25 जुलाई 2026
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इंडिया गेट से कारगिल वॉर मेमोरियल तक पैदल: आयुष कुमार का 30 दिन का सफर अंतिम पड़ाव पर

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इंडिया गेट से कारगिल वॉर मेमोरियल तक पैदल: आयुष कुमार का 30 दिन का सफर अंतिम पड़ाव पर

सारांश

एक महीने, छह राज्य, 3,200 मीटर की ऊँचाई — और अब सिर्फ 30 किलोमीटर बाकी। UP के कंटेंट क्रिएटर आयुष कुमार मध्येश की इंडिया गेट से कारगिल वॉर मेमोरियल तक की पैदल यात्रा उस पीढ़ी की आवाज़ है जो अपने शहीदों को याद रखना चाहती है।

मुख्य बातें

आयुष कुमार मध्येश (25) ने 26 जून 2025 को इंडिया गेट, नई दिल्ली से कारगिल वॉर मेमोरियल तक पैदल यात्रा शुरू की।
25 जुलाई 2025 तक वे 30 दिन की यात्रा पूरी कर मटायन पहुँच चुके हैं — गंतव्य से मात्र 30 किलोमीटर दूर।
यात्रा दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू, कश्मीर और लद्दाख से होकर गुज़री।
वर्तमान में 3,200 मीटर की ऊँचाई पर; रात का तापमान 2-3 डिग्री सेल्सियस तक गिरा।
यात्रा के दौरान प्रतिदिन एक कारगिल योद्धा की कहानी सोशल मीडिया पर साझा की जा रही है।
भविष्य में मनाली-पांग मार्ग से दोबारा कारगिल यात्रा की योजना, अगली बार कम से कम 10 युवाओं के साथ।

उत्तर प्रदेश के 25 वर्षीय कंटेंट क्रिएटर आयुष कुमार मध्येश ने 26 जून 2025 को नई दिल्ली के इंडिया गेट से पैदल यात्रा शुरू की थी, जिसका गंतव्य द्रास स्थित कारगिल वॉर मेमोरियल है। 30 दिन की इस यात्रा का उद्देश्य भारतीय सशस्त्र बलों के प्रति सम्मान प्रकट करना और कारगिल युद्ध के शहीदों की गाथाएँ नई पीढ़ी तक पहुँचाना है। 25 जुलाई 2025 को आयुष कारगिल वॉर मेमोरियल से मात्र 30 किलोमीटर दूर मटायन में पहुँच चुके हैं।

यात्रा का मार्ग और चुनौतियाँ

आयुष ने दिल्ली से हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू, कश्मीर और श्रीनगर होते हुए लद्दाख तक का सफर पैदल तय किया। यात्रा के दौरान उन्हें अत्यंत विपरीत मौसम का सामना करना पड़ा — हरियाणा और पंजाब में जहाँ तापमान 44 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुँचा, वहीं लद्दाख में रात का तापमान 2 से 3 डिग्री सेल्सियस तक गिर गया। वर्तमान में वे लगभग 3,200 मीटर की ऊँचाई पर हैं, जहाँ थोड़ी देर पैदल चलने पर ही साँस लेने में कठिनाई होती है।

सैनिकों के बलिदान का एहसास

आयुष ने बताया कि लद्दाख की कठिन परिस्थितियों में पहुँचकर उन्हें सैनिकों के त्याग का वास्तविक अनुभव हुआ। उनके अनुसार, सर्दियों में यहाँ 12-12 फीट तक बर्फ जम जाती है और ऐसे माहौल में भारतीय जवान महीनों — कई बार वर्षों तक — परिवार से दूर रहकर देश की रक्षा करते हैं। उन्होंने कहा, 'घर से निकले अभी सिर्फ एक महीना हुआ है और परिवार की याद आने लगी है, जबकि सैनिक छह-छह महीने, एक-एक साल और कई बार उससे भी अधिक समय तक सीमाओं पर डटे रहते हैं।'

प्रेरणा और संकल्प की कहानी

आयुष ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब कुछ लोग भारतीय सेना पर सवाल उठा रहे थे, तब उन्होंने यह संकल्प लिया कि वे अपने कंटेंट क्रिएशन की शुरुआत सशस्त्र बलों को श्रद्धांजलि देकर करेंगे। यात्रा के दौरान वे प्रतिदिन एक कारगिल योद्धा की कहानी सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुँचा रहे हैं। उनका मानना है कि इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में कारगिल के वीरों की गाथाओं को और अधिक प्रमुखता से शामिल किया जाना चाहिए।

