झारखंड में भाषा विवाद: जेटेट में क्षेत्रीय भाषाओं को हटाने पर विरोध
सारांश
Key Takeaways
- भाषा विवाद झारखंड में एक बार फिर उभरा है।
- जेटेट परीक्षा में कुछ भाषाओं को हटाया गया है।
- स्थानीय अभ्यर्थियों में नाराजगी है।
- सरकार का तर्क है कि ये भाषाएं बिहार में प्रचलित हैं।
- भाजपा नेता इस निर्णय को भेदभावपूर्ण मानते हैं।
रांची, 31 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। झारखंड में शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटेट) की नई नियमावली को लेकर भाषा विवाद एक बार फिर उभरा है। हाल ही में राज्य सरकार द्वारा जारी अधिसूचना में क्षेत्रीय भाषाओं की सूची से मगही, भोजपुरी, मैथिली और अंगिका को हटा दिया गया है, जिससे विरोध के स्वर उठने लगे हैं।
यह निर्णय न केवल भाजपा जैसे विपक्षी दलों को हमलावर होने का मौका दे रहा है, बल्कि सत्ताधारी गठबंधन के कई नेता भी इस भाषाई विसंगति पर सवाल खड़े कर रहे हैं। इस विवाद का सबसे अधिक प्रभाव पलामू प्रमंडल और संथाल परगना के सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले हजारों अभ्यर्थियों पर पड़ रहा है, जिनकी मातृभाषा भोजपुरी, मगही या अंगिका है।
सरकार के नियमावली तैयार करने वालों का तर्क है कि ये भाषाएं मुख्य रूप से बिहार में प्रचलित हैं, इसलिए इन्हें झारखंड की क्षेत्रीय भाषाओं में शामिल नहीं किया गया। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद आदित्य साहू ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर भाषा निर्धारण में ‘दोहरा मापदंड’ अपनाने का आरोप लगाया था।
उन्होंने कहा कि लगभग एक दशक से लंबित जेटेट परीक्षा के लिए लाई गई नई नियमावली में क्षेत्रीय भाषाओं का चयन न केवल निराधार है, बल्कि इससे अनावश्यक भाषाई विवाद को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि जब ओडिशा और पश्चिम बंगाल के सटे जिलों में क्रमशः उड़िया और बंगला को क्षेत्रीय भाषा के रूप में मान्यता दी जा रही है, तो बिहार से सटे क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषाओं के साथ भिन्न व्यवहार क्यों किया जा रहा है।
उन्होंने पलामू, गढ़वा, लातेहार और संथाल परगना के देवघर, गोड्डा और साहिबगंज जिलों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन क्षेत्रों में भोजपुरी, मगही, अंगिका और मैथिली बोलने वाले लोगों की अच्छी खासी जनसंख्या है, फिर भी इन्हें सूची से बाहर रखा जाना भेदभावपूर्ण है। भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष और पूर्व मंत्री भानु प्रताप शाही ने भी इस निर्णय का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि यह स्थानीय भाषाओं और अभ्यर्थियों के अधिकारों की अनदेखी है।
उन्होंने यह भी बताया कि पलामू और गढ़वा में नागपुरी बोलने वाले लोग बहुत कम हैं, लेकिन इसे क्षेत्रीय भाषा की सूची में नहीं रखा गया है। पूरे पलामू प्रमंडल में भोजपुरी और मगही बोलने वालों की संख्या सबसे अधिक है, फिर भी इन्हें सूची में स्थान नहीं दिया गया है। राज्य सरकार में वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने नियमावली में विसंगतियों को स्वीकार करते हुए कहा कि पलामू और गढ़वा जिलों में भोजपुरी और मगही बोलने वालों की बड़ी संख्या है, लेकिन इन्हें सूची में शामिल नहीं किया गया है।
उन्होंने कहा कि वे इस मुद्दे को आगामी कैबिनेट बैठक में उठाएंगे। पूर्व मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केएन त्रिपाठी ने भी कहा कि पलामू प्रमंडल में भोजपुरी और मगही सबसे अधिक बोली जाती है, लेकिन जेटेट में इन भाषाओं को शामिल नहीं किया जाना पूरी तरह से अनुचित है।
डाल्टनगंज से भाजपा विधायक आलोक चौरसिया ने सरकार पर पलामू प्रमंडल के युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि वर्षों से जेटेट की तैयारी कर रहे छात्रों को उनकी मातृभाषा भोजपुरी-मगही में परीक्षा देने के अवसर से वंचित करना न केवल अन्याय है, बल्कि उनके आत्मविश्वास पर भी नकारात्मक प्रभाव डालेगा। चौरसिया ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द ही इस निर्णय पर पुनर्विचार नहीं किया, तो बड़े पैमाने पर जन आंदोलन किया जाएगा।