर भारत के नीति निर्माताओं को उपलब्ध विकल्पों को बेहतर ढंग से समझने में सहायता करता है। एक उभरते राष्ट्र के रूप में भारत की बौद्धिक स्वायत्तता को मज़बूत करने में यह संस्था केंद्रीय भूमिका निभा सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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