कश्मीर का मानवीय अनुभव

कश्मीर में एक यादगार प्रसंग साझा करते हुए आयुष ने बताया कि जब उन्हें वहाँ होटल नहीं मिला, तो एक स्थानीय निवासी ने उन्हें अपने घर पर ठहराया। उन्होंने युवाओं से अपील की कि कश्मीर के बारे में नकारात्मक धारणाओं पर आँख मूँदकर विश्वास न करें और वहाँ जाकर खुद देखें। रास्ते में पंजाब, जम्मू और कश्मीर में लोगों ने उनकी यात्रा का उद्देश्य जानकर गर्मजोशी से स्वागत किया।

युवाओं से अपील और भविष्य की योजना

आयुष ने युवाओं से आह्वान किया कि अगली बार उनकी पीढ़ी के कम से कम 10 युवा उनके साथ इस तरह की यात्रा पर आएँ। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार से सवाल पूछना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन सशस्त्र सेनाओं पर सवाल नहीं उठाने चाहिए। भविष्य में वे मनाली-पांग मार्ग से दोबारा कारगिल आने की योजना बना रहे हैं, ताकि अधिक युवा इस ऐतिहासिक स्थल से जुड़ सकें। यह यात्रा केवल एक पैदल अभियान नहीं, बल्कि देश के वीर सैनिकों के प्रति कृतज्ञता और नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ने का एक सार्थक प्रयास है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि पाठ्यक्रम निर्माताओं और सरकारी स्मृति-संस्थाओं ने इस दायित्व को एकल कंटेंट क्रिएटर्स पर क्यों छोड़ दिया है। जब ऑपरेशन सिंदूर जैसे समसामयिक घटनाक्रम सेना पर बहस को पुनर्जीवित करते हैं, तब इस तरह की ज़मीनी पहलें यह याद दिलाती हैं कि देशभक्ति का सबसे विश्वसनीय रूप नारे नहीं, बल्कि व्यक्तिगत त्याग और इतिहास से सीधा संवाद है।
RashtraPress
25 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आयुष कुमार मध्येश की कारगिल पैदल यात्रा क्या है?
उत्तर प्रदेश के 25 वर्षीय कंटेंट क्रिएटर आयुष कुमार मध्येश ने 26 जून 2025 को नई दिल्ली के इंडिया गेट से द्रास स्थित कारगिल वॉर मेमोरियल तक पैदल यात्रा शुरू की। इस यात्रा का उद्देश्य भारतीय सशस्त्र बलों के प्रति सम्मान व्यक्त करना और कारगिल युद्ध के शहीदों की कहानियाँ नई पीढ़ी तक पहुँचाना है।
यात्रा किस मार्ग से हुई और अभी कहाँ तक पहुँची?
आयुष ने दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू, कश्मीर और श्रीनगर होते हुए लद्दाख तक का सफर पैदल तय किया है। 25 जुलाई 2025 तक वे मटायन पहुँच चुके हैं, जो कारगिल वॉर मेमोरियल से लगभग 30 किलोमीटर दूर है।
आयुष को यह यात्रा करने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
आयुष के अनुसार ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब कुछ लोग भारतीय सेना पर सवाल उठा रहे थे, तब उन्होंने यह संकल्प लिया कि वे अपने कंटेंट क्रिएशन की शुरुआत सशस्त्र बलों को श्रद्धांजलि देकर करेंगे। पिछले वर्ष लिए गए इस संकल्प को उन्होंने इस यात्रा के रूप में पूरा किया।
लद्दाख में यात्रा कितनी कठिन रही?
आयुष वर्तमान में लगभग 3,200 मीटर की ऊँचाई पर हैं, जहाँ रात का तापमान 2 से 3 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है और थोड़ी दूर चलने पर साँस लेने में कठिनाई होती है। इसके विपरीत हरियाणा और पंजाब में उन्हें 44-45 डिग्री सेल्सियस की गर्मी झेलनी पड़ी थी।
आयुष की भविष्य की योजनाएँ क्या हैं?
आयुष कारगिल वॉर मेमोरियल पहुँचने के बाद भविष्य में मनाली-पांग मार्ग से दोबारा कारगिल यात्रा करने की योजना बना रहे हैं। अगली बार वे अपनी पीढ़ी के कम से कम 10 युवाओं को साथ लाना चाहते हैं, ताकि अधिक से अधिक युवा इस ऐतिहासिक स्थल से जुड़ सकें।
राष्ट्र प्रेस
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