जीतू पटवारी का आरोप: मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और आदिवासी कल्याण की स्थिति चिंताजनक
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने 2 अक्टूबर 2026 को भोपाल में संवाददाताओं से बातचीत में राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था, कानून-व्यवस्था, आदिवासी कल्याण और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाए। उनके अनुसार, प्रदेश में मासूम बच्चों की मौत, जहरीली शराब से होने वाली मृत्यु और दूषित पानी से नागरिकों की जान जाने जैसी घटनाएं सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार की जवाबदेही पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाती हैं।
बालाघाट दौरे का संदर्भ
पटवारी ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बालाघाट दौरे का उल्लेख करते हुए कहा कि यह महज एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उन आदिवासी परिवारों के दुख-दर्द को समझने का प्रयास था जिन्होंने अपने बच्चों को खोया है। उनके अनुसार, इन परिवारों में तीन महीने से लेकर 17 वर्ष तक की उम्र के बच्चों को गँवाने वाले माता-पिता शामिल हैं। पटवारी ने कहा कि ऐसे परिवारों की पीड़ा को सुनना और उनकी समस्याओं को सरकार तक पहुँचाना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।
आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव
कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि अलीराजपुर सहित प्रदेश के आदिवासी जिलों में गरीबी और बुनियादी सुविधाओं की कमी के सवाल लगातार उठते रहे हैं। उन्होंने माँग की कि आदिवासी परिवारों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, पौष्टिक आहार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व है। पटवारी ने यह भी कहा कि किसी बच्चे का भविष्य उसके जन्मस्थान, आर्थिक स्थिति या सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण प्रभावित नहीं होना चाहिए।
आदिवासी बजट में पारदर्शिता पर सवाल
पटवारी ने आरोप लगाया कि आदिवासी विकास के लिए निर्धारित बजट के उपयोग में पारदर्शिता का अभाव है। उन्होंने माँग की कि सरकार स्पष्ट करे कि आदिवासी कल्याण के लिए आवंटित धनराशि का कितना हिस्सा स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और बुनियादी सुविधाओं पर खर्च हुआ। यदि इस राशि का दुरुपयोग हुआ है, तो उन्होंने निष्पक्ष जाँच और दोषियों पर कार्रवाई की माँग की।
बालाघाट में अधिकारियों की अनुपस्थिति पर विवाद
पटवारी ने राहुल गांधी के बालाघाट दौरे के दौरान जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक की अनुपस्थिति को गंभीर विषय बताया। उनके अनुसार, कांग्रेस ने दौरे की पूर्व सूचना दी थी और मुख्य सचिव से भी संवाद हुआ था, इसके बावजूद दोनों वरिष्ठ अधिकारियों का अनुपस्थित रहना प्रशासनिक समन्वय और स्थापित प्रोटोकॉल पर सवाल खड़े करता है। उन्होंने माँग की कि पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए और जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। गौरतलब है कि नेता प्रतिपक्ष का पद संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण माना जाता है, और ऐसे दौरों पर प्रशासनिक प्रोटोकॉल का पालन अपेक्षित होता है।
आगे क्या
पटवारी के इन बयानों के बाद राज्य सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार है। आदिवासी जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं और बजट पारदर्शिता का मुद्दा आने वाले दिनों में विधानसभा में भी गूँज सकता है। यह ऐसे समय में आया है जब प्रदेश में आदिवासी समुदाय से जुड़ी कई घटनाएं लगातार चर्चा में हैं।